लाईट हाउस सिनेमा

शेखर मल्लिक

लाईट हाउस सिनेमा
(1)
पाठक संख्या − 941
पढ़िए

सारांश

लाइट हॉउस में मैटिनी शो के लिये बेतरह भीड़ है. ‘मुकद्दर का सिंकंदर’ लगी है. कस्बे वाले इन्तजार कर रहे थे. रेडियो और फ़िल्मी पत्रिकाओं ने फिल्म के हिट होने की सूचना देकर लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी थी. जवान लड़कियाँ घरवालों से, उनमें से जो थोड़े उनके पक्ष में बोलते थे, मनुहार कर रही थीं, “चलियेगा ना ? बोलिए ना ले चलियेगा ?”   दीदियाँ मन मसोसकर बैठी हैं, और भैया लोग यार – दोस्तों के साथ चुपके से देख आये हैं. अब पुलिया या किसी चाहरदीवारी पर कौआ – मण्डली जमाए पूरी कहानी और डायलॉग बांच-बांच के चिढ़ा रहे हैं. ‘इज्जत वह दौलत है जो एक बार चली गई तो फिर कभी हासिल नहीं की जा सकती’ घर के अंदर से रसोई से अचार के मर्तबान निकाल कर बरामदे में पड़ती धूप में रखती हुई लड़की याद करती है, ‘जय संतोसी माँ’ के टाइम तो बिन हील हुज्जत के ‘लायट हौस’ ले गए थे, और अब वही जिद कि फालतू फिलिम के लिये काहे माथा खा रही है ? कोई ढंग की लगने दो, जाना. ‘बोबी’ के टाइम भी एही बोलके नहीं ले गए.’ लड़कियाँ किसी गार्ड के बगैर ‘लायट हौस’ नहीं जा सकतीं. इस दौर में, यों भी वे अकेले कहीं जाने के लिये मुक्त नहीं हैं. उनके साथ घर की ‘बड़ी’ स्त्री का होना अनिवार्य प्रोटोकॉल है ! वे लड़कों के द्वारा उवाचित फिल्म के इस डायलॉग से प्रेरित होती हैं, “जिंदगी का अगर सही लुत्फ़ उठाना है ना, तो मौत से खेलो...” मगर वे यूँ भी कई तरह से मर रही हैं... पैदा होने से पहले, पैदा होने के बाद... शादी से पहले, शादी के बाद... मरने से पहले और मरने के बाद ! अब क्या सिनेमा जाने के लिये भी मरें !
Vineet Nigam
achcha likha hai jyadatar shahron ke single screen cinemahall ka yahi haal hai
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.