आखिर कब होगी सुबह .....

ममता जोशी

आखिर कब होगी सुबह .....
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सारांश

भेदभाव सदियों से रहा है ,पुरुषों के मन में जब बात आती है औरत की , वेद हो या पुराण, रामायण या महाभारत, बताती हैं हमारे ग्रंथो की पौराणिक कहानियां , कौन नहीं जानता अहिल्या की कहानी , बलि चढ़ गयी थी ...
सरिता सन्धु
इस मानसिकता को बदलने में बहुत समय लगेगा ममता, अपनी कविता के माध्यम से आपने बहुत सही सवाल उठाया।
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Rajeev Singh
युग युगान्तर से पुरुष प्रधान रहे इस तथाकथित समतावादी समाज को सत्य का आइना दिखाती एक सशक्त कविता। 👍👍
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Ravindra Narayan Pahalwan
बहुत खूब
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Sumedha Prakash
हर युग का सत्य यही है ।
Sanjeev Jha
wah bahut sundar Kavita
Pooja Kashyap
बहुत खूब.......... ओर बिल्कुल सटीक
Meera Sajwan
बहुत खूब ममता जी।
hemant joshi
nari vytha ko ujagar karti shshakt Rachna.....  
Roopam Bajpai
कटुसत्य दी.....बहुत ज़रूरत है इस मानसिकता को बदलने की पर कब होगा ये  बदलाव ये समझ नही आता...बहुत अच्छे तरह से आपने सतयुग और कलयुग का भयानक सत्य लिखा है...सच बहुत ज़रुरत है इस मानसिकता को बदलने की...हमेशा की तरह बहुत सुन्दर लेखन आपका...सफल लेखन के लिये बहुत बहुत बधाई एवम् शुभकामनाये ?
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