एक आशिक़ी

रणजीत प्रताप सिंह

एक आशिक़ी
(35)
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सारांश

है एक आशिक़ी ये संभलती नही जो है एक आरजू बस मचलती रही जो करूँ क्या बता मुझको दिलबर मेरे मेरी दोनो आँखें तरसती रही जो .... कि हर रोज़ यूँ ही है दिल मेरा तड़पे तुघे घूरता, तुमसे मिलने को तरसे तुम नही ...
प्रतिभा राय
I read to day. your smoll poem nice good
Kavi Rohit Kumar
शानदार रचना
kusum Fauzdar
so swt,,,,,very pretty lines
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