प्रेम न बाङी उपजे.......

सुबह-सुबह मारिया को स्कूल भेजने के बाद वही सागर-प्रश्न फिर से प्रकट हुआ। कितना मुश्किल है यह तय करना कि 'आज कौन सा ड्रेस पहना जाए'।बङी जद्दोजहद के पश्चात जो दो साङियाँ इस प्रतियोगिता में रह गईं हैं वे हैं- पतली लाल बाॅर्डर वाली नीले रंग की काॅटन साङी और पीली और ग्रे रंग की सिल्क साङी। आज मेरे दफ्तर में एक फंक्शन है इसलिए रोज के फाॅर्मल वीयर से अलग कुछ पहनना है। यह तय करना कि नीली साङी पहनूँ या पीली, उतना ही मुश्किल है जितना यह तय करना कि सब्जी कौन सी बनाई जाए- गोभी-आलू या फिर आलू-मटर! सब्जी के चयन में तो दूसरों की राय भी ले सकते हैं, मगर ड्रेस के चयन के लिए मेरे पास वह छूट भी नहीं है। यह बात न मैं अपनी तुनक मिजाज बेटी से पूछ सकती हूँ और न ही अपने दंभी, गुस्सैल पति से!
मारिया- मेरी पंद्रह साल की बेटी उम्र के उस पङाव से गुजर रही है जहाँ न जाने वह कब किस बात पर नाराज हो जाए, किस सवाल पर मेरे बुद्धि-विवेक पर प्रश्नचिन्ह लगा दे और न जाने किस बात पर पूछे जाने की तार्किकता की तलाश में उलझ कर रह जाए! मैं भी तो कभी उम्र के इस मोङ से गुजरी थी। तो क्या मैं भी ऐसी ही तुनक मिजाज और जिद्दी थी? क्या पता रही हूँ! अपनी कमियाँ कहाँ नजर आती हैं? इतना तो याद है मुझे कि मम्मी अपनी पङोसन व सखी को यह कहते रहतीं कि डेज़ी बङी तुनक मिजाज हो गई है। बात-बात पर नाराज हो जाती है। मै उन्हें ऐसा कहने के लिए यूं घूरकर देखती थी मानों अभी मेरी आँखों से आग उगलने वाले ड्रैगन की तरह लाल-पीली आग की लपटें निकलेंगी और इस झूठे आरोप लगाने की गुस्ताखी के लिए मम्मी को झुलसाकर रख देंगी। मगर मम्मी मेरी इन नजरों से भी नहीं डरकर कहती- "ऐसे मुझे घूर क्यों रही है, जा अपना काम कर। ये आजकल के बच्चे भी न!" फिर वे उस जमाने के 'आजकल के बच्चों ' का अपना अन्वेषण आण्टी के साथ साझा करने लगतीं।
तब हम अपने मम्मी-पापा से आज की तुलना में कहीं ज्यादा डरते थे। अगर ये घूरने वाली बात मैं अपनी बेटी से कह दूं तो वो मुझे न जाने क्या क्या सुना देगी, यथा-घूरना वस्तुतः किसे कहते हैं, घूरने के विभिन्न प्रकार, घूरने का मकसद; वगैरह वगैरह! वकालत की डिग्री के बगैर ये इतना जिरह कैसे कर लेती है!कई बार तो मुझे ही डाँटकर निकल जाती है। जेनेरेशन गैप क्या इसी को कहते हैं? पहले की तुलना में आज बच्चे बहुत ज्यादा जानकारी रखते हैं। वे चुप नहीं रह सकते। अपना अधिकार समझते हैं और ये जानते हैं कि माता-पिता को एक दायरे में रहकर बातें करनी हैं, प्यार जताना है या फिर अपनी राय थोपनी है। वे जानते हैं कि हम अपना मनमाना व्यवहार उनपर नहीं थोप सकते हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही तो मारिया अपने एक सहपाठी के बारे में बतला रही थी कि कैसे उसने पिता द्वारा पिटाई करने पर पुलिस थाने में उनकी शिकायत दर्ज करवा दी थी। मैं थोङा डर गई क्योंकि यह सब मारिया अपने सहपाठी का पक्ष लेते हुए बतला रही थी। हमें खुद को सुधारना होगा वरना पता नहीं ये बच्चे क्या कर बैठें!
मारिया के जन्म पर मैं कितना खुश हुई थी। मुझे लगा था कि बेटी के रूप में मुझे एक सहेली मिल गई है। मैं तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी थी और दोनों बङे भाई मुझे अपने पास भी नहीं फटकने देते थे। बचपन बङा सूना-सा रहा। मेरी मम्मी हमेशा मेरी अभिभावक ही रहीं, सहेली बनने की कभी कोशिश नहीं की। मैं अपनी उन सहेलियों से रश्क करती जो कहा करतीं थीं कि उनकी सबसे अच्छी सहेली उनकी मम्मी हैं। मैं भी कहाँ बन पाई अपनी बेटी की सहेली!
मेरी यादों के फ़्लैश-बैक के साथ घङी की सुइयां भी बढ रही थीं।   जब घङी पर नज़र गईं तो पता चला कि आधे घण्टे से मैं नीली-पीली साङी के चक्रव्यूह में फंसी हूँ । एक रूपये का सिक्का उछाल कर टाॅस करके साङी का चयन करती हूँ और जल्दी-जल्दी तैयार होने की नाकाम कोशिश करती हूँ । इस अतिरिक्त लगे समय की भरपाई नाश्ता न करके करती हूँ । जल्दी-जल्दी नाश्ता पैक करती हूँ और दफ्तर के लिए निकलती हूँ । मेरे पति जाॅन मेरा बनाया लंच नहीं ले जाते हैं । कहते हैं कि उनके दफ्तर की कैण्टीन में ज्यादा जायकेदार खाना मिलता है।

अक्सर मैं सोचती हूँ कि जान को किसी अखबार या पत्रिका के सैटायर काॅलम का एडिटर होना चाहिए  था! मेरे द्वारा अंजाम दिए गए हर कार्य में कोई-न-कोई नुक्स निकाल ही दिया करते हैं । यहाँ तक कि बाजार से खरीदी गई चीजों में भी। अभी पिछले वीकएंड की बात है। घर में जाॅन के कुछ मित्र चाय पर आ रहे थे। मैं काजू की बर्फी और रसगुल्ले लेकर आई थी। मिठाई खाते-खाते जाॅन बोल पङे-"डेजी ये काजू बर्फी कुछ ज्यादा ही मीठा है। रसगुल्ले भी उतने स्पंजी नहीं हैं।" ये मिठाईयाँ मैंने एक ब्रांडेड शाॅप से ली थीं। फिर भी उन्होंने सबके सामने यूं कहा मानो जतला रहे  हों कि मैं कुछ भी सही से नहीं कर सकती। वहीं अपने लाए समोसे और आलू बोन्डा में उन्हें कोई कमी नजर नहीं आई।

पता नहीं मेट्रो का कौन सा स्टाॅप आ गया! कई सिर और कन्धों के बीच से झांक कर स्टाॅप का नाम पढने की असफल कोशिश करती हूँ । एक तो वैसे ही लेट हूँ । कहीं गलती से अपना स्टाॅप मिस कर दिया तो बेवजह ही और देर हो जाएगी। मेट्रो अपने अगले पङाव की ओर बढती है और अगले स्टाॅप का नाम एनाउंस होता है। मैं राहत की साँस लेती हूँ कि मेरा स्टाॅप अभी निकला नहीं है।

ऑफिस में  बाकी दिनों की तुलना में कुछ ज्यादा चहल-पहल और ज्यादा रंगीनी है। सभी अच्छे से तैयार होकर आए हैं । मेरा सीनियर और बाॅस आदित्य वर्मा मुझे देखकर मुस्कुराते हुए कहता है-"तुमपर यह रंग खिल रहा है। बहुत खूबसूरत लग रही हो।" मैं कुछ शरमा कर और कुछ घबङाकर ऑफिस का एक मैटर डिस्कस करने लगती हूँ । अभी तक किसी ने मुझे प्रशंसा वाली नजरों से देखा नहीं, शायद इसलिए असहज सी हो गई ये सुनकर। पलटकर यह भी तो नहीं कह पाई उसे कि वो भी जँच रहा है इस नेवी ब्लू सूट में ।

     आदित्य वर्मा या आदि एक अच्छा इंसान है । बाॅस वाली जाति में एक अपवाद है वो। न किसी का बुरा सोचता है और न ही किसी का बुरा करता है। शरीफ और मेहनती व्यक्ति है। मगर बखूबी जानता है कि औरों से काम कैसे लेना है। जो काम जिसका है उसी से करवाता है। कामचोर लोगों से भी काम लेना कोई उससे सीखे। जरूरत पीने पर अपना रौद्र रूप भी दिखाता है। पता नहीं यह उसका अच्छा व्यवहार और सोने सा हृदय है या फिर  कभी-कभी ज्वालामुखी की तरह फटनेवाला उसका रौद्र रूप; जिसकी वजह से सामने वाला व्यक्ति इतनी तत्परता और लगन से अपना काम करता है कि मुश्किल से मुश्किल प्रोजेक्ट भी समय से पहले ही पूरा हो जाता है।
मुझे आदि में जो सबसे अच्छी बात लगती है वो है महिला कर्मचारियों के प्रति उसका सम्मानपूर्ण रवैया।  सारी महिलाएं आदि की दीवानी हैं क्योंकि वह एक बेहद सभ्य बाॅस है। किसी भी महिला से बातचीत के क्रम में उसकी नजरें चेहरे पर ही रहती हैं, चेहरे के नीचे उन हिस्सों पर कभी नहीं फिसलती जो हम महिलाओं को बङी नागवार गुजरती हैं । हम महिलाओं के पास एक सिक्स्थ सेन्स होता है जिससे हमें अक्सर ये पता लग जाता है कि कौन सा व्यक्ति हमारे बारे में कुछ गलत सोच रखता है। कुछ न कुछ इशारा जरूर मिल जाता है।

इन्टरकाॅम बजता है और दूसरे छोर पर आदि है।
"डेज़ी जरा वो नई वाली फाइल के साथ आना।"
"कौन सी? एक्स को?"
"हाँ वही।"

मैं वो फाइल लेकर आदि के केबिन में जाती हूँ। कुछ देर तक इस फाइल के ऊपर चर्चा चलती है। तबतक कैन्टिन ब्वाय आदि के लिए चाय लेकर आता है और  आदि मुझे चाय ऑफर करता है।
"नहीं, मैं नहीं लूंगी।"
"तुम तो ऐसे मना कर रही हो मानो मैंने तुम्हें वाईन ऑफर की हो! एक कप चाय से कुछ नहीं होने वाला है। कम-से-कम मेरा साथ देने के लिए तो पी लो।"

आदि की बातों का अंदाज ऐसा होता है कि वे कभी बुरी नहीं लगती हैं । उसके चाय का ऑफर मुझे स्वीकार करना ही पङा। उसके साथ बैठना, बातें  करना मुझे अच्छा लगने लगा है। कभी-कभी वो मुझसे अपने घर की बातें सांझा करता। उसके दो बच्चे हैं - बङी बेटी है जिसकी शादी हो चुकी है और छोटा बेटा है जो काॅलेज में है। पत्नी के साथ उसका बङा अच्छा रिश्ता है। ऐसा पति हो तो रिश्ता तो अच्छा होगा ही।

आदि को यह ऑफिस ज्वाइन किए यूं तो छः महीने ही हुए हैं, मगर इतने कम समय में ही सभी स्टाॅफ उसके मुरीद हो गए हैं । शायद इसलिए कि वह एक अच्छा इंसान है और इसलिए भी कि पुराने बाॅस की तुलना में आदि एक बेहतर बाॅस है। अब सामान्यतया मेरी सुबह और शाम की चाय आदि के साथ ही होतीं। उसके साथ ऑफिस में घण्टों काम करके भी कोई थकान नहीं होती है और शाम में जब घर जाने का वक्त होता है तो यूँ लगता है मानों अभी-अभी तो आई थी ऑफिस! ऐसा मेरे साथ पहले कभी भी नहीं हुआ था। आदि की कई विशेषताओं में एक यह भी है कि वह सामने वाले व्यक्ति की बात सुनकर उनपर गौर जरूर करता है। जो भी निर्णय लेता है उसे सोच-समझकर और बिना किसी पूर्वाग्रह के लेता है।

जब उसने ऑफिस ज्वाइन ही किया था तब मेरी उससे एक फाइल को लेकर बहस सी हो गई थी।
"आप समझ क्यों नहीं रहे सर। यह पार्टी टैक्स बचाने के लिए अपने बैलेन्स शीट में हेर-फेर कर रही है। पार्टी ईमानदार नहीं लगती है।"

"प्लीज काॅलम मी आदि। हम सभी यहाँ इक्वल हैं, सो नो सर एनीमोर। जहाँ तक इस पार्टी की बात है, हम न तो आयकर विभाग से हैं और न ही हम इन्हें कोई ऋण दे रहे हैं। वे अपने बैलेन्स शीट में कुछ भी दिखाए,क्या फर्क पङता है? हमें तो अपने कॉन्ट्रैक्ट के पैसे लेने हैं बस।"

"बहुत फर्क पड़ता है सर, आई मीन आदि।यह हेरा-फेरी अगर हजारों की होती तो चलता, मगर लाखों की हेराफेरी करने वाली पार्टी खतरनाक हो सकती है। कल को वो हमारे साथ भी तो बेईमानी कर सकती है। और अभी तो हमें बस पन्द्रह प्रतिशत ही पैसे मिलेंगे। बाकी तो काम पूरा होने के बाद ही मिलना है।"

आदि का चेहरा भावशून्य था। शायद मैंने अपनी लिमिट क्राॅस कर ली। मुझे इतना नहीं बोलना था। वैसे भी निर्णय तो आदि को ही लेना है। मैं चुपचाप वहाँ से अपनी सीट पर आ गई। किसी अनचाहे फरमान का खटका भी हो चला। मगर दो दिनों के बाद  जब आदि ने पार्टी को बुलाकर काॅन्ट्रैक के लिए मना कर दिया तो मैंने चैन की साँस ली । पार्टी ने हमारी फीस पच्चीस प्रतिशत तक बढाकर ऑफर की, मगर आदि की ना को हाँ में न बदल पाया। हमारे द्वारा ठुकराया गया करार हमारे एक प्रतिस्पर्धी द्वारा लपक लिया गया। तीन-चार महीनों के बाद पता चला कि वाकई वाकई उस कम्पनी ने अपने करार में धोखा किया और काम पूरा होने पर भी बाकी के पैसे नहीं दिए। बस तभी से आदि का भरोसा मुझपर बन गया।

"आज किस सोच में डूबी हो? घर नहीं जाना है क्या?"

"क्यों कितना समय हो गया है?"

मैंने हङबङाकर घङी देखा तो पाया कि वाकई समय ज्यादा हो चुका है। लगभग सारा दफ्तर खाली हो चला है। मैं और मेरी यादें! कहाँ खो जाती हूँ मैं भी! मैंने झेंपकर आदि को देखा जो हमेशा की तरह तरोताजा व आकर्षक दिख रहा है ।

"इतना परेशान क्यों हो रही हो? रोज के समय से आधे घण्टे ही तो ऊपर हुए हैं । कहो तो मैं तुम्हें घर तक ड्राॅप कर दूं ?"

"नहीं उसकी जरूरत नहीं है। मैं तो ये सोच रही थी कि अगर जाॅन मुझसे पहले पहुँच गए तो......" मैं बीच में रूक गई। बेध्यानी में दिल की बात निकलने वाली थी। मगर आदि तो मामले की तह तक पहुँचने वाले इंसान हैं । मेरे आधे-अधूरे वाक्य को तुरन्त लपक लिया।

"तो क्या, डाँट लगाएंगे?"

"नहीं, वो बस यूँ ही मुँह से निकल गया।"

"कोई बात यूँ ही मुँह से नहीं निकलती। मगर अगर बताना न चाहो तो कोई बात नहीं ।"

ऐसा कहकर आदि अपने केबिन में चला गया। मैं इस उधेङबुन में पङ गई कि कहीं वो मुझसे नाराज तो नहीं हो गया! हो भी तो मेरी बला से! किस-किस को मनाती रहूँगी?

घर पहुँची तो वाकई जाॅन मेरे आने के पहले पहुँच चुके हैं। आज के ड्रामे  की समाप्ति भी देख ली जाए!

"आ गई घर की याद? पूरे चालीस मिनट देर से आ रही हो। घर पर तुम्हारी बेटी स्कूल से लौटकर तुम्हारी राह तकते रहती है और उसकी कोई चिंता ही नहीं है तुम्हें!

मैं पहले से ही डरी हुई हूँ अतःजाॅन के ताने अनसुना कर देती हूं। क्या फायदा वो लङाई लङने का जिसमें मेरी हार ही लिखी है। चुपचाप कपङे बदलकर रात का डिनर तैयार करने के लिए रसोई की तरफ बढती हूँ कि पतिदेव की तीखी आवाज कानों में पङती है-
"मेरे लिए कुछ बनाने की जरूरत नहीं है । मैं डिनर के लिए बाहर जा रहा हूँ ।"

मैं चुप रहती हूँ और यह भी नहीं पूछती हूँ कि आज यानि सप्ताह के बीच के दिन में कौन सी पार्टी हो रही है, क्योंकि सीधा जवाब मिलने की उम्मीद नहीं थी। मारिया से डिनर के लिए पूछने जब उसके कमरे में जाती हूँ तो उसे मैगी खाते हुए पाती हूँ । स्वाभाविक है कि इसके बाद खाना तो वो खाने से रही। कुछ देर उसके पास बैठकर एक सार्थक वार्तालाप शुरू करने की निरर्थक  कोशिश करके वापस अपने कमरे में आ जाती हूं। रही-सही भूख भी चली गई।

अपने कमरे से बाहर आसमान का टुकडा देखने की कोशिश करती हूँ । चाँद के बिना आसमान कितना खाली-खाली सा लग रहा है! अनगिनत तारे मिलकर बी उस एक दागदार चाँद की कमी को पूरा नहीं कर पा रहे हैं । क्या मैं भी हूँ एक दागदार चाँद? क्या कभी मेरी कमी मेरे अक्खड़ पति और स्वकेन्द्रित बेटी  को महसूस होगी? आँखों में कुछ नमी सी महसूस होती है जिसे मैं एक जिद्दी बच्चे की तरह झुठला देती हूँ । जिन्दगी के चालीस बसन्त या यूँ कहूँ कि चालीस पतझङ देख चुकी डेज़ी इतनी भी कमजोर नहीं कि इतनी छोटी बात पर रो दे। छोटी ही तो बात है- अगर पति प्यार न करें या मनवांछित सम्मान न दे और बच्चे आपकी न सुनें। बस जिन्दगी में कुछ और बाकी नहीं रह जाता! बङे यत्न से ठुकराई हुई नमी अब जोरों से  अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है और मैं नि:शब्द इस गीलेपन को उतरने देती हूँ; आँखों से गालों तक का सफर तय करते-करते बीच में कहीं खो जाने वाली नमी, ठीक मेरी तरह। मैं भी तो जिन्दगी के इस आधे सफर में  मानों बीच पथ पर दिग्भ्रमित होकर ठिठकी सी खङी हूँ।  किधर से आई हूँ और किधर को जाना है कुछ पता नहीं चल पा रहा है ।

कहते हैं कि जोङियाँ तो ऊपर से बनकर आती हैं । क्यों बनाई जाती हैं ऐसी बेमेल जोङियाँ? जाॅन और मेरे बीच कोई भी ऐसी बात नहीं जो हमें प्यार की डोर में बांधे रखे। फिर इस शादी का मकसद क्या रह गया? कहते हैं कि शादी दो दिलों का बंधन है, मगर हमारे दिल तो एक दूसरे के लिए तो कभी धङके ही नहीं । मेरी लाख कोशिशों के बाद भी मैं जाॅन को प्यार नहीं कर पाई। प्यार तो स्वतः उत्पन्न एक अनुभूति है। इसे जबरन पैदा तो नहीं किया जा सकता। काफी देर तक खङे-खङे जब पैर जवाब दे गए तो बिस्तर पर सोने के लिए आ गई। एक टूटी-फूटी सी नींद आती है ज बेदर्दी प्रेमी की तरह बेवक्त ही छोङ कर चली जाती है। अभी सूर्योदय भी नहीं हुआ है।

अगर आफिस न जाना हो तो जिन्दगी कितनी बोरियत भरी हो जाएगी। रोज घर से बाहर निकलती हूँ शायद इसलिए घर में फैले नफरत को झेल पाती हूँ । आज समय से पहले ऑफिस पहुँच गई हूँ । आदि मुझसे भी पहले आ गया है। उसे गुडमाॅर्निंग विश करने केबिन में जाती हूँ और उसके कहने पर बैठ जाती हूँ ।

"क्या बात है? तबीयत ठीक है?"

मैं कुछ कहती नहीं बस चुपचाप उसे देखती हूँ । एक हँसमुख, हमदर्द चेहरे को निहारना भी कितना सुकून देता है।

"आँखें कुछ अजीब सी लग रही हैं, मानों रो रही थी। कोई बात है तो बता सकती हो, शायद तकलीफ कम हो जाए।"

"बतला भी दूँ तो परिस्थितियों को बदल तो नहीं सकती। फिर क्या फायदा?"

"हमें परिस्थितियों को नहीं बल्कि खुद को बदलना होता है ताकि हम मुसीबतों का सामना बेहतर तरीके से कर सकें। बातें हम शेयर करते हैं ताकि खुद को किसी और की आँखों से एक नई रोशनी में देख पाएं।"

आदि कुछ भी  कहता है तो अच्छा ही लगता है। क्या मैं बाॅयस हो गई हूँ आदि को लेकर? अचानक वह उठ खङा होता है और खिड़की से बाहर देखते हुए कहता है-

"पता है डेज़ी, मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ ।"

मैं कुछ समझ नहीं पाती कि यह मेरे मन ने सोचा है या आदि ने सचमुच ऐसा कहा है। उसकी तरफ देखती हूँ ताकि उसके चेहरे के भाव को उसके मुँह से निकले शब्दों से मिलाकर देखूँ । अपने मकसद में नाकाम रहती हूँ क्योंकि उसकी पीठ है मेरी तरफ। मेरा सत्यापन अधूरा रह जाता है और मैं बेशर्म होकर पूछ बैठती हूँ-

"ये क्या कह रहे हो?"

"सच कह रहा हूँ। मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ ।"

ऐसी स्थिति मेरे जीवन में कभी नहीं आई। कुछ समझ नहीं आ रहा कि कैसे रिएक्ट करूँ! बोले जा सकने वाले शब्दों की तलाश करती हूँ मगर वे भी आधे अधूरे ही मिलते हैं । जो मिलते हैं उन्हीं से काम चलाने की कोशिश करती हूँ-

"अबतक कितनों से यह कह चुके हो?"

"देवी जी, मैं कोई चरित्रहीन इंसान नहीं । आजतक मैंने किसी से भी प्रेम नहीं किया है। कोई मिली ही नहीं जिसने मेरा दिल जीता हो। तुममें पता नहीं क्या जादू है कि धीरे-धीरे मेरा दिल चुरा लिया! तुम्हें भी तो मैं पसन्द होउंगा? मुझे तो ऐसा लग रहा था कि तुम भी मुझे पसन्द करती हो।"

"मैं तुम्हें एक सीनियर और अच्छे बाॅस के रूप में पसन्द करती हूँ बस। मैं प्यार नहीं करती तुम्हें ।"

"तुम झूठ बोल रही हो!"

"मैं एक शादीशुदा औरत हूँ, तुम्हें प्यार कैसे कर सकती हूँ? यह गलत है।"

"बात यह नहीं है कि क्या सही है और क्या गलत। बात यह है कि तुम मुझे एक प्रेमी की तरह चाहती हो या नहीं- हाँ या नहीं?"

"तुम भी तो शादीशुदा हो। अपनी पत्नी से प्यार करते हो। एक ही समय दो लोगों को कैसे प्यार कर सकते हो?"

मेरी शादी अरेंज्ड थी। ऐसा नहीं है कि मैं सुषमा को पसन्द नहीं करता। वो मेरी जिंदगी है। एक दूसरे के साथ हमने बहुत अच्छा समय बिताया है। मगर वह मेरी पत्नी है माशुका नहीं । मेरी जवानी के समय कितनी ही लङकियाँ मेरी प्रेमिका बनने के लिए बेताब थीं मगर मेरा दिल किसी पर नहीं आया। मेरी नजर में सुषमा से परे किसी को भी देखना गुनाह था। मैंने ताउम्र किसी को भी अपने पास फटकने नहीं दिया।"

"अभी भी तो यह गलत है, हर तरह से गलत। तुम किसी और के पति हो और मैं किसी और की पत्नी । सिद्धांततः यह गलत है।"

"मुझे बस ये पता है कि मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूँ और अन्तिम साँस तक करता रहूँगा । तुम मुझे चाहो या न चाहो ये तुम्हारा फैसला है। प्यार अगर सोचकर होता तो मैं इतनी देर तुम्हें यह साबित करने में नहीं लगाता कि क्यों और कैसे मैं तुम्हें चाहने लगा।"

"मैं तो तुम्हें एक अच्छा इंसान समझती थी......"

"देवी जी, मैं इंसान तो वही हूँ जो पहले था, बस तुम्हारा आशिक हो गया हूँ । और शायद तुम्हारी नजरों में अपने लिए प्यार देखना चाहता हूँ बस। पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि तुम भी मुझे पसन्द करती हो। अभी तक कितनी ही लङकियाँ मेरे ऊपर मर मिटीं हैं और मेरा दिल ऐसी देवी जी ने चुराया है जो यह मानने को तैयार नहीं कि मेरा प्यार सच्चा है! मैंने जिन्दगी में अभी तक किसी से भी ना नहीं सुनी है।"

"मगर ना कहा तो है न। फिर ना सुनने को भी तैयार रहना चाहिए । एक बात बताओ आदि, ये प्यार है न? पावन, अलौकिक, वासना रहित प्यार?"

"अभी तो मैं बस तुम्हें प्यार कर रहा था, इस क्षेत्र पर तो मेरा ध्यान नहीं गया था। अच्छा हुआ तुमने मेरा ध्यान उधर खींचा।"

मैं कुछ असहज सी हो गई। शायद गलत बोल गई मैं।

"तुम्हारी कमजोरी यह है कि तुम बहुत ज्यादा सोचती हो। व्यक्ति को वक्त के बहाव के साथ बहना चाहिए । अच्छा यह बताओ कि एक गुलाब का फूल जो तुम्हें बहुत खूबसूरत  लगता है, क्या तुम दूर से उसे देखती भर हो? उसकी खुशबू बिना उसे छुए लेती हो? क्या कभी उसकी मुलायम पंखुङियों को छू लेने का मन नहीं होता तुम्हारा?"

मैं फिर से कल्पना में बह जाती हूँ । क्या तात्पर्य है आदि का? क्या गुलाब की तुलना मुझसे कर रहा है? एक हया की लाली दौङ जाती है गालों पर ।

"देवी जी आपकी यही परेशानी है। इतना ज्यादा सोचना ठीक नहीं । और मेरे शब्दों का सीधा-सीधा ही मतलब निकालो।"

"तो क्या तुम मेरा दिमाग भी पढ लेते हो?"

"हाँ लगभग। यही तो प्यार है । तुम्हें क्या पसन्द है क्या नहीं, तुम खुश हो या नाराज; सबकुछ मुझे पता लगता है आजकल। तुम मुझे न चाहो, न मिलो, न देखो फिर भी मैं तुम्हें ताउम्र चाहता रहूँगा ।"

मैं आदि के केबिन से निकल कर अपनी सीट पर आ जाती हूँ । आदि से मुझे इसकी उम्मीद नहीं थी । बीच बीच में मैं उसे देखती हूँ और जब भी देखती हूँ उसकी नजरें खुद पर ही पाती हूँ । अगर आदि की जगह कोई भी और इंसान ऐसा कहता तो मैं पता नहीं क्या कर बैठती! आदि की बातें मैं काट क्यों नहीं पाई?और ये सब कहने के बाद भी वह मुझे बुरा क्यों नहीं लग रहा है?

आने वाले कई दिनों तक आदि मुझे यह विश्वास दिलाता रहा कि मैं भी उसे प्यार करती हूँ । क्या ये सच है और क्या इसलिए मैंने अभी भी उससे बातें करना या उसके साथ बैठना बन्द नहीं किया है? ऐसे ही एक दिन जब हम साथ बैठकर किसी फाइल पर चर्चा कर रहे थे तो आदि ने अचानक मुझसे पूछा-
"डेज़ी, हाथ छू लूँ  तुम्हारा?"

मैंने चौंककर उसे देखा, मगर वह सीरियस था। ऐसा नहीं लगा कि उसने मजाक में ये कहा है।

"नहीं आदि ये सही नहीं ।"

"अच्छा एक उंगली या फिर उसका एक छोर?"

"ये क्या पागलपन है?"

"बस ये देखना चाहता हूँ कि तुम सच में हो अभी या मैं स्वप्न देख रहा हूँ! आजकल तुम सपनों में भी आती रहती हो न।" मुस्कुराते हुए आदि ने शायद बात बदलने के लिए ऐसा कहा।

"कितनी लडकियों को अभी तक ये सब कह चुके हो?"

"तुम एक जटिल मानसिकता वाली विचित्र महिला हो। मैं तुम्हें टूटकर चाहता हूँ और तुम मुझे शक की निगाहों से देखती हो!"

"हे भगवान!"

"हाँ देवी, कहो।"

मैं आदि की हाजिर जवाबी पर हँस पङती हूँ और विषय की संगीनता मानों उङनछू हो गई।  आदि मुझे समझाते हुए आगे कहता है-

"तुम ऐसा क्यों समझती हो कि मैं एक दिलफेंक आशिक या चरित्र हीन व्यक्ति हूँ? मैं भी एक पत्नीव्रता पति रहा हूँ । अभी तक किसी को भी इस भावना से नहीं देखा मैंने। मगर जिन्दगी में एक बार प्रेम का अधिकार तो सबको मिलना चाहिए ।

"मगर मैं ही क्यों?मैं तो सुन्दर भी नहीं। कोई भी खास बात नहीं है मुझमे। एक औसत चेहरे, औसत बुद्धि और औसत समझदारी वाली औसत महिला हूँ मैं । तुम हर हर क्षेत्र में अव्वल रहने वाले व्यक्ति और मैं असफलताओं से जूझती एक नारी । मैंने कैसे तुम्हारा दिल चुरा लिया ?"

आदि सोच में डूब गया। पूरे दो-तीन मिनटों तक सोचता रहा। मैंने भी साँस रोक रखी थी । शायद आदि को असलियत का एहसास हो गया, शायद ये प्यार नहीं! मुझे तो खुश होना चाहिए!

"साँस तो ले लो! कितनी देर तक रोक कर रखोगी?"

"तुम्हें यह भी पता चल गया?"मैंने झेंपते हुए कहा।

"हाँ मेरी जान। तुम्हारा साँस लेना या न लेना, छोटे-छोटे भाग में बाँट कर लेना, घबराहट में थूक निगलना; सबकुछ मुझे पता चलता है। और जहाँ तक तुम्हारा सवाल है कि मैं तुम्हें क्यों पसन्द करता हूँ; यह एक जटिल प्रश्न है। एक ऐसा व्यक्ति जिसकी जिन्दगी में कई लडकियों ने प्रवेश करना चाहा मगर असफल रहीं, उम्र के इस पङाव पर एक भोली सी मासूम लङकी को क्यों दिल दे बैठा!"

"तो तुम यह मानते हो कि उम्र के लिहाज से तुम वह सीमा पार कर चुके हो जहाँ एक आशिक बना जाता है।"

"प्यार किसी तर्क या सवाल-जवाब का मोहताज नहीँ डेजी। यह कोई दिमागी लङाई नहीं वरन् दिल की मजबूरी है। प्यार यह सब सोचने की इजाजत नहीं देता, प्यार तो बस प्यार है होना हो तो हो ही जाता है। तुममें मुझे क्या अच्छा लगा इसका जवाब थोङा मुश्किल है । कई चीजें हैं, तुम्हारी कई खूबियाँ हैं  और यह सब मिलकर मुझे सम्मोहित करते हैं । तुम्हारी बोलती आँखें जो हँसने पर एक खूबसूरत चमक से भर जाती हैं, तुम्हारी सरलता, तुम्हारा दो-टूक जवाब देने का अंदाज, किसी कार्य को करने में तुम्हारी तत्परता व लगन; अद्भुत हो तुम, सारे जहाँ से जुदा।"

इतनी प्यारी बातें करने वाले व्यक्ति को ना कैसे कहूँ? पहली बार मेरी किस्मत के दरवाजे पर सच्चे प्रेम ने दस्तक दी है, कैसे मना कर दूँ! आदि की आँखों में मुझे अपने लिए सिर्फ प्यार और इज्जत नजर आती है। उसे कैसे कह दूँ कि मेरे दिल में उसकी जज़्बातों के  लिए कोई जगह नहीं है! फिर भी अपना एक अन्तिम सन्देह दूर करना चाहती हूँ । 

"आदि अगर मैं तुमसे कुछ पूछूँ, व्यक्तिगत; तो बुरा तो नहीं मानोगे? दरअसल यह जानना मेरे लिए बहुत जरूरी है।"

"बेफिक्र होकर पूछो। तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं लगेगा मुझे।"

"यह प्यार तुम्हारी किसी और जरूरत से तो नहीं पैदा हुई है? मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारे और सुषमा जी के बीच सबकुछ ठीक नहीं और....और तुम वह सब बाहर तलाश रहे हो जो घर पर नहीं मिल पा रहा?"

मैंने नजरें चुराकर किसी तरह ये बात कह डाली जो मेरे दिल पर बोझ की तरह बनी हुई थी। मुझे आदि के नाराज़ होने का डर था मगर मुझे उसकी हँसी सुनाई पङी।

"तुम वाकई बहुत भोली और नासमझ हो। इतनी छोटी बात के लिए मैं तुम्हारे सामने यूँ गिङगिङाऊंगा? यह सब तो महर कुछ रुपयों में आसानी से मिल जाता है। रुपयों की बात छोङो, यहाँ आफिस में भी दो-तीन तो अपनी मर्जी से तैयार हो जाएँ। मैं वैसा इंसान नहीं हूँ डेजी। पता नहीं तुम्हारे लिए यह विश्वास कर पाना इतना मुश्किल क्यों है! तुम्हें शायद अभी तक कोई सच्चा आशिक नहीं मिला है। मेरी नज़र तुम्हारी आत्मा पर हैं, उसे अपनाना चाहता हूँ । पता नहीं ये भावना तुम समझ भी पा रही हो या नहीं! अब मैं आगे कुछ नहीं बोलूंगा । मैं तुम्हें प्यार करता हूँ और करता रहूँगा; अब और तुम्हें यह बात समझाने की कोशिश नहीं करूँगा। तुम्हें अगर मेरे प्यार और खुद की भावनाओं पर भरोसा है तभी अपने कदम आगे बढाना।"

मैं अपने अन्दर उमङ-घुमङ रहे जज़्बातों के तूफान को साथ लिए वहाँ से उठकर बाहर आ गई। अगर मैं हाँ कह भी दूँ तो इस प्यार को भला क्या नाम देंगे हम?आदि और मुझे दोनों को पता है कि अगर मैंने 'हाँ ' नहीं की है तो 'ना' भी नहीं है यह। वह जवाब जो 'ना' नहीं है वो 'हाँ ' ही तो है! मगर फिर भी यह रिश्ता गलत ही तो है। सोचने वाली बात यह है कि सही और गलत का फैसला कौन करेगा? क्या जाॅन का व्यवहार मेरे प्रति सही है? जब उसे कोई गलत नहीं कहता तो आदि के साथ मेरे दोस्तीनुमा प्यार या प्यारनुमा दोस्ती को गलत कहने वाले लोग क्या अपनी जिन्दगी में शत प्रतिशत सही हैं क्या? और क्या गलत और सही का वर्गीकरण करना इतना अनिवार्य है कि उसकी खातिर हम खुशी के चंद लम्हे जिन्दगी से चुरा भी न पाएं! सच कहूँ तो मुझमें आदि के प्यार को ठुकराने की हिम्मत नहीं है । ये प्यार सच्चा है या झूठा यह निर्णय मैं समय के ऊपर छोङना चाहती हूँ ।

मेरी सोच पर छाए तमाम प्रश्नों के बादल छँट से गए और तभी मुझे मेरा चाँद सामने दिखा। मैंने अपनी सोच को होठों से मुखर होने दिया-
"अगर तुम मेरे चाँद हो तो अपना दाग तो मुझे दिखाओ। मुझे तुममें वो चाँद वाला धब्बा क्यों नहीं दिख रहा है?"

आदि ने अपनी सम्मोहक मुस्कान के साथ कहा-
"वह तुम्हें अब कभी नहीं दिखेगा। लैला को कहीं मजनूँ की खामियां दिख सकती हैं भला?" 




 
                          

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