इक गरीब माँ की उलझन

krishna Sharma

इक गरीब माँ की उलझन
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सारांश

फिर से वो स्कूल जाने की हट करेगी माँ से इस साल वो क्या नया बहाना लगाएगी बेटी के उन मासूम से सपनों को कैसे उड़ने से रोकने की कोशिश वो माँ कर पायेगी शिक्षा मुफ़्त हैं मगर दो वक़्त की रोटी वो अकेली ना ...
Kavi Rohit Kumar
सुंदर रचना। बेहतरीन
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