जिद

जिद
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मुंह-अंधेरे छेनी-हथौडी लिए  दशरथ का पहाड़ के तलहटी पर खटखट-खटखट प्रारंभ हो जाता.दिशा-मैंदान के लिए निकले उनींदे पुरुष-महिलाएं मन -ही -मन उसके सनकीपन को कोसते उपयुक्त कोने में छिपकर फारिग होने लगतें.सालों से रोज़ का यह किस्सा है.जब से इसकी बीमार पत्नी 'फाल्गुनी' गुजरी है,दशरथ को पहाड़ काटने का जुनून सवार हो गया है. कहता है कि, पहाड़ काटकर सड़क बनायेगा और वजीरगंज का पचपन किलोमीटर का रास्ता पंद्रह किलोमीटर कर देगा,ताकि,दवाऔर डाक्टर के अभाव में गांव में फिर कोई फाल्गुनी की मौत न होवें. भला छेनी-हथौडी से पहाड़ कटेगा...मंझियां एकदमे पगला हो गया है.
    लोगों के विचारों से दशरथ-मांझी का कोई सरोकार नहीं था.चना-मकई का सत्तु खाकर जरा छांह में सुस्ताते दशरथ की आंखों में फाल्गुनी का मासूम चेहरा झलक जाता. भोर-अंधेरे उठती फाल्गुनी आसपास से चैली-लकडी आदि को चुन-बीछकर जलावन की व्यवस्था करती,मांड़-भात,घट्टा,मटर-खेसारी,जो भी घर में रहता, बड़े मनोयोग,कूट-पीसकर पकाती.वह पूरी कोशिश करती कि,बच्चों और दशरथ को भरपेट खाना मिल सके.बेचारी खुद जीने-भर खाती.दो-पैसे कमाने के जुगत में गांव के धनाड्य घरों में काम के तलाश में भटकती रहती,उन्हीं के घरों से सबके लिए एवं अपने लिए लुग्गा-साड़ी की व्यवस्था करती.दशरथ को याद नहीं आता कि कभी उसे फाल्गुनी को नई साड़ी दिलाई हो.अलबत्ता, बच्चों के लिए एक-दो बार मेले वगैरह  में नये कपड़े खरीदा भी था.दशरथ की आंखें भींगने लगी तो,फटे-गमछे से आंसू झट पोंछ लिया,और इधर-उधर देखने लगा, कहीं किसी ने उसे रोते तो नहीं देख लिया.वैसे इस बियाबान में भला कौन  आयेगा ?
            अपनी तरफ से दशरथ  हमेशा कोशिश करता कि ज्यादा से ज्यादा मजूरी करें ताकि,राशन कहने लायक कुछ सामान खरीद सके.हठात्  दीवाली के बाद के दिन उसकी स्मृतियों को झकझोर गयें,जब रात में जले दीयों के बचे तीसी के तेल को इकट्ठा कर ढिबरी जलाते हुए पहली बार फाल्गुनी ने कहा था,
                       "ए गो ललटेन रहते हल तो ठीक रहतइ ,ढिबरिया के धुंआ से कलेजा जारे लागत है."
                 ढिबरी की रोशनी में फाल्गुनी का सांवला रंग तांबे-सा दमक रहा था.मजदूरी से खुरदुरे हुए हाथ को थोड़ा सरसों के तेल से मुलायम करने का असफल प्रयास कर,उतावला दशरथ मजबूती से पत्नी को अपने आगोश में ले लिया और उन्हीं पलों में उसे एक लालटेन दिलवाने का वादा किया.उसके बाद दो बच्चे और आ गए, किंतु 'लालटेन' का संयोग नहीं बना.
                अक्सर अभाव की गृहस्थी में जहां रोज लड़ाई-झगड़े, मारपीट आदि आम होते हैं, वहां न जाने कैसे दशरथ और फाल्गुनी का प्रेम पनपकर जड़ जमाने लगा था.पहाड़ के दूसरी तरफ वजीरगंज में अहले सुबह गुड़ वाली काली चाय पीकर दशरथ मजूरी करने जाता तो,प्राय:रोज़ ही फाल्गुनी पहाड़ चढ़कर उस पार उसे दोपहर का खाना पहुंचाने आती थी.दशरथ झूठ-मूठ उसे डांटता-----"काहे मरते आती हो? गिर-पड़ जायेगी तो,एक लोटा पानियो ले हम तरस जायम."
               फाल्गुनी बोलती कम थी,बिटिर-बिटिर उसे ताकती हुई, आंखों से ही डपट देती.दशरथ को उसकी इस अंदाज से खूब मजा आता.सच तो यह है कि,उससे मिलने के बाद वह दुगने उत्साह से काम करता था.लगता है कि, फाल्गुनी फिर पेट से है.दो-चार दिन पहले उसे कुआं पर फिर से चक्कर आया था.तो,बैद-जी की पत्नी ने कहा था,
         "अरे ,तुम्हें कमजोरी बहुत है, पीली पड़ रही हो,ताकत की चीजें खाया कर."
           किंतु अनपढ़-जाहिल हम उनकी  बात पर ध्यान ही नहीं दियें. यही सोच में थे कि,आंगन में फूल खिलने वाला है.उस दिन खाना खिलाकर लौटते समय शायद पहाड़ पर चक्कर ही आ गया होगा तभी तो,वह खाई में जा गिरी.दशरथ के कलेजे पर शूल सा उठा...खटोला पर लादकर वजीरगंज के उस घुमावदार रास्ते में शरीर का बचा-खुचा खून भी निकल गया और फाल्गुनिया चल बसी.हां, समय पर इलाज मिलने से वह बच जाती,आत्मग्लानि से भरा दशरथ चीत्कार उठा और उसने भीष्म प्रतिज्ञा कर ली---
       "न दरकार बा सरकार और जमींदार के.भगवान के दैल दु गो हाथ से हम इस पहाड़ के सीना पर सड़क बनायम."
            लोगों को लगा कि शायद बीच मझधार में पत्नी छोड़ गई है तो वियोग में कह रहा है.लेकिन साल-दर-साल
उसके पहाड़ काटने के जुनून से मुक्त न होने पर लोगों ने उसे पागल मान लिया और गांव वाले ही उसके भोजन आदि की व्यवस्था कर देते.एक शिव मिस्त्री ही था जो दशरथ के प्रति सहानुभूति रखता और उसे समय-समय पर छेनी-हथौडी मुहैया करवा देता.बच्चे भी किसी तरह पलते रहें और धीरे-धीरे मजदुरी में लगते गयें.
            दसियों साल गुजरने पर एक दिन लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब,पगलवा मंझियां ने सचमुच एक छोटी सी सड़क का निर्माण कर दिया. एक समर्थ सम्राट द्वारा पत्नी के वियोग में ताजमहल बनने की कहानी तो दुनिया जानती है , किंतु,एक सामर्थ्यहीन द्वारा छेनी-हथोड़े से प्यार में मानव-कल्याण के लिए पहाड़ के सीने को फ़ाड़ देने के जज्बे ने दांतों तले उंगली दबवा दी. उसके लगन से   लोग प्रभावित होने लगें और धीरे-धीरे उसे काम में सहयोग करने लगें, इंसान मुट्ठी में तब्दील हो गया तथा नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया.
                और आज बाईस बरस बाद,अपने मिशन में कामयाब, दशरथ गट्ठे पड़े रुखी हथेलियों की रेखाओं में  फाल्गुनी को ढूंढ, कहना चाह रहा था कि,"देख,आज मैंने प्रायश्चित कर ली है, मेरे चलते तेरी मौत हुई थी न!और हां पहाड़ को भी सजा मिल चुकी है,तू हमरा  छिमा कर दें."
     पता नहीं,फाल्गुनी  उसकी बात सुन भी पाई या नहीं,परंतु उसकी झोपड़ी के बाहर लोगों का हुजूम उमड़ता जा रहा था और जोर की आवाजें आ रही थी---माउंटेनमैन जिंदाबाद! माउंटेनमैन जिंदाबाद!!
         दशरथ झोपड़ी में पेट- दर्द से बेबस अपनी छेनी और हथौड़ी की ओर ताकते हुए, फाल्गुनी की स्मृति में डूबा हुआ था.
                                     ---पूूूनम (कतरियार)

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