कहीं रूठना मनाना चल रहा है

अंजू मोटवानी

कहीं रूठना मनाना चल रहा है
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सारांश

कहीं रूठना मनाना चल रहा है इसी से तो ज़माना चल रहा है गमों के दौर मे क्या अब कहें हम लबों का मुस्कुराना चल रहा है किराये का है ये जिस्म तेरा जहां मे बस ठिकाना चल रहा है न जाने जिंदगी कब रूठ जाये ...
Arun Sharma
बहुत कम दहेज लाई है दुल्हन
Prashant Kumar Rai
उम्दा सामाजिक परिप्रेक्ष्य की ग़ज़ल
Sk Kumar
bhut khoobsurat likha hai aapne
Manish Sahu
bahut Sundar line medam ji👍👍
Om Shankar
शिक्षित समाज विकसित हो गया है फिर ये क्यों पागलखाना चल रहा है? साधुवाद!
क्षितिज मिश्रा
बहुत खूबसूरत रचना
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