अबूझ ममता

अनुश्री त्रिपाठी मिश्रा

अबूझ ममता
(16)
पाठक संख्या − 116
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सारांश

ममता के भंवर में उलझी एक मां की कहानी
M@n6i
काफी अच्छा सजोया है
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दीपेश जाँगड़े
content जबरजस्त है, "अनु" भाव मे पकड़ अच्छी है..तुम्हारी लेखों में कहानियो, कविताओं में, लेकिन इसमें दो जगह rhyming बदल गया...सिंगल rhyming होता तो और ज्यादा जबरजस्त लगता...ख़ैर अभी शुरुआत है, धीरे-धीरे पकड़ आजायेगा... जारी रखो लिखना✒️😊🕊️🕊️ और जब भी लिखो 2-4 बार चेक कर लेना कई बार ऐसे शब्द उपयोग कर लेते है, जो जरूरत ही नही होता न rhyming बनता ना ही बदलता बस लंबाई कविता की बढ़ जाती। जैसे:- "आजाद भावों के पंख तेरे, जंजीर-ऐ-रश्मो से "अनु", देख ये आगाज,कह रही है हवा, मैं तेरी हमनवा बनू।" अब इसमें दूसरी पंक्ति को ऐसे भी लिख सकते है..और अर्थ और ryhming भी नही बदलेगा.... ""देख ये आगाज, कहे हवा मैं हमनवा बनू।""
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Om Shankar
जीन भावों को छुआ है 🙏🙏 उस कल्पना की उड़ान पर जब होगी,🥀🥀 सच कहो दिल कितनी बार जार-जार हुआ होगा ।💗💗 तुम अबोध सी दिखने वाली बच्ची कैसे ये सब लिख पाती हो ? 💐💐 ढ़ेर सारा प्यार ! खुश रहो !
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Vandana Namdev Verma
बहुत अच्छा लिखते हो, इस रचना का तो वाकई कोई जवाब नहीं
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Sudhir Kumar Sharma
अद्भुत संवेदनशील मार्मिक भावचित्रण. मेरी रचना," माँ का चेहरा देखा है " को सार्थक करें
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Gyanendra maddheshia Gyani
शब्द कम पड़ रहे इस अनोखी कृति के लिए.....वाक़ई में एक शानदार कविता जो मानव समाज की सच्चाइयों से हमें रूबरू करा रही है.....👌👌👌👌👍
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Vijaykant Verma
बहुत खूबसूरत रचना..💐💐
संतोष नायक
"तू चुप हो गयी......... लाडो चली गयी।"सामयिक और बहुत ही सार्थक साथ ही कुछ सोचने पर मजबूर करती हुई।
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Asha Shukla
अत्यंत उत्कृष्ट और हृदयस्पर्शी रचना।!!!!👍👌💐💐
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Pramod Ranjan Kukreti
बहुत सुन्दर ।
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