एक थी पार्वती

आरजू वैष्णव

एक थी पार्वती
(60)
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सारांश

ये कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है |माँ और बेटी का रिश्ता बड़ा अटूट होता है किन्तु इस घटना ने किशोरावस्था में ही मेरे मन को इस कदर झकझोर दिया कि वो नन्ही सी बच्ची आज भी मेरे स्मृतिपटल पर विद्यमान रहती है |न जाने क्या कसूर था उसका ,किस बात की सज़ा मिली उसे ,क्या दुनियाँ में आना उसका गुनाह था ...ये कहानी आपको भी भावुक कर देगी ....एक बार अवश्य पढ़ें |
विजय दीक्षित
बहुत मार्मिक कहानी है, पढ़ते समय मेरे तो रोंगटे खड़े हो गए।
प्रतीक वर्द्धन अग्रवाल
देश का दुर्भाग्य। पर आज कल ये भी उल्टा ही हो रहा है। आजकल लडकिया ज्यादा तानाशाही दिखाती है।
shubh
कथा शैली अच्छी है
शोभा शर्मा
आप ने लिखा कि पार्वती की माँ पढ़ी लिखी थी ,जब एक पति से तलाक का तोहफा मिला तो आत्मनिर्भर बन कर स्वयं और अपनी बेटी को क्यों नहीं बचा पाई . एक और यमराज जैसे आदमी से नाता क्यों जोड़ा ?
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मनमोहन कौशिक
संस्मरणात्मक आपकी कहानी नारी जीवन का दुखद आइना है।उस बेकसूर लड़की पर किसी को दया नहीं आयी न उसके सगे बाप को न ही सौतेले बाप को।यह संसार कभी कभी बहुत अमानवीय क्यों हो जाता है?काश उस अबोध बच्चे को लेकर उसकी माँ घर छोड़ सकती।विवशता के कारण ही उसे अपनी बेटी को खोना पड़ा।सबकुछ भूल कर वह उस क्रूर पति के साथ उसे बेटा देकर अपने को साबित कर सकी पति का प्यार पा सकी।पर उसकी यह खुशी भी जमाने की आंखों में चुभ गई।।उस ज़माने की आंखों में जिसने उसे ओर उसकी बेटी को कभी भावनात्मक सहारा भी नहीं दिया।
Deepak Dixit
सुंदर
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Himanshu Modi
Bahot hi bhavnatmak kahani hai...
Shanta Thripathi
bahut hi hriday sparshi kahani, aanke bhar aayi.
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