अपने-अपने हिस्से की धूप

कल्पना रामानी

अपने-अपने हिस्से की धूप
(130)
पाठक संख्या − 7901
पढ़िए

सारांश

इसी कहानी का एक अंश- अतीत से वर्तमान में लौटते ही वो सोचने लगा, अभि ने सिर्फ माँ का दर्द देखा है. काश! वो मेरे दिल में भी झाँक सकता तो जान जाता कि उनकी जुदाई में उसकी कितनी रातें रोई हैं, आँसुओं के कितने सैलाब उमड़कर उसकी नींदें बहा ले गए और अब इन आँखों की कोरों में थोड़ी भी नमी शेष नहीं. आखिर पुरुष भी एक इंसान ही होता है, पाषाण नहीं...शायद खुदा की खुदाई उसके आँसुओं के उस सैलाब में डूबने लगी होगी तभी तो...
Uma Shrivastav
अती सुन्दर रचना लगी
रिप्लाय
Nirupa Verma
बहुत ही सुदंर मन जीत लिया आपने
babita
अति सुन्दर
Mamta Upadhyay
बहुत खूबसूरत रचना👌👌
Rekha Jain
बहुत सुन्दर
Vimalkumar Jain
अच्छी है
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.