अधूरा वजूद

विनीता शुक्ला

अधूरा वजूद
(186)
पाठक संख्या − 9801
पढ़िए

सारांश

अन्विता उदास सी बैठी थी. तानपूरे पर उंगली फिराकर, स्वर साधने की चेष्ठा; व्यर्थ गयी आखिर. मन में तो शलभ के ताने गूँज रहे थे, “महिला मंडल के कार्यक्रम में भाग ले लेतीं, तो कोई पहाड़ टूट पड़ता?” “तो ...
नीता राठौर
बहुत सुंदर भावनात्मक अभिव्यक्ति
puneeta
bahut achhi kahani ...balki sachchai ke kareeb....working ho ya housewife aurat ke feelings ki kadra kam hi log kar paate hain ...khud aurat bhi aurat ke mahatva ko kam karti hai ....chahe wo beti ho bahan ho saas ho ya nanad ho
रिप्लाय
madhu
beautiful story
Asha Jha
bahut sunder
रिप्लाय
Varsha Sharma
काश ऐसी सहेली सी ननद सबको मिले ...nice स्टोरी
babita
awesome story
रिप्लाय
usha 
usha jain
बहुत सुन्दर कहानी ।आज हर उस स्त्री की कहानी है जो अपने सपने ,ख्वाहिशों को छोड़कर घर को चुनकर घुटती रहती है।
Navendu Bansal
nice...sahi baat hai ...maa bcho ke liye apna sab kuch bhool jaati hai aur bche iski pervah bhi nhi karte
Babu Gaikar
खुले आसमान का परिंदा
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.