एक थी माया

विजय कुमार सपत्ती

एक थी माया
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सारांश

मैं सर झुका कर उस वक़्त  बिक्री का हिसाब लिख रहा था कि उसकी  धीमी आवाज सुनाई दी, "अभय, खाना खा लो" ,मैंने सर उठा कर उसकी  तरफ देखा, मैंने उससे कहा ," माया , मै आज डिब्बा नहीं लाया हूं ।" दरअसल सच तो यही था कि  मेरे घर में उस दिन खाना नहीं बना था ।  गरीबी का वो ऐसा दौर था कि  बस कुछ पूछो मत ।  जो मेरे पढने का वक़्त था , उसमे मैं उस मेडिकल शॉप में सेल्समेन  का काम करता था ।
Vibhor Gaur
after a big long time got to read something really beautiful
Ritu Sharma
बहुत सुन्दर
Akkii
नि:शब्द ,,,,बहुत ही खूबसूरत रचना,,, पढ़ के रोना आया गया🙏🙏🙏 शुक्रिया सर
Renu Singh
🙏🙏🙏 प्रेम का इसे बेहतरीन उलेख नही हो सकता ।
Neelu Goel
heart touching....... very nice story
abhinav parmar
बहुत ही अच्छी कहानी मन को छू लेने वाली
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