# ओ वुमनिया क्षमा

Geeta Pandole

# ओ वुमनिया  क्षमा
(9)
पाठक संख्या − 154
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सारांश

जिंदगी चुनौतियों का नाम है और क्षमा अपने परिवार के साथ हर चुनौती झेलने के लिए तैयार है।
Kumar Gupta
जी, अच्छा लिखा आपने ...
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Praveen Bhatnagar
bahut sunder Rachana vijeta
Nisha Pandole
jindgi ki he chunauti ma samna Irene ko tatpr tahti h merit bahna bhut achha lekhan h sada khush rho
archana
गीता जी,,प्रथमतः तो आपको कहानी लेखन के लिए बधाई..!! आधुनिक महिला जो दोहरी ज़िम्मेदारी का निर्वहन करती है,उनकी घरेलू भूमिका तो पुरातन परम्परागत है,जबकि बाहर कार्यस्थल पर बौद्धिक रूप से पूर्ण परिपक्व होना चाहिए इस मानसिकता (खासकर भारतीय समाज में) को बदलने की आवश्यकता है।ननद,देवर,सास,ससुर सारे रिश्तों को बोझ के रूप में बहू के कन्धे पर डालकर सब मुक्त हो जाना चाहते है!आखिर क्यों? बावजूद उसके अंत तक भी वुमनिया ससुर जी के एकाकी जीवन वेदना को महसूस करती है,क्षमायाचना के साथ,,बहुत खूब। गीता जी,,साधुवाद अौर शुभेच्छाएँ..!! कहानी की पृष्ठभूमि पुख्ता है,कसावट अौर भाषा शैली में परिपक्वता के लिए अच्छी लेखिकाओं को पढ़ते रहना प्रभावी कहानी लेखन के लिए सार्थक होगा।
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Archana Bele
बहुत अच्छा लिखा आप हमेशा खुश रहे
Ankit Pandole
बहुत सुंदर लेखन
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