कल, आज और माँ -1

शोभा शर्मा

कल, आज और माँ  -1
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सारांश

एक पीढ़ी ऐसी , जिसने सबकी सुनी , खटते खटते ही बीत गई जिंदगी .घर बाहर सभी मोर्चों को सम्भाला .और अभी भी खट ही रही है .वहीं अगली पीढ़ी को अनायास इतनी स्वतंत्रता ?पिछली पीढ़ी से बदल जाने की बात कह देना आसान है मगर बदलने की प्रक्रिया कितने त्रास और टूटन देती है, कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है .ऐसे में जब जीवन मूल्य ही परिवर्तित हो गये हों.
Kamlesh Sharma
badalte parivesh me stri ko ghar bahar dono bhumika nibhakar naye or purane sanskar or kartavya palan ka abhutpurva sangam stri keval dusro ka hi dhyan rakhti apana b rakhe samman or swabhiman b
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Shashi Mishra
सभी इसी दौर गुजर रहे है।समझौता ही समय की मांग है।
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Preeti Chauhan
bahut sahi baat kahi.... har peedhi apne aap me ek alag soch ke saath apni jindagi jeeti hai.
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Beena Misra
bahut khoob, yahi Jeevan h
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Subhash Gupta
सार्थक
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DrSunita Gaur
समसामयिक अति यथार्थ परक,, मुझे बहुत पसन्द आ ती हैं ऎसी कहानियां👌लेखिका बधाई की पात्र हैं😊
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Namita
सुंदर रचना, माँ को भी जी जान लगा के काम नही करना चाहिए ,खुद भी सुकून से जीना चाहिए बच्चों को भी जीने देना चाहिए जैसे कि कहानी में माँ ने समझ लिया
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Manisha Srivastava
यथार्थ के करीब....बहुत अच्छी
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Manjary Varshney
आजकल के लडके भी jyada samzdaar ho गये है।।।बहुत cooperatively सब कांम करते है।।
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Anupma Verma
samy ka parivartan hi सर्वमान्य है
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