क्या यह सच था

संजीव जायसवाल ' संजय '

क्या यह सच था
(156)
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सारांश

उस अंग्रेज का उपरी जबड़ा हल्का सा उपर उठा और उसकी जीभ बाहर निकल आयी । लंबी, काली , लपलपाती हुयी जीभ । उसके शरीर पर चकत्ते उभरने लगे थे और उसका शरीर फर्श पर लहराने लगा था । फर्श पर पड़ा - पड़ा वह आगे की तरफ खिसका जिससे उसकी गर्दन कमीज से बाहर निकल आयी । वह गर्दन आश्चर्यजनक ढंग से लम्बी थी । किसी इन्सान की गर्दन इतनी लंबी नहीं हो सकती थी । जैसे सांप अपनी केंचुल छोड़ देता है, मेरे देखते ही देखते बिल्कुल वैसे ही जेम्स का शरीर अपने कपड़ों को छोड़ कर बाहर निकल आया । अब वह फर्श पर रेंगते हुये मंदिर की तरफ खुलने वाली खिड़की की ओर बढ़ रहा था ।
सोनम त्रिवेदी
sir aaj maine ye kahani tisri baar padhi fir bhi aur padhne ki ichha h baar baar padhne ka man karta h ise padhte huye kisi adrishya shakti se bandha hua mehsoos karti hu...pata nhi kaisi bhawna aati jati rahti hai...adbhut likha h aapne
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Shalini Singh
Bahut hi badiya kahaani... Lekin kya ye sach hai
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Avantika Bajpai
Bahut khub sir
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Priya Bajaj
kya yahi katha kalpnik h ya isme koi Satya h
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Savita Ojha
Kahani daravani hai lekin kya aisa kuchh bhi hota hai O my God
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Amit Gour
oh no sanjeev ji aapne to dara hi diya very nice story
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rashid malik
nice
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Anjali Singh
achchi story h
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