☆-: किसकी बहन ? :-☆

-:  किसकी बहन ?   :- ✍By:- Surya Rawat
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चारों  तरफ भागदौड़ और शोर शराबा ,  हो-हल्ला  मचा हुआ था । किसी  की छत से काला धुआँ  छूट रहा था , किसी के  मवेशी जल गए थे  ,  कोई अपने बिछड़े परिवार के  लोगों को ढूंढ रहा था । चारों  ओर अफरा-तफरी  मची थी ।
क्या  हिन्दू  और क्या मुसलमान ... सभी अपनी-अपनी  जान बचाने को एक दूसरे घरों  में शरण  ले रहे  थे । शमीम ,  शेखा ,  भैरू ने मौके  का फायदा  उठाने में , पुरानी रंजिश  में गुड्डू की हत्या  की साज़िश  रची ।
उसे आज रात को  पूरा करने की योजना बनाई गई ।
दोनों मुसलमान  थे और भैरू हिन्दू  ।

शमीम :- तुम लोग आम वाले पेड़ पर चले आना । मैं वहीं मिलूंगा ,, और गुड्डू  का पता करने के लिए मैं अपने चचाज़ात भाई करीम  को भेजूंगा  वो आकर हमें बताएगा ।

शेखा:- मैं टंकी वाले रास्ते से निकलूंगा  ,  सब अलग-अलग  रास्ते  से निकलेंगे ..... क्योंकि  वो बाहर  भी मिलेगा  ,
तो वहीं ले आएंगे कुत्ते  को ।

भैरू:-  सही बोला । गुड्डू  कहीं भी मिल सकता  है , इसलिए  अलग-अलग  जाना सही रहेगा । मैं तबेले से होता हुआ  आऊंगा ,  लेकिन सभी लोग फोन घर छोड़ देना ।

शमीम :- जहाँ भी मिले , जिसको भी मिले,  आम वाले पेड़ के पास बुलाकर ...वहीं धर लेंगे साले को । अलग-अलग  जाने का एक और फायदा होगा कि,  कोई शक भी नहीं करेगा ।

( ये सभी लोग अपने-अपने सोचे हुए रास्ते से निकल  कर आम वाले पेड़ से कुछ कदम दूर   झाड़ियों  के पीछे मिलते हैं ।)

सलाह कर ही रहे थे  अंधेरे में गिरती -पड़ती बेहोशी - बदहवासी में  एक लड़की वहाँ आ पहुंचती  है । उसकी साँस  अटक रही थी और हाँफती हुई सिस्सक  रही थी .....अंधेरे  में इन लोगों को देखकर  उसके हाथ पैर और भी  ज़्यादा  सुन्न  हो जाते हैं , लड़की से आगे चला नहीं जाता  और गिर पड़ती है ।

शमीम :- ये लौंडिया कौन है  ?

भैरू:- देख  तो , इसने सुना तो नहीं कुछ ???

शेखा:- मैं देखता हूँ ,  ना पता भाइजान । इसने  तो पूरा खुद  को  कपड़ों में  लपेट रख्या है , मुँह  भी ढाँपा है , कुछ भी ना दीखरा ।

शमीम :- कौन है रे तू ?

( लड़की कुछ नहीं बोली । वह  लगातार  सिस्सकती रही ,  उससे  कुछ भी बोला नहीं जा रहा था । )
ये अपना काम भूलकर उसको  घेरकर खड़े हो जाते हैं , लड़की ने अपना मुँह नीचे किया हुआ था और हाँफ रही थी ,  पच्चीस  य छब्बीस  साल की रही होगी ।

शमीम ने उसकी पीठ पर हाथ लगाया  , और लड़की ने झटके उसे पीछे धकेल दिया ।
अब ये तीनों उससे  कुछ कदम पीछे हो  गए ।
उसकी पीठ देखकर  इनके  दिमाग  में गंदे कीड़े  पनपने लगे
लड़की  भागने  को उठ खड़ी हुई , शमीम  ने उसका हाथ पकड़  लिया । ऐसे कामों में , ये लोग आपस में एक-दूसरे का  नाम नहीं लेते थे ।

शमीम :- अच्छा सुन न ... थोड़ा कुरता उतार और फिर  निकल जाना  ।

भैरू:- हाँ -हाँ ,  फिर चली जाना .... क्यों  भाई नंबर 1 ,
अर नंबर 2  ?

शेखा:- और क्य  .... निकल जइयो फिर , कुरता उठा कर थोड़ा गर्म  जवानी दिखा  दे और निकल जइयो ।

शमीम :- अंधेरा है ,  कोई ना देखेगा,  बताएंगे ना किसी को चल-चल जल्दी कर  । ( लड़की की पीठ छूकर बोला )

लड़की  के कान सुन्न  हो रहे थे, उसकी  साँस लगातार  चढ़  रही थी और पैर काँप रहे थे । उसने  खूब जदोहद की... लेकिन  भाग न सकी  । शमीम  ने उसे धक्का  देकर  गिरा दिया ।

शमीम :- साला मलिकपुरा में  कौन सी नई  लौंडिया पैदा हो गई जो सुन ना री बात को , तेरे से पहले कई  लौंडियों के कुर्ते  उतारे हैं मैने । अबे क्या बोलरा  मैं तेरे को.... चल-चल जल्दी कर । उतार  कुरता ।...

भैरू:-  चाहती क्या  है तू  ?  तीनों चढ़ जाएँ क्य  तेरे  ऊपर ?
हहहहहह  ( हंसते हुए बोला )

शेखा:- अरे-रे-रे.... पकड़ .... पकड़ , भागरी है साली , मुँह बंद कर इसका । ये चिल्लाएगी अब ।

शमीम :- अरे जानेमन ,, नाम तो बता दे अपना , इधर ...... खड़ा हो रहा है  ,, हाहहहह ।

भैरू:- भाइजान क्या नाम पता पूछ रहे हो  यार ? हमे तो मजे लूटने से मतलब  है । चोदो साली को ।

शेखा:- और क्य  , ठोको साली को । दंगे हो रहे हैं ,  ऐसे  में कौन क्या उखाड़  लेगा अपना ? अरे भाइ देर मत करो ।

( शमीम ने इनकी बातों की उकसाहट में , उसका हाथ मरोड़ दिया ,
वो चीख न सकी... लेकिन उसके मुँह से  दर्द में ज़ोर की कराहट निकली । )

शमीम ने अपना बाँया हाथ उसकी छाती  में डाल कर उसे भीतर तक गंदे इरादे से  छू  दिया ।

फिर  गले से कंधे तक कपड़ा चीर डाला , उसका  कंधा  दिखने लगा ।
ये सभी उस पर टूटने वाले थे कि  , इतने में  पीछे  से दौड़ता  हुआ करीम आया उसकी  साँसे फूल  रही थी... करीम  घुटने के बल झुका और अपने दोनों हाथ कमर पर थकान  उतारते हुए लंबी साँस छोड़कर  बोला :-  " अहहह....ओफ्फ्फ !!  कौन शमीम भाइ ???...

शमीम ने आवाज़ सुनते ही.... घबराकर  लड़की का  हाथ छोड़ा , ये दोनों  भी पीछे हट गए

इतने में लड़की  हाथ छुड़ाकर दूसरी तरफ  निकल  गई ।

शमीम  :-  कौन है  बे ??

करीम:- भाइजान  मैं करीम ।

शेखा :- तुझे  गुड्डू  का पता करने भेजा था न ??

भैरू:- मिला वो ??

करीम :- गुड्डू  तो मिला नहीं यार । ( लगातार हाँफ रहा था । )

शमीम :- तो चूतिये तब से , था.... कहाँ तू ??

करीम :- भाइ  नुज़हत को ढूंढ रहा था ,  मिल नहीं रही ..... इधर आई क्या  ?? घरवाले परेशान हो रखे हैं । बाहर  वैसे ही अफरा-तफरी मची है .... अभी  बच्चों वाली बात मत करो तुम लोग ।
अरे छोड़ यार गुड्डू  को.....  , पहले उसे तो  ढूंढो ।

शमीम :- अबे ... कौन नुज़हत ??

करीम :- अरे तुम्हारी  बहन यार ... हमारी नुज़हत ।
किसी औरत ने बताया  कि  ,  इधर  की तरफ आई है,  कोई उसका पीछा कर रहा था ।

●( करीम की साँसें अब भी चल रही थी ...... लगातार हाँफ  रहा था । )●

(घबराते हुए बोला ) भैरू:- तू  हमारे  घर से होकर भी आया ? वहाँ सब ठीक तो है न ?

करीम :- यार भैरू भाइ  मुझे ज्य़ादा  पता नहीं पर आपके घरवाले  भी  आपकी  बहन लतिका  को ढूंढ रहे हैं । वो भी घर में नहीं है ।

शेखा :- ( कांपती आवाज़ में बिलखते- घबराते  हुए  )
या....,, ख़ुदा ,, त.. तो ,, तो ये किसकी बहन ? थी .... ???
( मुँह  पर शर्म से -लज्जित होकर  हाथ रखता है )

करीम चुपचाप  खड़ा था... उसे लगने लगा था कि, यहाँ कुछ तो  गलत हुआ है ।
और ये बाकी  सभी एक-दूसरे  को संशय , लज्जा  , निराशा ,  पश्चाताप की नज़र  से देख रहे थे ।

1☆७६ ( लेखन  सन् २०१७ )

☆☆ समाप्त  ☆☆
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