कूज़ा

Damini

कूज़ा
(87)
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सारांश

भुख मार्च का महीना और बेरों के पेड़ों पर छाई बहार। पीले पीले बेरों से भरी डालियाँ फलों का भार उठाने में असमर्थ। धरती मां की गोद में सिर रख कर विश्राम करने के लिए आतुर। वहीं पेड़ की छाया के नीचे बैठी ...
Vanita Handa
हमारे समाज की एक विडम्बना को बहुत ही खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है।
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Deepa Negi
माँ की ममता का सुन्दर रचना
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Pandey Sarita
बहुत भावुक अभिव्यक्ति!
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Shanti Dihiye
👌👌👌ma 😍
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डॉ. प्रवीण पंकज
अति मार्मिक लेखन।
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Sumit Ramawat
😶😶😶 अत्यंत मार्मिक।
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Lalita Vimee
उम्दा रचना।।
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Sonali Sinha
behtareen
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दीपक चौधरी
दर्द से कुनमुनाती रचना।
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Vidya Sharma
बहुत ही सुंदर और मार्मिक चित्रण दामिनी हमारे समाज में मां का यह खूबसूरत रूप यदा-कदा देखने को मिल जाता है मां के लिए उसका बच्चा ही सर्वोपरि होता है उसके लिए वह भूखी भी रह सकती है धूप भी सह सकती हैं पर अपने बच्चे पर आंच नहीं आने देती
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