मेरा सपना

शशि कांत सिंह

मेरा सपना
(17)
पाठक संख्या − 6982
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सारांश

एक ऐसा सपना जिसे याद कर आज भी मेरे रूह काँप उठती है. जिसने माँ के पवित्र रिश्ते को भी शक के कटघड़े में खड़ा कर दिया था ...अवश्य पढ़े और अपनी प्रतिक्रिया दे .
विशाल कुमार जोशी
नकारात्मक टिप्पणियाँ करने वाले पाठकों से विनम्र निवेदन है कि कृपया इस रचना को कहानी के रूप में ही देखें। मानवीय संवेदनाओं से जोड़कर इसका विश्लेषण न करें। कहानी एक सपने पर आधारित है और सपने में कुछ भी हो सकता है।
devshri
disgusting just think n write , kuch bhi likh dena kahani nhi ban jata 😠😠😠
Ratnesh Upadhyay
The most despicable story ever
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Namita Arora
horrible........ek bachcha apni maa ki god mein apney aap ko surakshit feel karta hai...but aapney to maa ki paribhasha hi badal di......sabsey bura samvaad......chaachi ke dwara bola gayaa.....yeh teri maa ka hi kiya dharaa hai......seriously........wt u want to say .......just think.......
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Veena Jha
This type of stories should not be published in Pratilipi...
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jay prakash
Thrilling story....
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