अनकही

विनीता शुक्ला

अनकही
(32)
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सारांश

बैलगाड़ी नहरिया पार जा रही थी- हिचकोले पर हिचकोले खाती हुई...कच्चे मिट्टी के पुल से, धूल के गुबार उठकर, घेराबंदी करते हुए. मंगला ने घूंघट की ओट से, झांककर देखा. नहर से लगी, धोबी काका की मडैया, धुंधली ...
Meeta Rastogi
नारी हृदय की पीड़ा का अच्छा वर्णन । good
Amita Gautam
Nice story
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शिल्पी रस्तोगी
बहुत ही सुंदर भावों के साथ एक औरत की यथार्थ परिस्थिति को अभिव्यक्त किया है 💐....
joshi paresh
aurto ki badal ni chahiye.ye sixa ki kami he. good
Malti Sengar
एक नारी की विवशता की कहानी , अत्यन्त सुन्दर तरीके से रेखाकन किया है। धन्यवाद🙏
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jay Prakash sharma
Kahaani bahut hi achieve Hai .Sando ka Mel bahut hi beautiful Hai . thanks
मौमिता बागची
bahut sundar barnan hai ek naari ki vivashta ka.. uske ankahiyon ka..
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Mëhå Gupta
bahot hi takleefdeh hai..man dukhi ho gaya
LALITA verma
समस्या का समाधान नहीं है
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ऋतेश कुमार
आंचलिक भाषा व शब्द - दृश्य सभी पात्रों में सहज समावेशित हैं।
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