कहीं रूठना मनाना चल रहा है

अंजू मोटवानी

कहीं रूठना मनाना चल रहा है
(56)
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सारांश

कहीं रूठना मनाना चल रहा हैइसी से तो ज़माना चल रहा हैगमों के दौर मे क्या अब कहें हमलबों का मुस्कुराना चल रहा हैकिराये का है ये जिस्म तेराजहां मे बस ठिकाना चल रहा हैन जाने जिंदगी कब रूठ जायेसांसों का आन
Prashant Kumar Rai
उम्दा सामाजिक परिप्रेक्ष्य की ग़ज़ल
Sk Kumar(karan)
bhut khoobsurat likha hai aapne
Manish Sahu
bahut Sundar line medam ji👍👍
Om Shankar
शिक्षित समाज विकसित हो गया है फिर ये क्यों पागलखाना चल रहा है? साधुवाद!
क्षितिज मिश्रा
बहुत खूबसूरत रचना
ओंकार नाथ तिवारी
समाज के हर पहलू को स्पर्श करती यह रचना काबिले तारीफ है ।
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