जो अधूरा रह जाये..वही तो इश्क़ है...

रात का गहरा अंधेरा। सड़क के आस-पास लगे बड़े-बड़े खंभो पर बड़ी-बड़ी स्ट्रीट लाइट्स। गहरा सन्नाटा जिसमे शांत खड़े व्यक्ति को उसकी सांसे भी साफ तौर पर सुनायी दे जाए। बेधड़क सी श्रेया अपनी महंगी ऑडी को दौड़ाए जा रही थी। "श्रेया जयेश्वरी" इंडिया की टॉप राइटर। बचपन से लिखने के शौक ने उसे कम उम्र में ही देश की नामचीन लेखिकाओं में शुमार कर दिया था। अपने बचपन के ख्वाब को पूरा करने के बावजूद श्रेया का मन बेचैन था। अक्सर रात को बिना किसी सुरक्षा के श्रेया अपनी कार से घूम करती थी। जैसे रात की खामोशी में वो कुछ खोज करती हो। उसे हर वक़्त ऐसा लगता था की एक रात ऐसी होगी जब उसे वो खुशी मिलेगी जिसके कारण वो हमेशा बेचैन रहा करती थी। आज एक सम्मान समारोह में सम्मानित होने के बाद घर से वापस अपनी कार लेकर निकल पड़ी। कोई रोकने वाला भी तो ना था उसे। जब कॉलेज पूरा हुआ तो घरवालों ने बिना उसकी मर्जी के एक लड़के से उसका विवाह तय कर दिया था। बस अपने सपनो को उड़ान देने की खातिर उसने वो किया जो उसे सही लगा। बारात आने के 1 घंटे पहले ही अपना सामान ले अपने घर से चली गयी। लड़के वालों का अपमान न हो जाये इस वजह से उसके घरवालों ने उसकी जगह उनकी छोटी बहन को मंडप में बैठा दिया। उसकी छोटी बहन और उसके नॉन-आइडेंटिकल ट्विन्स (ना पहचान पाने वाले जुड़वा) होने के कारण किसी को समझ नही आया की मंडप में श्रेया बैठी थी या उसकी बहन मिताली। और उन दोनों की शक़्ल मिलने के कारण ये बात उजागर होने से पहले ही दब गई। लेकिन घर छोड़ने का उसके फैसले ने कभी उसे आत्मग्लानि महसूस नही होने दी।
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उसी हाईवे पर एक नौजवान चला जा रहा था। उसके कपड़ो से साफ तौर पर समझ आ रहा था की वह सेना में नया-नया भर्ती हुआ था। हरी वर्दी की जेब पर पीले रंग के धागे की कढ़ाई से "शिखर शर्मा" लिखा हुआ था। शिखर बेधड़क सा चलता जा रहा था। उसकी ट्रेनिंग के आखरी दो महीने बचे थे जिसमे उसे नाईट ट्रेनिंग दी जा रही थी। घर में रखी उसके बड़े भाई की बाइक खराब होने और रात को कोई साधन न मिलने के कारण उसे कैम्प पर पैदल ही जाना पड़ रहा था। हालांकि उसके लिए ये तो रोजमर्रा की वॉक की तरह था। शिखर के माता-पिता बचपन में ही अलग हो गए थे। एक झगड़े के कारण उनका तलाक हो गया था। उनके तलाक़ के कारण कही शिखर की पढ़ाई में नुकसान हो इसलिए उसके बड़े भाई विवेक ने कोर्ट में अलग रहने की अर्जी दाखिल कर दी। कोर्ट में इस अर्जी का फैसला विवेक के पक्ष में आया। अलग होने के बाद विवेक ने अपना बिज़नेस ओपन किया और उसकी लगन और मेहनत से 2 साल के अंदर ही उसका कारोबार आसमाँ की ऊंचाइयों को छू गया। वैसे शिखर चाहता तो अपने बड़े भाई के बिज़नेस में हाथ बता कर आराम की जिंदगी जी सकता था पर उसका आर्मी जॉइन करने के सपने ने उसे किसी और राह पर चलने से रोक दिया।  विवेक ने भी उसे नही रोका क्योंकि उसने शिखर से उसके बचपन में वादा किया था कि उसे अपने जीवन में जो करना है वो कर सकता है। उसे पूरी स्वतंत्रता है। बस अपने अडिग फैसले को उसने अपनाया और चल पड़ा अपने ख्वाब को पूरा करने।
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श्रेया ने जब शिखर को जाते हुए देखा तो अपनी कार को शिखर के बगल में रोक दी। साइड वाली सीट की विंडो को नीचे किया। "लगता है आप कही जा रहे है।" श्रेया ने शिखर से सवाल किया। "जी मोहतरमा।" शिखर ने मुस्कुरा कर कहा। "तो.... इफ यु डोन्ट माइंड। क्या मैं आपको लिफ्ट दे सकती हूं।" श्रेया ने पूछा। "नही मुझे इसकी कोई खास जरूरत नहीं है।" उसने कहा। "अब अगर मैं देश के एक सैनिक को लिफ्ट नही दे सकती तो इस महंगी गाड़ी को खरीदने का कोई मतलब तो निकलने नही वाला। बेहतर होगा की आप मुझसे लिफ्ट ले ले। वरना मेरे मन को शांति नही मिलने वाली।" श्रेया ने शिखर को कन्विंस करते हुए कहा। "चलिए अब आपके मन को रखने के लिए हम चलते है।" शिखर ने एक क़ातिल मुसकान के साथ कहा और कार में श्रेया की बगल वाली सीट पर बैठ गया।
"कहा जाना चाहेंगे आप??" श्रेया ने पूछा। "यहां से 10 किलोमीटर दूर बरवाला घाट के साइड में मेरी ट्रेनिंग एकेडमी है। बस वही जाना है। और आप कहा जाएंगी।" शिखर ने श्रेया की तरफ रुख करते हुए कहा। "हम तो अनजान मुसाफिर है हुज़ूर जहाँ मन की लय बहेगी वही चल पड़ेंगे।" श्रेया ने थोड़ा शायराना अंदाज़ में कहा। "शायरी तो ख़ूब फरमाई आपने मोहतरमा लेकिन फिर भी आप कहा रहती है।" शिखर ने थोड़ा हंसकर कहा। "यहाँ 5 किलोमीटर पहले जो शालीमार टाऊनशिप है वही पर मेरा बंगलो है।" श्रेया ने कार ड्राइव करते हुए शिखर की तरफ देखा और वापस सड़क पर देखने लगी। नजाने क्यूँ श्रेया की नजरें बार-बार शिखर के कसैले शरीर पर टिक रही थी। इसका आभास उसे स्वयं नही हो रहा था। "मतलब आपका घर पीछे था। फिर भी आप इतना आगे निकल आयी। कोई कारण।" शिखर ने सवालिया निगाहों से श्रेया की तरफ देखा। "बस यूँही। मुझे रातों में बेखौफ घूमना पसंद है।" श्रेया एक बार फिर शिखर पर नज़र डालते हुए बोली। "बहुत बढ़िया।" शिखर थोड़ा चहक कर बोला। थोड़ी देर में कार वह पहुंची जहाँ शिखर को जाना था। इस पूरे सफर के बीच श्रेया शिखर को बार-बार देख रही थी। वहाँ पहुंचने के बाद शिखर कार से उतर गया। श्रेया भी गेट ओपन करके शिखर के सामने कार से टिक कर खड़ी हो गयी। "थैंक यू मिस.... सॉरी मैं तो आपका नाम पूछना ही भूल गया। " शिखर ने हंसते और सर खुजाते हुए कहा। "जल्द पता चल जाएगा। शिखर जी। ये मुलाक़ात इतनी आसानी से खत्म नही होने वाली।" श्रेया ने इतना कहा और अपनी कार में बैठ गयी। शिखर उसे बस यूँही जाते हुए देखता रह गया और उसने खुद से कहा, "शायद मुझे भी यही लगता है.....
TO BE CONTINUED....in part 2nd...
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