कैनवास पर बिखरे यादों के रंग

अभिधा शर्मा

कैनवास पर बिखरे यादों के रंग
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सारांश

8 दिसम्बर,2013 आई आई टी मुंबई कैंपस, सुबह के दस बजे सिद्धांत ने जब इंटरव्यू के रिजल्ट देखे तो ख़ुशी से पागल हो गया।उसका चयन गूगल में हुआ था, उसे कैलिफ़ोर्निया जाना था। इतनी ख़ुशी के मौके पर भी उसके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी थी। उसने मोबाइल निकाला और सुबह दस बजे अपने बड़े पापा के बेटे के साथ सबसे पहले ये खुशखबरी बाँटी और उससे यह कहा- 'भाई! आप तो जानते हैं कि ये खबर सबसे पहले मैं किसी और के साथ बाँटना चाहता था, पर उनके बारे मेंमुझे कुछ भी पता नहीं अब इसलिएसबसे पहले आपको बता रहा हूँ मैं।' सिद्धांत के भाई ने उसके चयनित होने की खबर सुनकर उसे ढेर सारी बधाई दी, साथ ही घर आने के बारे में भी पूछा। तब सिद्धांत ने अपने ाई को फाइनल प्रोजेक्ट सबमिशन और फाइनल सेमेस्टर ख़त्म हो जाने के बाद मार्च-अप्रैल 2014 में आने का कहा। रात आठ बजे उसने अपने प्लेसमेंट की खबर अपनी मम्मी को दी। सब बस अब उसके लौटने का बेसब्री से इंतज़ार करने लगे। इधर सिद्धांत भी अपनी पढाई में लग गया। जब सबसे फुर्सत हुआ तो अपनी डायरी के साथ व्यस्त हो गया। सिद्धांत की डायरी उसकी ज़िन्दगी थी, पता नहीं ऐसा क्या छुपा रखा था उसने अपनी डायरी में कि अपनी स्टडी टेबल के पास किसी को भी फटकने की इजाज़त नहीं दी थी। उसकी डायरी हमेशा उसके दोस्तों के लिए कौतूहल का विषय रहती, पर उसके डर से कभी किसी ने उसे खोलने की हिम्मत नहीं की। सिद्धांत अपने पांच दोस्तों के साथ अँधेरी में थ्री बी एच के फ्लैट में रहता था। कई सारे दोस्त थे उसके, जिनमें से कई तो अपनी गर्ल-फ्रेंड के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते थे।उसके सारे दोस्तों की गर्ल-फ्रेंड थीं एक उसी को छोड़कर। जब सारे दोस्त उसका मजाक उड़ाते तब वो अपनी डायरी को ही अपनी गर्ल-फ्रेंड बताता। सभी से यही कहता कि मेरी गर्ल-फ्रेंड, मेरी डायरी के पन्नों में रहती है।बरखा, सिद्धांत की बहुत अच्छी दोस्त है, उसने भी कई बार उससे विनती की उसकी डायरी पढने के लिए पर सिद्धांत उसे भी हमेशा टाल देता था। कन्वोकेशन के बाद सब अपने घर जा रहे थे, उसके पहले के तीन-चार दिन सबने फुलऑन सेलिब्रेशन के लिए रखा था। ये आखिरी वक़्त था जब सब साथ में थे, सिद्धांत के सात आठ दोस्त, उनकी गर्ल-फ्रेंड्स, उसके रूममटेस और बरखा समेत तकरीबन बीस लोगों ने सुबह से ही उसके फ्लैट में डेरा डाल दिया था। नाश्ते के बाद सब कॉलेज के अपने दिन, अपने अनुभव याद करने लगे, रैगिंग देने से लेकर-रैगिंग लेने तक, लेट नाईट स्टडीस, पार्टीस, कॉलेज टूर, सारी यादें याद करने लगे साथ ही सबको इस बात का भी दुःख था कि पता नहीं अब कब ऐसे मिल पायेंगे? दोपहर के लंच के बाद शैम्पेन की खाली बोतल लेकर सब एक आखिरी बार अपने कॉलेज के दिनों का फेवरेट गेम 'ट्रुथ एंड डेयर' खेलने लगे। सिद्धांत के सारे दोस्तों ने ठान लिया था कि उससे सब कुछ जान कर रहेंगे जो वह सबसे छुपाकर डायरी में लिखता है। सिद्धांत अपने दोस्तों के चक्कर में फंस भी गया-- पहला नंबर उसी का था उसने ट्रुथ लिया, उसके दोस्तों ने उससे विनती की कि जाने से पहले हम तुम्हारी डायरी,तुम्हारी गर्ल-फ्रेंड के बारे में जानना चाहते हैं और जब तक तुम हमें बताओगे नहीं तब तक हम तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेंगे। काफी ना नुकुर करने के बाद सिद्धांत ने हामी भर दी, उसने अपने दोस्तों से पूछा कि आखिर क्या जानना चाहते हो मेरी ज़िन्दगी, मेरी डायरी के बारे में? उसके दोस्तों ने कहा- सब कुछ, एक एक पन्ना तुम्हारी डायरी का। सिद्धांत अपनी डायरी के पन्ने पलटते जा रहा था, सारे लम्हे जो उस डायरी में कैद थे एक एक कर उसके सामने जीवित हो रहे थे। अचानक उसने डायरी बंद कर दी, उसके दोस्त उसे उत्सुकता से देखने लगे। तब सिद्धांत ने कहा कि ' मेरी डायरी में एक प्रेम कहानी है, दो लोगों के रिश्तों, उनके सामाजिक मूल्यों एवं उनके संघर्षों की कहानी।' आखिर क्यों जानना चाहते हो मेरी डायरी, मेरी कहानी को, ये डायरी मुझे सोने नहीं देती, हर वक़्त एक बेचैनी सी रहती है क्योंकि मैं अपनी कहानी पूरी नहीं कर पा रहा हूँ। एक अधूरी सी कहानी है इन कागज़ के पन्नों पर जिसके पूरा होने की मैं हर रोज़ प्रार्थना करता हूँ। सिद्धांत के दोस्त कहने लगे-- अधूरी ही सही आखिर हम भी तो जानें ऐसे क्या राज़ छुपा रखे हैं तुमने इस डायरी में, हम सब अब अपने काम में व्यस्त हो जायेंगे, हमेशा हमें ये बात सताती रहेगी कि आखिर क्या लिखता था तू अपनी डायरी में। सिद्धांत ने सबसे कहा- 'तुम लोग नहीं मानोगे तो सुनो पर अगर तुम्हें भी मेरी तरह बेचैनी महसूस हो तो मुझे दोष मत देना। चलो लेक्चर कम करते हैं, तुम लोगों को कहानी की तरह सुनाता हूँ, अगर तुम्हें लगे कि बोर कर रहा हूँ तो बता देना, ये कहानी है 'ऋत की रत्रि' की।
Ranjita Hardaha
कहानी है या सच्चाई.. क्या कहूँ, मेने ये पहला उपन्यास पढ़ा और इतना अच्छा कि सारे किरदार हमेशा के लिए दिल मे बस गए हैं। पढने के पहले मैंने ये नहीं सोचा था कि ये कहानी जबलपुर की गलियों मे ले जाएगी, मैं भी जबलपुरिया हूँ ते अच्छा लगा पढ कर।
Ranjitadeepu 1988
कहानी है या सच्चाई.. क्या कहूँ, मेने ये पहला उपन्यास पढ़ा और इतना अच्छा कि सारे किरदार हमेशा के लिए दिल मे बस गए हैं। पढने के पहले मैंने ये नहीं सोचा था कि ये कहानी जबलपुर की गलियों मे ले जाएगी, मैं भी जबलपुरिया हूँ ते अच्छा लगा पढ कर।
Vidhi Agrawal
इसे पढ़कर मेंम आपने हमें कुछ बोलने लायक़ ही नहीं छोड़ा इसकी खूबसूरती को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता मेम आपने रत्री को इतना मजबूत दिखाकर हम सबको एक प्रेरणा दी है उसने क्या कुछ नहीं देखा वो भी बहुत कम उम्र में फिर भी वो मजबूत बनी रही और ऋत उसका तो कोई जवाब ही नहीं है प्यार क्या होता है ये उस लड़के ने बताया पता है मेम हमारे वास्तविक जीवन मे रत्रि तो बहुत मिलेंगी पर ऋत शायद ही मिले और अगर मिले भी तो बाकी की दुनिया कहा उसे चैन से जीने देती है। मेरा एक बहुत छोटा सा सवाल उन सभी लड़को के लिए जो लड़कियों को बस खिलौना समझते है वो ये बताये की जब उन्हें उनकी बहने तो जान से भी ज्यादा प्यारी होती है तो फ़िर वो ये क्यो भूल जाते है कि जिनके साथ वे गलत कर रहे है वे भी किसी की बहन है। बलात्कार होने के बाद क्यो एक लड़की को गन्दी नजर से देखा जाता है क्यो कोई ये नहीं सोचता कि उस लड़की पर क्या बीती होगी। पर इन सब बातों को शायद बहुत कम लोग होते है जो समझ पाते है। आपने सच मे बहुत प्यारी कहानी लिखी है हमे जीवन की एक सच्चाई दिखाई है आपने इस कहानी के माध्यम से, हमेशा भगवान से मेरी एक ही दुआ रहेगी कि ऋत और रत्रि केवल कहानियों में ही नही बल्कि असली जीवन मे भी मिले ताकि लोगो के सामने एक मिसाल कायम हो। कहने के लिए तो शायद अब भी बहुत कुछ है पर अब शायद कह नही पाउंगी😪😪। बहुत बहुत धन्यवाद मेम आपका इस कहानी के लिए।और अगर मैंने कुछ गलत कहा है तो क्षमा चाहूँगी।
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मोहित राठौर
सच कहूं तो "मेरी अवंतिका" पढ़ने के बाद कुछ और पढ़ने का मन ही नहीं कर रहा था लग ही नहीं रहा था कि इससे ज्यादा सजीव वर्णन पढ़ने को मिल सकता है पर "कैनवास....." पढ़ने के बाद मेरी यह भ्रांति टूटी । यह कहानी अपने आप में अदभुत, बेहतरीन व मास्टरपीस है । रत्रि जैसा संघर्ष, स्वाभिमान व हर हाल में दूसरों की मदद करने वाले कहां देखने को मिलते हैं इस दुनिया में । सिड, किडडो व बाकी सब किरदारों की तरह मुझे भी बहुत कुछ सीखने को मिला है रत्रि से । रत्रि के जीवन व संघर्ष से मुझे भावी जीवन के लिए एक प्रेरणा मिली है ।
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रचना सिंह
kosis h is kahani ke liye sabdon me review de pau but words me bol Pana muskil h .....kuch kahani sirf kahani nhi hoti...Sikh bn jati h ...na Jane Kya kuch sikha deti h...ye kahani v aisi hi h...Mera gussa or tongue ratri jaisi h jise main logon ko kahne pe khud ko badlane ki kosis krti thi but ab nhii ..is kahani ne itna sikha Diya jaise ho waise hi bhot achhe h...khubsurat man , niyat or soch honi chahiye🙏💕💕💕❤️❤️...ab main khud ko bilkul nhi bdlana chahti jise pareshani h wo smjhe
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Satyveer Aswal
Maja aha gya jakassss
Choudhary Faruk
आपकी मेरी अवन्तिका और कैनवास पर बिखरे यादों के रंग दोनों उपन्यास पढ़े वास्तव में आपने जैसे सभ्य समाज की परतें उधेड़ दी, एक में आपने कन्या भ्रूण हत्या और दूसरी में बाल यौन उत्पीड़न के साथ साथ स्त्री को जिस मजबूती और प्रेम के साथ उकेरा, सलाम है आपको, ये भी सही है कि वर्तमान में खून के रिश्तों में वो पहले वाला अपनापन नहीं बचा।। दोनों में मेरा बेस्ट 'मेरी अवन्तिका' है क्योंकि उसमें जैसे आपने किरदारों को पिरोया है शायद उतना आप 'कैनवास पर बिखरे यादों के रंग' में नहीं पिरो पाये या शायद इसमें किरदार ज्यादा होने की वजह से मुझे ऐसा लग रहा हो।। @अभिधा शर्मा "शर्मा" जय हो
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Jyoti Malekar
Bahut hi Sundar kahani hai Abhidha ji.....
Ajay 🙏
aapse baat karni kuch argent h
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Dipesh Acharya
mujhe apke dono upnyas bhot achhi lgi. isko padhne k baad main khudko rone se rok hi nahi payi. bhot achha lga padhkr
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