एकादशी

अनुश्री त्रिपाठी मिश्रा

एकादशी
(12)
पाठक संख्या − 174
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सारांश

राधा फिर आज अपने ही ख्यालों में खोई सी चहकती मुस्कुराती रसोई तैयार करने में जुटी थी। एक नज़र सास ससुर पर डाली जो पुरातनकालीन टीवी सीरियलों की दुनिया में खोए बैठे थे। मां, मां, सुनिए ना आज खाने में ...
Sandhya Bakshi
O my God !😁😁😁 क्या करारा कटाक्ष ,नमक मिर्ची के साथ !👏👏👏👏👏 । वाकई अनु मैं तो ,कायल हो गई आपकी लेखनी की । आप तो बहुत ही अच्छा लिखतीं हैं । 👌👌👌 । .... और वो...' पढ़ी लिखी गँवार ' ... ये dialogue हमने भी झेला है ,... अनगिनत बार !! आपको मनोविज्ञान की गहन समझ है अनु ! बहुत ही कमाल का लेखन । 🌸 शुभकामनाएं ,एवं ढेर सारा प्यार 🌸
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विभा त्रिपाठी
घर घर की कहानी।।😂😂
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शालिनी पंकज
एकादशी तिथि में आती है इसलिए हमें भी पता नही चलता कब है पर सासु मां के व्रत से पता चलता है कि एकादसी है।बहुत बढ़िया लिखा है,अनु जी
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Hemalata Godbole
पढी लिखु बहुओंका पहले ऐसा हाल होता था अब समय बदला है।अब शायद पढीलिखी सास का हाल इससे भी आगे का है।शुभंभवतु।बधाई ।कहीकहीं अवश्य पुनरावृति है।
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Vijaykant Verma
सुंदर कहानी, पर अधूरी सी लगती है..!!💐💐
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sushma gupta
superb 😄👌👌
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Pragya Bajpai
बहुत सुन्दर प्रस्तुति अनु,बहुओ के जीवन का कटु सत्य बयां करती रचना, वाह!
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Pramod Ranjan Kukreti
बहुत खूब । भारतीय घरों में सास बहू की इस तरह की नोक झोंके आम है । सारी गलतियां बहुओं की होती है,बेटों की कभी नही।आखिर मां है ना !!!!!
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