किन्नर माँ

मोहित शर्मा ज़हन

किन्नर माँ
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सारांश

बिल्लो के घर के बाहर उसके साथी किन्नरों का समूह जमा था। बिल्लो के बाहर निकलते ही सबने उसे घेर लिया, भावुक सरोज दल का नेतृत्व कर रहा था। सरोज - “तू रूमी को क्यों पढ़ा रही है? तुझे उसकी माँ बनने का शौक चढ़ा है?” बिल्लो - “रूमी बहुत होशियार है। ग्रैजुएशन कर लिया है, अभी पुलिस अफसर का एग्जाम निकाल देगी देखना!” सरोज - “नशा किया है तूने? शादी का सीजन है, काम पे लगा इसको!”
सुमित सारस्वत
किन्नर भी समाज का अंग है
Poorni tiwari
excellent mind-blowing keep it up
sourabh garg
शब्द नहीं. हैं मेरे.पास
shubh
अद्भुत
Rakhee
great...abhi third gender ke liye bhi coloumn aa gaye hain...its a big change...we all should welcome it..
नीलम चौहान
आज तक प्रतिलिपी पर एसी कहानी किसी ने पोस्ट नही की सच का आईना दिखाती है यें कहानी
Meera Sajwan
इंसान की पहचान उसके संस्कारों एंव गुणों से होनी चाहिए नाकि लैंगिकता के आधार पर।
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