आखिर बचता तो प्रेम ही है

शुभ्रा कुमारी

आखिर बचता तो प्रेम ही है
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सारांश

आखिर बचता तो प्रेम ही है चाहे जिस रूप में भी बचे प्रेम जो आदि भी है और प्राप्य भी जब समस्त संवेदनाओं के जंगल से परास्त मन होने को होता है अस्त तब जगाता और बचाता तो प्रेम ही है प्रेम जिसकी जड़ें ...
Sumedha Prakash
वाह क्या कहने
abha chaudhary
लाजबाब कविता बधाई 
Richa Nidhi
What a flow of writing and emotional expression. Prem aka Love is indeed mortal and it remains always in the heart of people, no matter the soul is alive or not. I love your writng and wish you best of luck.
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Pankaj Karn
प्रेम का बहुत ही परिपक्व परिभाषा......... अति सुंदर.
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Rupam Rashmi
Very nice....adhbhut...
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Satyendra Kumar Upadhyay
खींचे जैसे शब्द ही प्रशंसा हेतु पर्याप्त हैं । मात्रा का भरपूर ज्ञान दर्शाता है । राष्ट्र भाषा का कोई ध्यान न रखती एक अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।
Achyutesh Kumar
Acchi rachna , sachmuch bachta to sirf prem hai , aapke jaane ke baad bhi ,duniya ke khate mein ...Very nice poem. Keep it up. 
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Richa Ambastha
Bahut hi sundar aviwyakti prem ki...❤
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Sriram sukla
इनक्रेडिबल 
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