चलो भगवान् बेचते हैं

☆चलो भगवान्  बेचते हैं ☆

मुंबई  में सचमुच  इतनी भागदौड़  है कि ,
( भागदौड़  भी खुद की भागदौड़ से परेशान  है । )
आप मुझे कुचलकर  आगे निकल  जाना चाहते हैं ,
और मैं , आपको  कुचलकर  आगे निकल जाना चाहता हूँ ।
साल गुज़रते रहे । पर ज़्यादा  कुछ बदला नहीं । हाल ही में कुछ सालों  पहले  मुंबई  में अधिकारिक  तौर पर कहा   गया कि , कोई भी मुंबई में किसी भी भिखारी को पैसा नहीं देगा । लेकिन, कहने  से क्या होता ? अगर ये ट्रैफिक   रूल  होता तो  , सभी तोड़ते । लेकिन  ऐसा सुनते ही सभी जग  कर चेतन  हो गए ।
जो भीख  दे दिया करते थे , उन्होेंने  भी जेब में हाथ डालना बंद कर दिया । जिनका वर्षों से यही पेशा रहा है, उन्हें दिक्कत आने लगी । जिसका गुस्सा  ये लोग आपस में लड़-झगड़ कर उतारते थे ।
रमाबाई अंबेडकर नगर  बस्ती का भी ऐसा  हाल था कि,  ।  सुबह-सुबह  पानी के  लिए  चौल में भगदड़ तो कभी शौचालय  जाने  के लिए उठा - पटक ।
इसी चौल में कांता रहती है , अपनी बेटी और बेटे  के साथ । कांता  पहले अपना  शरीर  बेचती थी ।  लेकिन  जब  शरीर  काला  पड़ने लगा , कमर दर्द  रहने लगा  , आँखों  पर घेरे आने लगे , बाल रूखे और छितरे होने लगे तो कोई भी पास नहीं आता । शरीर  में दुर्गंध  आती , और कपड़े  न बदलने  पर बीमार भी रहती । तुम उसे देखोगे  तो बिल्कुल  भी अंदाज़ा नहीं लगा पाओगे कि , क्या ये वही कांता  है ? जिसके चेहरे पर सचमुच  कांति रहती थी ?
जो अपने बालों  की लंबी  रस्सी को घुमा - घुमा कर मौहल्ले बस्ती  के बिठ्ठल, क्लीनिक  वाले  वर्मा  , पोस्ट  ऑफिस वाले गजेनदर , बस्ती  का बबलू  , कैमरामैन  संतोष  को रिझाती थी ।
क्या ये वही कांता है , जो अपने कसे हुए  बदन  पर हरे ब्लाउज  के दो-तीन बटन  ऊपर  से  खोलकर  दिखाती और तुरंत  रेट बढ़ाती थी  ... और बड़े से बड़ा कंजूस भी खसखस  नोट ढीले  कर जाता था । एक बार क्लीनिक वाले वर्मा  ने उसके पास पलंग  पर लेटे-लेटे  कहा था कि, 
"कांता बाई ,  तू कभी भी याद करना वर्मा  को ,
तेरे लिए वर्मा की  जान हाजिर है । " तू  सबसे  अलग है  यार , बहुत  अलग  माँ  कसम ।

बिठ्ठल  ने एक दिन पिए में कहा था " ऐ कांता  ... अपन  तेरे पर पैइसा  लुटाता है ,  मालुम  क्यों .... क्योंकि  तू  अप्सरा है अप्सरा । मेरी बीवी  कितनी काली कलूटी है ? और तू ....
तू तो गुलाब  का फूल  " पर तू अगर रंडी  न होती तो मैं तेरे से .. शा.....

और इतने में कांता को बहुत  ज़बर्दस्त  गुस्सा  आया  " निकल.... यहाँ से । बड़ा आया शादी  बनाने वाला मेरे से । साले दो कौड़ी  के भड़वे । "
अरे तुम नीच मरद  ज़ात होते ही  ऐसे हो , शादी करने वाला ही होता न .... तो मेरा खसम ,, इन दो मासूमो को छोड़कर  न जाता "

कांता को अकेला छोड़कर  उसका पति किसी विदेशी  गोरी के साथ बाहर  देश चला गया था । फोटो  खींचने का काम करता था  । दिनेश  के पास एक  हुनर था .. अनपढ़ होकर भी बेधड़क अंग्रेज़ी बोलता था  ।
लड़की की फोटो खींचने के  लिए रिक्वेस्ट कर रहा था , ताज  होटल  के बाहर । लड़की  को उसकी भाषा  पसंद  आई, उसने अपना नाम रोजारियो मार्टिन बताया , दोनों में दोस्ती हुई ।  दिनेश ने बताया  कि , शादी नहीं की है । रोजारियो ने उस पर  खूब पैसे खर्च किए । जिसका कारण यह भी था कि, रोजी मार्टिन को मुंबई में जगह-जगह बस्ती, मंदिर,  हाजी अली   घूमने के लिए स्थानीय  ( लोकल ) व्यक्ति चाहिए था । और  जो इंग्लिश में समझा सके , भाग्यवश दिनेश मिल गया ।
दिनेश ने रोजी को मुंबई  के कोने-कोने  घुमाया , लेकिन अपनी बस्ती के  आसपास  नहीं घुमाने लाया ।
उस समय  कांता  के पास थोड़े बहुत पैसे थे ।
दिनेश ने पहले ही अपने पासपोर्ट का नाम पता ठीक से जाँचा ताकि , बाहर जाने में कोई  परेशानी न आए ।
और एक दिन दिनेश अपनी गोरी मैडम रोजी के  साथ निकल गया ।   बहुत दिन तक कांता ने इंतज़ार  किया  , लेकिन आया नहीं । उसने एक पर्चा छोड़ दिया था, "मैं आऊंगा ज़रूर  बस पुलिस  में रिपोर्ट  न लिखवाना ।"  कांता ने कुछ ज़रूरी  बात सोचकर रिपोर्ट  नहीं लिखवाई । इतने दिन गुज़र  जाने के बाद ..... तब तक कांता , पैसे से कंगाल  हो चुकी थी ।
उसके बाद  दो बच्चों के साथ अपना पेट पालना भी मुश्किल था । बीच में नोटबंदी  से भी और दिक्कत  आनी शुरू हुई , भीख  में बच्चों  को  सिक्के  और छोटे  नोट नहीं मिलते ।
साथ  ही साथ औरत की कई शारिरिक  इच्छाएँ भी  होती हैं । आदमी तो इधर-उधर  मुँह मारता है  , बच्चों वाली औरत किधर जाएगी ?
धीरे-धीरे  हिम्मत  जवाब  देने लगी तो , उसने  इन सबको रिझाने के काम से पैसे निकालने लगी । कई बार बच्चों को खेलने भेजने के बहाने  शरीर का सौदा भी कर डालती ।
पिंकू  सबकुछ समझता था, लेकिन ऐसी बात माँ से कैसे पूछ पाएगा ??
एक दिन  बिसि ने मासूमियत  से पूछा :- " ये लोग  आकर माँ के साथ क्या करते हैं ? बोल न पिंकू  ... क्या होता है ये ?  "
पिंकू  ने उसे जोर का थप्पड़  लगाया  और खुद भी रोने लगा , फिर चुप  करवाने के लिए बाहर खेलने  ले गया ।

कांता ये सबकुछ  करती थी , तब जाकर घर का राशन  और चौल  का किराया जुटता था । और आज के दिन  हालात  ऐसे थे कि , कुत्ता  तक पास आने में हिचकता  था । कांता  को किसी बड़ी  बीमारी ने जकड़  लिया  , क्या बीमारी थी ? कुछ पता नहीं । क्योंकि  इलाज के लिए कभी इतने  रूपए  हुए ही नहीं, जो बीमारी का पता लग सके । कांता को बस्ती वाले मर्दों के सभी पुराने  वादे याद आ रहे थे ।
जो कहते थे , " जिस दिन जरूरत पड़े खुला मांगना । "

लेकिन जब कांता ने  बच्चे इनके पास  भेजे  तो ,
बाहर  से ही भगा दिया जाता । कांता को इतनी समझ भी नहीं थी कि,  कल तक तो तेरे पास चमकता  शरीर  था , इसलिए वादे थे ।
उसका मरियल  सा बेटा   पिंकू और धूल फांकती बिसि अपनी माँ के आस - पास  मंडराते मक्खियों  की तरह ।

भीख आजकल  मुंबई  में बंद थी । कितना ही चीखने  के बाद मांगते तब जाकर कुल बीस- तीस  रूपए  निकल पाते थे । ये लोग अब कनस्तर के  टिन की बनी  कोठड़ी में रहा करते थे । हाथ पैर जोड़कर  कोठड़ी मिली थी । कीचड़  ही कीचड़  भर जाता  बारिश  में ।
कांता की हालत क्या  बताऊं , कांता कोई महिला नहीं बल्कि
ब्लाउज  और साड़ी  के बीच एक पुराना मटमैला  कंकाल लिपटा है ।
कांता  लगातार  दर्द  से करहाते हुए  छटपटा रही थी ।
कांता का कोई भीतरी अंग खराब हो गया था, इसलिए  अंगो से प्रतिमाह  बहने वाला ख़ून भीतर ही जम जाता था ।
और धमनियों में इतना ख़ून  नहीं था जो बेकार  का ख़ून  समय-समय पर बाहर आए । उसे बेतहाशा दर्द  होता और बुखार  आता । बीसि उसके हाथ पैर दबाती रहती ।
कभी-कभी  पिंकू उसके गले में पानी की बूंद  डालकर  गले को तर किया करता , तो राहत  मिल जाती ।
उसका तड़पना दोनों बच्चों के लिए शाप  था ।
माँ को इस नारकीय  दशा में  देखकर  दोनों बच्चे बहुत  बुरी तरह से  रो पड़ते थे ।
परस्थितियाँ  बिल्कुल  खराब थी ,  खराब क्य .... बहुत ही वेदनापूर्ण और पीड़ादायक ।

एक दिन बच्चे  खेल रहे थे  , और उन्हें पुराने  बक्से  में कपड़ों  के नीचे लिपटी  एक शिवजी की मूर्ति मिली ।

पिंकू  ने उलट  पलट कर  देखा और बोला " चल बिसि  भगवान् को  बेचकर  आते हैं ..... कुछ न कुछ मिलेगा  "

हाँ , माँ ठीक हो जाएगी  न ? -- बिसि ने बड़ी मासूमियत से बोला ।
दोनों ने मूर्ति  को धोया , लेकिन बच्चों को क्या पता ऐलयूमिनयम है । पहले  सुनार की दुकान पर गए  और  सुनार  ने डंडा  निकालकर  भगा दिया । इस तरह कई  दुकानों  में गए  पर कुछ हासिल  नहीं हुआ ।
दोपहर हुई और एक होटल के बाहर दोनों भाई बैठे थे ।
एक गोरी  महिला आई ....  " हे यू.... स्टाॅप वन मिनिट  ,
लुक हियर .....गुद .... भैरि गुद... .। "
और उसने खचाखच   छः  सात फोटो दोनों बच्चों  की  खींच  ली  ।  इस महिला ने इशारा किया  , "मुझे अपनी बस्ती में ले चलो"
दोनों उसे अपनी बस्ती में लेकर गए  ।
वैसे विदेशियों  को न जाने  क्या रूचि  है  कि  , ये लोग
हरे- भरे  पेड़  पौधों  से ज़्यादा  ,
नंगे-भूखों  लोगों की तस्वीर उतारते  हैं , और  वो भी
हंस -हंस कर मुस्कुराते हुए ।
गोरी महिला ने  धड़ाधड़  बहुत  सी तस्वीरें खींची   ।
और  दोनों बच्चों  ने अपनी  मरती  हुई माँ से मिलवाया । इसने देखा तो , हैरान रह गई  ... ओफ्फ्फ  करके नाक बंद किया और बच्चों के हाथ में पाँच सौ  का नोट थमा दिया । आठ दस फोटो  खींची  और बच्चों को झोले से चाकलेट देकर  चलने लगी ।
बिसि  ने पिंकू  के कान में धीरे से कहा सुन ...
" ये भगवान्  इसे बेच दे , और भी ज़्यादा  पैसा  मिलेगा ।  "
पिंकू  दौड़ कर गया और पीछे से चिल्लाया  ।
वो मुड़ी .... उसने मूर्ति  देखी " वाऊ... ओ माइ गाॅड .... लार्ड  शिवा भेरी गुद .... यू आर  अ भेरी गुद  चाइल्ड  ।  "
उसने  दो सौ का नारंगी  नोट,  बच्चों  के हाथ में रख दिया । 
और सिर से चश्मा  उतारकर आँखों पर लगाया और  चल दी ।
दोनों  बच्चे  उसे दूर तक  बाइ.... बाइ..... बाइ
करते रहे ,  जब तक कि आँखों  से ओझल  नहीं हुई ।
दोनों  बच्चे  दवाई  खरीदने  क्लीनिक  पर गए  । क्लीनिक  वाले वर्मा  ने  कुछ  पैसों  की डांडी  मार ली और थोड़ा  बहुत  दवाई देकर बोला  " अरे , अपने बस का नहीं है , उधर जाना । छी ! छी ! ..... तेरी माँ से बदबू  आती है । , 
नहाने को बोल उसको । वर्ना  सड़ कर मरेगी । "

माँ की बेइज्ज़ती  सुनकर बिसि  बहुत  रोई ।
वापस आकर   दोनों ने कांता को दवाई पिलाई ।
कुछ दिन कांता  की हालात में सुधार आने लगा  । सिर्फ  इतना कि , बोल  सकती थी ।
उधर वो औरत अपने मुल्क  पहुंची  तो  , उसने बस्ती और और इधर-उधर  की तस्वीरें  दिखाई तो दिनेश  चौंक  गया 
मन ही मन बोला  " हे..... भगवान्  कांता की हालत .... ऐसे.... और ये दो बच्चे तो......  " 
और फफक  कर रो पड़ा ....  ।
उसकी  वाइफ  रोजारियो  ने उसे शिवजी  की मूर्ति दिखाई   और देखते ही  निस्सहाय होकर  ज़मीन  पर बैठ गया ।
ह्वट हैपेंड ?? माइ डार्लिंग  ??

वो कुछ नहीं बोला । ये वो मूर्ति  थी , जिसे  दिनेश ने कपड़ों  के बीच छुपा कर रखा था कि , एक दिन कांता को देगा ।
उसकी आँखों  में ये फोटो  तैरने लगी , उसने रोजारियो को कुछ नहीं बताया  .. बस रोता ही रहा ।
उधर कुछ दिन तक खर्चा  चला और फिर हालात  वही हो गए । एक दिन बस्ती में  बदबू  फैल गई  । 
फिर  म्यूनिसीपार्टी के लोगों ने मुँह  पर कपड़ा  बांधकर  ,
बीमार   लाश को बाहर निकाला । पिंकू  और बिसि
माँ- माँ की आवाज़  में  रोए  जा रहे थे  ।  इधर-उधर  से भीड़ बनाकर  लोग देख रहे थे । जिसमें छी-छी करते हुए बिठ्ठल  , वर्मा ,  गजेनदर , कैमरा वाला संतोष  ये सभी  थे ।
कई  महीने बाद क्लिनिक  वाला वर्मा ,  संतोष  ,  बिठ्ठल  भाइ , बबलू  ये सभी कांता  की  तरह कमज़ोर होने लगे ।

उधर रोजारियो  ने दिनेश  को एक जगह  घुमाने के बहाने लेकर गई  और उसे वहीं   छोड़कर  .. बैटमिंटन  वाले क्लिंप डेनियल से शादी कर ली । डेनियल के पास अकूत  संपत्ति  थी । और तांगे से लेकर बड़ी गाड़ी तक के वाहन  ।
दिनेश  रोजारियो के  प्यार में पागल हो गया और इधर-उधर  भटकने लगा ।
कुछ साल बाद दिनेश  बुल्टमार्ग गाॅर्डेन के बाहर शिवजी की मूर्ति को रख कर , अंग्रेजी में भीख मांगता दिखाई दिया ।
शिवजी की मूर्ति को देखकर  भूले-भटके इंडियन आ जाते तो सिर्फ वही दिया करते थे ।
उसी गाॅर्डेन के बाहर  से एक दिन  डेनियल के साथ गाड़ी  में "रोजारियो डेनियल मार्टिन"  निकल रही थी , बड़े ही नवाबी अंदाज़ में .....सिगार  पीते हुए ।
फिर उसने बड़े ही  स्टाइल से धुआँ छोड़ते हुए कहा  :-
" हे !... डार्लिंग  ढेनियल ! यू नो ?..... दिस बैगर फ्रौम इंदिया "... सो ब्लडी फूल , पूअर , बास्टर्ड ।
और फिर  दोनों ज़ोर  से हंस पड़े । गाड़ी  छोटे से हार्न के साथ .. धुआँधार  गति से बुल्टमार्ग गाॅर्डेन  चौराहे से मुड़कर  निकल  गई..... और हल्के  धुएँ की लकीर  छोड़ती हुई दूर  निकल गई   ।

☆☆ समाप्त  ☆☆  ( लेखन तिथि  २०१८)


✍By:- Surya Rawat
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written by :-  surya rawat  ☜
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