पुरानी हवेली का राज कहानी भाग 20 में कुल 2998 शब्द थे। मुझे लग रहा था कि मेरे पाठक मेरी कहानी को पढ़कर उसपर कुछ प्रतिक्रिया देंगे। पर कुछ महाज्ञानी महा विद्वान पाठकों नेे पूरी 2998 शब्दों की कहानी में नोटिस भी किया तो क्या बस ये दो पंक्तियां।


कहानी का पार्ट इतनी देर से क्यों आया और अगला भाग कब आएगा ? लेखक की मर्ज़ी है तो ऐसा कोई सवाल पूछने का कोई अर्थ नही आपको उत्तर नही मिलेगा। कहानी के बारे में आपकी क्या राय है ? वो अवश्य बताएं ताकि अगला भाग ओर रोचक बनाया जा सके।

मतलब सोचने वाली बात है। पूरी कहानी में उन्होंने ये ध्यान नही दिया कि कहानी में क्या लिखा है ? कहानी अच्छी तरह आगे बढ़ रही है या नही। पात्र कैसे है? भाषा शैली कैसी है ?

अगर कहानी भूल भी गए तो लेखक से बोल सकते है कि अगले भाग में पूरी कहानी का सारांश प्रस्तुत करें ताकि कहानी को पढ़ने में मजा आए। कहानी टाइम पास के लिए पढ़ी जाती है या एग्जाम में आएगी इसलिए । अगर भूल भी गए है तो फिर से पढ़ लीजिए। ये भी क्या बात हुई?

पर सुनने को मिलता है दो कौड़ी के राइटर, सड़कछाप राइटर, इगो वाले, रूड, घटिया लेखक, थोथा चना बाजे घणा और इसकी तो रिपोर्ट करो।

खासकर नितिन गुप्ता नाम के पाठक ने तो हद ही कर दी। भगवान जाने उन्हें और कुछ काम है भी या नही। मन भर भर के कोस रहे थे। जैसे मैंने लास्ट पार्ट में इनकों ही टारगेट करके लिखा हो। मतलब कमेंट करने पर कोई इस घटिया स्तर पर उतर सकता है। समझ नही आता। मैं उन्हे भाई भाई कह कर संबोंधित कर रहा था और वो मुझे कोसने में लगे थे। बार बार मना करने के बाद भी चुप नही हो रहे थे।

दूसरें पाठकों के काॅमेंट में जाकर लिख रहे है कि वो मेरी रिपोर्ट करे। मतलब लेखन के क्षे़त्र में खुद ने कुछ लिखा नही। और जो लिख रहा है उससे भी दिक्कत है।

एक ओर महाशय डाॅ मनीष जोशी जी 22 सितम्बर 2018 को करूण नायर की कहानी पर किए गए मेरे काॅमेंट पर जाकर मुझे बता रहे है कि मैं भी वैसा ही कर रहा हूं।

आकाश राठौर जी, निकिता अटेर जी, साधना जैन जी, रूचि सुमित अग्रवाल, बस ये कहने मेरी कहानी पर आए थे कि अब आगे लिखो या मत लिखों कोई फर्क नही पड़ता। हम कहानी भूल चुके है।

नीलम कुमारी जी का कहना है कि आपको जवाब न देना है तो चुप रहे कोई आपके गले पर छुरी नही फेरता। मतलब में गले पर छुरी फिराने का इंतजार करू। तब कुछ कहूं।

इन बातों पर गुस्सा नही हंसी आती है। इतना टाइम सकारात्मक चीजों में लगाते तो शायद अच्छा होता जितना किसी लेखक की कहानी की समीक्षा की जगह उसके स्वभाव की बुराई करने में लगा रहे थे।

सबसे पहली बात तो ये कि प्रतिलिपि एक पाठक और लेखक दोनों के लिए एक निशुल्क प्लेटफार्म है। दूसरी बात कि कोई पाठक कभी किसी को पर्सनली निमंत्रित नही करता है कि आप मेरी रचनाएं पढ़िए। और जिनको भी जिस लेखक की रचनाएं अच्छी लगती है। वो अपनी पसंद और रूचि के अनुसार उन्हें पढ़ते है उन्हें फाॅलों करते है।
लेखक खुद की आत्मसंतुष्टि के लिए लिखता है। उसे अच्छा लगता है अगर पाठक उसकी रचनाओं में कोई कमी या अच्छाई बताते है। पर मेरे या किसी भी लेखक पर पर्सनल काॅमेंट करना क्या सही है ?

मैं घमंडी हूं ? कड़वा बोलता हूं ? मुझे नही लगता इन बातों से मेरी कहानियों का कोई संबंध है। पाठक यहां मेरी रचनाएं पढ़ने आते है। ना कि मेेरे चरित्र या स्वभाव को जानने के लिए। और अगर आप मेरे स्वभाव में रूचि ले रहे है तो आप गलत रास्ते पर जा रहे है।

मैं स्वभाव में कैसा हूं ? ये उन लोगों से पूछिए जिनसे मैं बात करता हूं। मुझे किसी से भी कोई चरित्र प्रमाण नही चाहिए।

किसी लेखक की एक रचना के एक काॅमेंट या एक बात के आधार पर आप उसके सम्पूर्ण चरित्र को नही समझ सकते। कभी कभी किसी को समझने के लिए पूरी जिंदगी कम पड़ जाती है। व्यक्ति का स्वभाव परिस्थितियांे और व्यक्तियों के अनुसार बदलता रहता है।

कई पाठक कह रहे थे कि आप दूसरे पाठकों के काॅमेंट में गलत बोल रहे है, कड़वा बोल रहे है।

तो उनको बता दूं कि मैं प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग हूं। आप मेरी रचनाओं के बारे में बोलेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा। पर पर्सनल काॅमेंट करंेगें तो क्यों सुनुंगा ?

जो जैसा बोलेगा वो वैसा सुनेगा। कुछ पाठक कह रहे है थे कि आप लेखक हो, आपको ऐसे बात नही करना चाहिए।

पर पाठक भी एक इंसान ही होता है। उसकी लाइफ में कुछ परेशानी, दिक्कत हो सकती है। वो किस मूड में है। आपको नही पता होता है।

और मुझे वैसे नोबेल शांति पुरूस्कार तो लेना नही जो मैं चुप बैठूंगा। हर इंसान को बुरा लगता है जब व्यक्ति बिना उसे जाने उसके बारे में उल्टा सीधा बोलें।

जब तक आप किसी व्यक्ति से पर्सनली बात नही कर लेते। उससे मिल नही लेते। उसके स्वभाव को नजदीक से जान नही लेते। तब तक उसके स्वभाव के बारे में बोलना क्या सही है ?

क्या किसी पाठक की रचना के 2998 शब्द में से केवल एक पंक्ति पर इतना बवाल मचाना सही है।
मेरे स्वभाव के बारे में मुझसे जाने बिना आपका राय बनाना गलत है। मैं हर व्यक्ति के अलग अलग हूं। प्रतिलिपि पर अंकित महर्षि जी, अरूण गौड जी़, आयुषी सिंह जी, पुनीत तिवारी जी ऐसे लेखक और पाठक है जिनसे मैं व्हाट्सएप भी जुड़ा हूं। और जिनसे समय समय पर बात होती रहती है।

ये अगर मेरे स्वभाव के बारे मंें कुछ कहें तो मैं समझ सकता हूं। क्योंकि इनसे मैंने बातें की तो ये मेरे स्वभाव को कुछ तो समझ गए होंगे।

पर वो लोग जिन्होंने आज तक कभी कोई बात नही कि जब वो मेरे स्वभाव के बारे में कहें तो बुरा तो लगेगा ही ना। लेखक भी इंसान ही होते है कोई देवदूत नही।

बस कुछ इग्नोर करते है और कुछ जवाब दे देते ।

प्रतिलिपि पर मैं अपने उन पाठकों का भी शुक्रगुजार हूं जो हमेशा मुझे सपोर्ट करते है। चाहे यूट्यूब पर 1000 सब्सक्राइब वाली बात हो या कोई सवाल न करने वाली बात। इन्होंने हमेशा मुझे सपोर्ट किया। और मैं लिखता भी इन्ही पाठकों के लिए हूं।

वरना नितिन गुप्ता जैसे पाठक तो लेखकों को लिखना ही बंद करवा दे।

खैर इन को छोड़ के मैं अपने अच्छे प्यारे और हमेशा सपोर्ट करने वाले पाठकों को दिल की गहराइयों से नमन करता हूं।


जया, नाहिद खान, शीतल चकोले, सचिन कुमार सिड, मेनका खन्ना, प्रतीक मोहन्ती, रिषभ शुक्ला, शालू गिलडियल, भगीरथ कुमार, संध्या राजपूत, प्रियंका संधू, कल्पना, भव्या चैधरी , मुहम्मद अफजल, अभिषेक वर्मा, नाजीश परवीन, रवि कश्यप, अमित प्रताप, रिया मित्तल, दीपा शुक्ला, वर्षा सिंह, अनुपम पांडे, सौरभ सोनी, आशा वर्मा, अंशुल सिंह, सुमन बर्नवाल, आशिक रेयीन, प्रति, ममता परनामी, अनुपम कुमार, अयान मलिक, शालिनी सिंह।


आप सभी का धन्यवाद पाॅजिटव बाते करने, मुझे सपोर्ट करने और इनकरेज करने के लिए।
वैसे इस सभी पाठकों में से भी आशिक जी ने बहुत अच्छी बात कही। और मुझे उनकी बात उनके समझाने का तरीका अच्छा लगा।

आगे से अब पाठकों से इस तरह का कोई संवाद नही करूंगा। ये आखिरी संवाद था। मुझे पता है सब पाठक एक जैसे नही होते। कुछ गलत बात को भी पाॅजिटिव लेते है और कुछ सही बात को भी नेगेटिव।
कुछ कहते ही मेरे परम ज्ञानी परम विद्वान पाठक मेेरा चरित्र प्रमाण पत्र देने लग जाएंगे।

आज कहानी के 21 भाग होने जा रहे है। इसलिए पिछले 20 भागों का सारांश यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। जो कहानी भूल गए है वो जरूर पढ़े। और जिन्हें याद है वो सारांश के अंत में अब आगे लिखा है उस जगह से कहानी का पढ़े। ताकि आपका समय बच जाएगा।


सारांश


ये कहानी है कुछ बच्चों की। जिनमें रानो और चंदू गर्मी की छुट्टियों में अपनी नानी के घर आते है। तब एक दिन उन्हें पुरानी हवेली के बारे में पता चलता है। उनके ममेरे भाई सोनू, राजू, गोल,ू प्रभ,ु दीनू मिलकर उन दोनो को पुरानी हवेली के बारें में बताते है। पर रानो उन बातों से डरती नही है। और सब भाइयों के साथ पुरानी हवेली में जाती है। वहां उन्हे केवल लकड़बग्घे मिलते है। और कुछ नही। उनकी हंसी से ही वो कुछ देर के लिए डर जाते हैं पर सच्चाई जानकर उनके मन से भूत प्रेत का डर निकल जाता है। और वो ये मान कर कि उन्होंने पुरानी हवेली का राज जान लिया है। घर आ जाते है।
पर यही उनकी सबसे बड़ी गलती थी। दीनू पुरानी हवेली से एक रहस्यमयी अंगूठी उठाकर ले आता है। जिसे पहनने के बाद उसे डरावने सपने आते है। बाद में वही अंगूठी रानो भी पहन लेती है। और उसे भी डरावना सपना आता है। ये बात सुनकर चंदू के अलावा सभी रानो की बात मान लेते है पर चंदू नही मानता है। और वो अंगूठी पहन लेता है पर कुछ देर बाद उसे भी डरावना सपना आता है जिसके बाद सब मान लेते है कि पुरानी हवेली का कोई भूत उनके पीछे पड़ गया है। तब दीनू उन्हें अंगूठी की बात बताता है।
रानो के कहने पर सोनू दीनू गांव मंें जाकर पुरानी हवेली के राज के बारे में जानकारी पता लगाते है। और उन्हे पता चलता है कि उस हवेली में एक अंग्रेज और एक तांत्रिक की आत्मा भटकती है जिसे उनके ही पूर्वज ने मारा था।
उसी रात चंदू भूत को कोसता है तो वो भूत उसके शरीर के अंदर आ जाता है और पूरे घर में तूफान मचा देता है। पर मातारानी के सिंदूर ओर कलावे से वो भूत उसका शरीर छोड़ जाता है।
अगले दिन रानो सोनू को फिर से गांव भेजती है ताकि समस्या का कोई समाधान मिल सके। पर उसी दिन चंदू के उपर फिर से भूत का सायंा आ जाता है वो जैसे तैसे सोनू दीनू उसे फिर से बचाते है।
रानो उनसे पूछती है कि उन्हे क्या पता चला पुरानी हवेली के बारे में तो सोनू उन्हे बताता है कि पुरानी हवेली में कोई सनकी अंग्रेज वैज्ञानिक रहता था जो तांत्रिक के साथ मिलकर अमर होने या लकड़बग्घा मानव बनने की कोशिश कर रहा था। पर उसका अंत कैसे हुआ ये पंडित जी नही बता पाए। वो उन्हें काला धागा देते है जिससे शैतान उनके नजदीक न आ सके। जिसे सभी बांध लेते है।
रानो उसी रात उस धागे का उतार कर वो रहस्यमयी अंगूठी पहन लेती है। और सो जाती हैं और भयानक डरावना सपना देखती है। जिसमें वो मरते मरते बचती है और उसके भाई उसे नींद से जगा देते है।
पर चंदू इस बार फिर से गुस्सा हो जाता है और अंगूठी को घर से दूर अंधेरे में फेंक देता है। उसी रात भयानक तूफान आता है। अगले दिन सब अंगूठी के गायब होने की बात भूल जाते है। और ये देखकर कि उनके साथ कुछ गलत नही हुआ है। सोचते है कि अंगूठी फेंककर उन्होंने अच्छा ही किया है।
पर अगले ही दिन गांव में एक साथ दो मौत हो जाती है। जिसका कारण वो अंगूठी ही थी। दूसरे व्यक्ति अंतिम यात्रा में एक बच्चा उस अंगूठी को पहन लेता है। जिसे सोनू अपना दिमाग लगा कर बचा लेता है। उस दिन वो पहली बात ठाकुर बाबा के बारे में जानता है जिन्होंने ही उस अंग्रेज शैतान और तांत्रिक का अंत किया था।
उसी रात सोनू रानो ओर दीनू मंदिर वाले पुजारी से मिलने के लिए रात में निकलते है। मंदिर पहुंचने पर पुजारी जी को वो सारी बात बताते है। तब पुजारी जी उन्हे पुरानी हवेली की सारी कहानी बताते है।
लेकिन सोनू के मंुह से ठाकुर बाबा के पुजारी यानि उनके गुरू के बारे में सुनकर पंडित जी रात में ही ठाकुर बाबा के स्थान के लिए निकल जाते है। इधर सोनू रानो और दीनू वापस आ जाते है।
पर रानो चुपचाप चंदू के साथ पंडित जी की मदद के लिए निकल जाती है। बाद में सोनू को ये बात पता चलती है तो सोनू और राजू भी उनके पीछे चलते है।
उधर रास्ते में रानो और चंदू को पंडित जी जंगल के रास्ते में बेहोश मिलते है। वो उन्हे ठाकुर बाबा के स्थान पर लेकर जाते है जहां उन्हें पता चलता है कि शैतान ने एक बच्चे की बलि दे दी।
सोनू और राजू ने अपनी आंखों से लकड़बग्घों को उस बच्चे का खाते हुए देखते है। इधर घर पर उनके मम्मी पापा दादी को पता चला जाता है कि घर के चार बच्चे घर से गायब है। तो उनके घर के दो पुरूष उन्हें ढंूढने के लिए निकल जाते है।
जंगल में ठाकुर बाबा के स्थान पर आग लग जाती है। जिसे रानो, दीनू और पुजारी मिल कर बुझाने की कोशिश करते है।और उधर सोनू प्यास से बेहोश हो जाता है जिस वजह राजू को दुबारा से उस सुनसान जगह पर जाना पड़ता है जहां उन्होनंे उस बच्चे को मरते देखा था।
पुरानी हवेली का शैतान भी एक बार फिर अपनी पूरी ताकत से जाग उठता है। और सोनू के घर की तरफ बढ़ जाता है जिसे दीपेन्द्र देखते है।


अब आगे . . .


गांव की बिजली अचानक से चली गई थी। ठाकुर साहब के पूरे घर में मोमबत्ती और लालटेन जल रही थी। दीनू गोलू और प्रभु बिस्तर पर लेटे हुए थे। उनकी मांए भी उनके पास ही बैठी थी। उनकी दादी रामेश्वरी चिंता में बैठी बैठी अपनी रूद्राक्ष की माला से भगवान का नाम जपे जा रही थी। और उनका सारा ध्यान दरवाजे की तरफ ही था। अचानक से उनके दरवाजे पर किसी की दस्तक हुई।

जरूर दीपेन्द्र होगा मैं देखती हूँ - रामेश्वरी जी ने कहा। और हाथ में लालटेन लिए दरवाजे की तरफ गई।

पर दरवाजा बार बार आगे पीछे होने लगा। जैसे कि कोई दरवाजे को तोड़ देगा। कौन है ? मैं आ रही हूं रूक तो जाओ ? कौन इतना उतावला हुआ जा रहा था। - रामेश्वरी जी बड़बड़ाती हुई दरवाजे की तरफ आई।

दरवाजा लगातार आगे पीछे हो रहा था। जैसे कि दरवाजे को तोड़ दिया जाएगा। दीनू गोलू प्रभु भी उठ कर बैठ गए।

गोलू ने धीरे से कहा - भैया, बड़े पापा या चाचा ऐसे दरवाजा नही खटखटा सकते। कहीं ये वो भूत तो नही।

तू भी क्या चंदू भैया की तरफ उल्टा सीधा बोल रहा है। अच्छा अच्छा बोल। - दीनू ने कहा।

प्रभु ने कहा - भैया। डर तो मुझे भी ऐसा लग रहा है।

तब तक रामेश्वरी जी ने दरवाजा खोला। और सामने देखा। सामने धुआं ही धुआं था पर कुछ दिख नही रहा था। रामेश्वरी जी के हाथ में रूद्राक्ष की बड़ी सी माला जिससे वो जाप कर रही थी। उसी से उन्होंनें दरवाजे को पकड़ रखा था।

ये अचानक धुआं कहां से हो गया ? किसने आग लगा दी इतनी रात में ? - उन्होंने अपने चश्मे को ठीक से आंखो पर लगाते हुए कहा।

पर चश्मा लगाते ही वो अंधेरा गायब हो गया।

न जाने मेरी आंखो को भी क्या हो गया ? चश्मा लगाते ही तो साफ दिखता हैं। यहां तो चश्मा लगाते ही धुआं गायब हो गया। और वो कमबख्त कहां चला गया जो दरवाजे को तोड़ने के लिए अमादा था। इंसान था या कोई भूत ? पलक झपकाते ही गायब हो गया। - उन्होंने दरवाजे से इधर उधर झांक कर देखा।

कोई है क्या ? कमबख्त जो भी है सामने आओ। - कहते हुए उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया। और आकर दीनू गोलू के पास खाट पर आकर बैठ गई।

क्या हुआ दादी कौन था ? - दीनू ने पूछा।

क्या पता न जाने कौन कमबख्त इतनी रात में दरवाजा खटखटा रहा था। जब दरवाजा खोला तो केवल धुआं जैसा था। चश्मा लगाते ही वो धुआं भी गायब हो गया। - रामेश्वरी ने दीनू की खाट पर लेटते हुए कहा।

तभी अचानक से दरवाजा पर दुबारा किसी ने दस्तक दी। दादी ने कहा- अब कौन आ गया। चैन से लेटने भी नही दे रहे।

दादी आप लेटे रहो मैं देखता हूं - गोलू ने कहा और लालटेन लेकर जल्दी से दरवाजे की तरफ गया।

उसने जैसे ही दरवाजे को खोला। धुएं का गुब्बार अचानक से उसकी आंखो पर छा गया। और एक जोरदार हवा के झोंके ने उसे धक्का दिया जिससे वो पीठ के बल जमीन पर गिर गया। उसके हाथ की लालटेन जमीन पर गिर कर बुझ गई साथ ही अचानक से आए हवा के झोंके से घर की सारी मोमबत्तियां और लालटेन बुझ गई। सारे घर में एक अजीब सी दुर्गंध फैल गई।

गोलू प्रभु जोर से चिल्लाए - मम्मी। दादी।
रामेश्वरी जल्दी से खड़ी हुई। - गोलू क्या हुआ ? कैसे गिर गया ? चोट तो नही आई। और ये एकदम से सब लालटेन और मोमबत्तियां कैसे बुझ गई ? और ये अजीब सी मरे हुए जानवर सी बू कैसे आ रही है ?
मैं देखती हूं। - रानो की मम्मी ने कहा। और जल्दी से कमरे में से टाॅर्च ढूंढ कर लाई। और दरवाजे की तरफ जहां गोलू गिर पड़ा था उस तरफ रोशनी की। पर रोशनी करते ही वो अचानक से चीख पड़ी और चिल्लाई - नही। गोलू भागो वहां से।

टार्च भी जमीन पर गिर गई।

क्या हुआ ? सब ठीक तो है ? - रामेश्वरी ने अपनी जगह से खड़े हो कर कहा।

मां, गोलू के पास कोई खड़ा था। उसकी भयानक लाल आंखे। - और वो अचानक से चुप हो गई।
गोलू गोलू तू ठीक तो है बोलता क्यों नही ? - दीनू ने कहा। और अंधेरे में अपने हाथो को आगे करते हुए दरवाजे की तरफ चलने लगा।

अचानक से उसके पैर से कुछ टकराया और वो गिर पड़ा। और चिल्लाया - आह।

क्या हुआ दीनू ? हाय राम क्या हो गया ? आज मेरे घर में अनर्थ कैसे हो रहा है ? बहू जल्दी से टार्च से देखो। दीनू गोलू को क्या हुआ है ?

दीनू की मम्मी ने जल्दी से टार्च उठाई। और गोलू की तरफ देखा। वहां सच में कोई था। - कौन है वहां ? गोलू से दूर हटो।

रामेश्वरी जी जल्दी से दीनू की मां के पास आई - उससे टार्च ली। और उससे टार्च ली। और देखा वहां कोई नही था।
जल्दी से गोलू के पास गई। गोलू मेरे लाल। क्या हो गया ? लगता है चक्कर आ गए है। - रामेश्वरी जी ने उसे उठाते हुए कहा।

दीनू और प्रभु दहशत में थे। क्योंकि ऐसा सब कुछ वो पहले भी देख चुके थे। वो दोनो एक दूसरे का हाथ कसकर पकड़ बैठ गए। कुछ देर बाद ही उन्हे लगा कि उनकी खाट को कोई ऊपर की ओर उठा रहा है।

मम्मी, दादी बचाओ। हमारी खाट उड़ रही है। लगता है भूत . . . - प्रभु चिल्लाने वाला था पर अचानक दीनू ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया।

नही, नही। कोई भूत नही होता। डर मत। - रामेश्वरी ने कहा।

और तभी पास घर के पंखे हिलने लगे। अलमारी में रखे सामान नीचे गिर गए। दरवाजे और खिड़कियां जोर जोर से आगे पीछे होने लगे। रानो की मम्मी ने जल्दी से टार्च से सब तरफ देखा पर उन्हे कुछ नजर नही आया।

कौन है ? कौन मजाक कर रहा है ? दीनू प्रभु अगर ये तुम हो तो पिटोगे मुझसे बहुत बुरा ? - रामेश्वरी जी ने कहा।

नही दादी, हम तो खाट पर ही बैठे है ये तो जरूर भूत है।- दीनू ने कहा।

अरे मैंने कहा ना कोई भूत वूत नही होता। - रामेश्वरी जी ने कहा।

और तभी अचानक से रामेश्वरी जी को ऐसा लगा कि किसी ने उनको धक्का दिया। वो लड़खड़ा कर दीनू की खाट पर गिर गई। और उनके हाथ की माला भी गिर गई।

कौन है ? कौन है ? जो भी है सामने आओ। तब मैं तुमको बताती हूं । - रामेश्वरी जी ने गुस्से में कहा।

तब अचानक से वो अजीब से गंध पूरे घर में फैल गई। और घर के सब सामान हिल हिल कर गिरने लगे। कुछ ही देर में अचानक से एक धुआं जैसे गुब्बार बना और उसकी दो लाल आंखे। और फिर उसकी भयानक हंसी। हा हा हा हा हा।

तुममें से कोई नही बचेगा ? सबसे पहले इस औरत को ही मारूंगा मैं। ठाकुर के खानदान का अंत होगा। और शैतान की जीत। हा हा हा हा - उसने जोर जोर से चिल्लाते हुए कहा।

उसकी ये जोरदार हंसी और घर में ये सब होता देख सोनू और दीनू की मम्मी तो लगभग बेहोश ही हो गई। रानो की मम्मी ने उन दोनो को संभाला।

गोलू, प्रभु और दीनू भी थर थर कांपने लगे। रामेश्वरी जी भी बहुत ज्यादा डर गई। उनके रूद्राक्ष की माला उनके हाथ से अंधेरे में गिर गई थी। वो भी बहुत ज्यादा डर गई।

पूरे घर में जैसे तूफान आ गया हो। पर इस तूफान को रोकने वाला उस समय कोई नही था।

शैतान ने रामेश्वरी जी का गला पकड़ लिया था। रामेश्वरी जी का दम घुटने लगा था। तभी गोलू ने टाॅर्च ढूंढ कर उसका प्रकाश किया। और दादी के पास जाकर उन्हे बचाने की कोशिश करने लगा। पर शैतान ने एक हाथ से उसे धक्का दिया और वो जाकर दूर गिर पड़ा।


आगे जारी . . .

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.