अपने-अपने हिस्से की धूप

कल्पना रामानी

अपने-अपने हिस्से की धूप
(148)
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सारांश

इसी कहानी का एक अंश- अतीत से वर्तमान में लौटते ही वो सोचने लगा, अभि ने सिर्फ माँ का दर्द देखा है. काश! वो मेरे दिल में भी झाँक सकता तो जान जाता कि उनकी जुदाई में उसकी कितनी रातें रोई हैं, आँसुओं के कितने सैलाब उमड़कर उसकी नींदें बहा ले गए और अब इन आँखों की कोरों में थोड़ी भी नमी शेष नहीं. आखिर पुरुष भी एक इंसान ही होता है, पाषाण नहीं...शायद खुदा की खुदाई उसके आँसुओं के उस सैलाब में डूबने लगी होगी तभी तो...
Asha Shukla
बहुत सुंदर कहानी💐💐💐💐
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Sarita Thakur
कल्पनाजी की कहानी कविता बहुत अच्छी होती है बेमिसाल
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Meena Bhatt.
एक अच्छी रचना के लिए आभार आपका।शुभकामनाएं।
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Yasra Wasif
👍👍👍👍👍
Umesh Kumar
marm sparshi
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Uma Shrivastav
अती सुन्दर रचना लगी
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Nirupa Verma
बहुत ही सुदंर मन जीत लिया आपने
babita
अति सुन्दर
Mamta Upadhyay
बहुत खूबसूरत रचना👌👌
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