दोनो की सांझ

दोनो की ही सांझ ढल रही
आज की भी और माँ की भी...
बोर हो गयी रोज की इसी
किच किच से , इन्ही के लिये
जीवन का सबसे अनमोल समय
गवां दिया साथ ही गवां दिया
हमसफ़र का साथ भी !

बेवजह ही बीनने बैठी है गेंहूँ के
कुछ दाने , जिनमे से फटक कर
कुछ छिल्के आगे की ओर गिर गये....
जीवन की भागदौड़ में छूटी
खुशियों की तरह ,
अभी भी कुछ कंकर पत्थर कड़वे
अनुभवों से रह गये है बाकी...
जो मुंह का स्वाद बिगाड़ते है
जीवन की खिचड़ी में दांतो के बीच आयी
किरकल को तरह...

लगता है जीवन भर छलनी में छन छन कर...
बारीक आटे के रूप में जो अपना सर्वश्रेष्ठ दे देती
ऐसे ही आटे से बचे चोकर सी तो माँ होती
पीछे बचा लेती जीवन के कुछ दरदरे से किस्से ,
कुछ आटे की गांठो के रूप में सख्त से हिस्से ।।

नेहा भारद्वाज
मौलिक एवं अप्रकाशित

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