आज की वैदेही

सोनी पाण्डेय

आज की वैदेही
(291)
पाठक संख्या − 18317
पढ़िए

सारांश

पिता के घर में आभा के कोई अरमान पूरे न हो सके थे, जब पहली कविता लिखी तो पिता ने मजाक बनाया, बड़ी बहन ने ये कहते हुए कविता फाड़ दी कि मुझसे मुकाबला करेगी। दूसरी उपेक्षा तब झेली जब इण्टरमीडिएट में टाॅप ...
स्वाती श्रीरामे
सत्य कथन ... 👌 👌 👌 आज के समाज में पुरुषों का दोहरा पन व्यक्त करती हुई प्रेरणा दायक कहानी ।
vandna choubey
जवाब नहीं, आपने वास्विकता को धरातल पर उतार दिया है।पुरुष सीता तो चाहता है मगर खुद राम नही बन सकता।सभी पुरुष औरतों के देह से उठकर क्यों नहीं देखते? हृदयस्पर्शी कहानी।
Asha Jha
बहुत बहुत बधाई सुंदर रचना के लिए
Abha Raizada
RAM ho ya Ravan aurat dono ke dwara chali jati hai,ye iss samaj ki vidambna hai
Milind Kumar Sahu
बहुत ही सुंदर रचना
deepa k
swayam ki raksha khud karne mei Nippon vedehi.
Susmita Banerjee
बहुत ही सुन्दर रचना
Shourabh Prabhat
बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति.... कृपया मेरी रचनाओं पर भी अपनी राय दें
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.