आहुति

प्रेरणा गुप्ता

आहुति
(38)
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सारांश

सारा धुआँ छट चुका था | सत्तर साल की गायत्री के जले हुए मृत शरीर की चिता की तैयारी चल रही थी | लोग कह रह रहे थे कि वह अपने पिछले जन्मों के पापों की आहुति देकर अब मुक्त हो गयी है | यह सब सुन कर जया के ...
Alka Jha
मार्मिक
Priyanka Sharma
आदरणीय बृजभूषण जी, कलयुग का सत्य है गीता, जिसे आपने रूप दिया है. आपकी रचना वाकई प्रशंसायोग्य है. मैं शब्दनगरी पर भी लिखती हूँ, आपको बताना चाहती हूँ की आप वहाँ पर भी अपने लेख प्रस्तुत करें, बहुत से पाठक वहाँ भी आपकी रचना को पढ़कर आनंदित होंगे, इसी आशा से आपसे ये निवेदन कर रही हूँ. यदि मेरी सहायता की आवश्यकता हो तो मुझे प्रतिउत्तर में अवश्य बताएं। शब्दनगरी पर अकाउंट बनाने के लिए लिंक shabd.in लिख के अकाउंट बनाए और अपना लेख ज़रूर प्रकाशित करें।
बृजभूषण खरे
बेहतरीन लेखन. पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.
Sir Mahendra
कुछ अधूरी सी
shobhana tarun saxena
beautiful and nicely summarised story
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अनुराधा भाटी
हृदयस्पर्शी रचना
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