कव

आजीज शेख ...(पत्रकार)

कव
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सारांश

हामरा अपना ही हामदम हाम को दग़ा दे गया, न जाने ये कैसी जिदंगी की सज़ा दे गया। नहीं था प्यार का दुश्मन कोई भी हमारा, हामारा हामदम ही दुश्मनी का मज़ा ले गया । जिसे दिलसे चाहते थे, जिसे मन मे पूजते थे, धोखा हमें वही बेवफ़ा हामदम दे गया। तिरछी निगाहों से हाम को देखना उसका, प्यार भरे शोलों को हवा दे गया। .....#.आजीज शेख..
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