कालिन्दी

मनीषा कुलश्रेष्ठ

कालिन्दी
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सारांश

रिक्शों के हुजूम में मेरा रिक्शा भी बहुत धीरे ही सही मगर आगे बढ़ता जा रहा है। भीड़ इतनी है कि पैदल चलो तो कंधे छिलें। रिक्शे भी आपस में उलझ रहे हैं। अब तो यहाँ भीड़ और बढ ग़ई है। मैं फिर लौट रहा हूँ ...
Vikas
अद्भभुत
Satpal. Singh Jattan
my God! so nice story.bahut achchhe
Renuka Mittal
औरत तेरे रूप अनेक। सुन्दर रचना
sajjad hussain
क्या कहूं कुछ कहा भी नही जाता? कम्बख्त ये भूंख, और ये दुनियां, और नशीब... .......हां इतना जानना चाहता हूं, कि क्या ये सच्ची घटना है, या आपके जह़न (दिमाग) की उपज @ कालिंदी, जमना । --- आपके जबाव के प्रतीक्षा मे आपका फैन
अख़लाक़ अहमद ज़ई
इस माॅडलिंग का वीडियो मैंने देखा है लेकिन इतनी बारीकी तो उन छात्रों की कूची और उस कैमरे में भी कैद नहीं हुई थी जितनी आपने कलम से कागज पर उतार दी है। बधाई।
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बिम्मी कुवँर सिहं
बहुत ही बेहतरीन कहानी, जैसे लग रहा था कि एक एक किरदार को जी रही हूं, बहुत ही नायाब ......मेरी पसंदीदा लेखिका है आप मैम
Sanjay Verma
बहुत ही सुंदर
Rajendra Singh Gahlot
ऐसी दुनिया की कहानी है जिससे आम पाठक रु बरु नही है इसलिये इस कहानी का मूल्यांकन वही कर सकता है जिसने कहानी मे चित्रित दुनिया देखी हो फिलहाल तो बस यही कहा जा सकता है एक अंधेरे की दुनिया को कहानीकार ने उजाले मे लानेका प्रयास किया है
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