अपूर्णता

संजीव जायसवाल ' संजय '

अपूर्णता
(258)
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सारांश

‘‘किसे धोखा दे रही हो तुम ? मैं प्रतिबिम्ब हूं तुम्हारा, ध्यान से देखो मुझे । क्या तुम्हें मेरी मांग का सूनापन नहीं दिखायी पड़ रहा ? क्या तुम्हें मेरी आंखो में एक अतृप्त प्यास नजर नहीं आती ? क्या मेरे कान प्यार के दो बोल और किसी की किलकारी सुनने के लिये नहीं तरसते ? क्या मेरा हृदय किसी और के लिये नहीं धड़कना चाहता ? क्या मेरी बांहें किसी और की बाहें थाम सुकून नहीं ढूंढना चाहतीं ? कया मेरी कोख किसी का इन्तजार नहीं कर रही ? कहां से पूर्ण हूं मैं ? क्या मेरा एक - एक अंग अपनी अपूर्णता की दास्तान नहीं सुना रहा.....?
Angel Anky
बहुत ही अच्छा व उम्दा लेख आज के भी समाज के हिसाब से बहुत ही बढ़िया कहानी इंसान चाहिए कितना भी विकास कर ले परंतु सही मायने में पूर्णता परिवार के साथ ही होती है
Dipali Nagar
आपकी कहानी बहुत अच्छी है स्त्री पुरुष के बिना अपूर्ण ही मानी जाती है l
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सुब्बु यादव
Very Nice Sir ji
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Archana Varshney
बहुत बढ़िया
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Sudha Jugran
कहानी के साथ नोट भी पढ़ा आपका।आपने यह कहानी चाहे काफी पहले लिखी हो पर यह कहानी बिलकुल भी स्त्री विरोधी नहीं हैं । स्त्री की उन्नति का मतलब पुरुष से दूरी नहीं है। अपितु स्त्री की उन्नति में पुरुष ही मददगार बने हैं किसी न किसी रूप में । और सफलता के शिखर पर पहुंचने का मतलब विवाह न करना भी नहीं है। स्त्री पुरुष दोनों पूरक हैं एक दूसरे के । फिर चाहे वे एकसाथ सफलता के शिखर पर रहें पर रहें साथ साथ । जिंदगी अगर संतुलित नहीं तो दुख देती है । यह बात सफलता के शिखर पर अकेली बैठी स्त्री को भी महसूस हो सकती है । क्योंकि उसकी सफलता पर ताली बजाने व खुश होने वाले लोग तो नीचे ही होते हैं । हाँ कुछ टैक्निकल शब्दों का बेहद हिंदी मीनिंग समझ नहीं आता। पर कहानी अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल रहती है ।
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NAMRATA TIWARI
very nice
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Prati
Beautiful Story
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Manisha Panwar
Bbbb
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Hemlata Chauhan
अति सुदर
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