☆ पतली लड़की की कमर और मुनीर चचा ☆

-: पतली  लड़की की कमर और मुनीर चचा  :-

●{ लेखन :- ६ जनवरी-  सन् २०१० }●
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मुनीर स्लीपर क्लास के पांचवें डिब्बे में  सबसे ऊपर की बर्थ  पर लेटा हुआ था ,बैयालिस नंबर पर । डब्बे के भीतर  धुंधली  रोशनी थी , क्योंकि  कुछ लोग सो रहे थे ।
रात को नज़फगंज  से एक दुबली-पतली युवती चढ़ी । मुनीर उसका चेहरा देखना चाहता था  , चेहरा तो दिखा नहीं , 
कंधे तक आए मुलायम फिसलते बाल दिखते रहे । और गोरी  गर्दन  , पतली कमर ।
युवती ने अपना छोटा सा बैग लिया था ,  अमूमन  जैसा कैमरा य किताबें  रखने के लिए होता है । और उसे सीट  पर सिरहाने  रख  दिया, और पीठ पलट  कर.. चादर ओढ़े सो गई  । अब मुनीर  की नज़रों में  सिर्फ  चादर थी , कभी-कभी उसके गोरे पैर  दिख जाते , कभी गोरी उंगलियाँ  ।
मुनीर  कोई जवान लड़का नहीं बल्कि  चालीस साल का अधेड़ युवक  था । शादी होने से कुछ समय पहले ही लड़की ने-ही , न जाने क्यों एक दो मुलाकात के बाद , मुनीर से  शादी से  मना कर दिया था । उसके बाद कई साल तक शादी के इंतज़ार में रहा , हुई नहीं .. उम्मीद ही टूट गई  और फिर भटकता रहा ।
उसके बाद मुनीर की  वासनाएं और भी अधिक कुंठित  हो गईं थी ।

इसके घर  कोई आगे-पीछे वाला  नहीं था । मुनीर  के सिर पर बाल भी  कम हो चुके थे  , सफेद बाल कलम  और ऊपर खोपड़ी में खरपतवार  की भांति उगे  थे । मुनीर  के गाल  लटकते  और पेट भी बाहर था ।
कहते हैं , शरीर  की उम्र  होती है । विचारों  और शारिरिक  वासना की कोई उम्र  नहीं होती । मुनीर  को हमेशा नई कमसिन लड़कियों  के स्तन , पतली कमर,  मुलायम  फिसलते बाल   देखने में रूचि थी । वह मोटा  काला चश्मा लगाकर  अधिकांश समय स्टेशन  पर तो कभी बस स्टॉप पर व्यतीत करता था । जब- तक किसी को  ऊपर से नीचे तक ... घूर न लेता,  चैन नहीं पड़ता  ।
उसी तरह से , इस लड़की  का चेहरा देखने की इच्छा भी उछल-उछल कर ... शोर मचाकर  दिमाग में उट-पटांग उलाहने दे रही थी ।
बार-बार  सोचने लगा , अगर ये मीरपुर से पहले य बाद में उतर गई  तो क्या होगा ? फिर उसे ध्यान  आया ... अरे अभी तो टीईटी भी आएगा , तब न देख लूं ...इसका चेहरा ।
मैं भी खाँमख्वाँ परेशान हुए जा रहा ।
थोड़ी देर बाद टीईटी  आया... मुनीर टेचन होकर  टचक से खड़ा उठा ।
मुनीर :- हाँ - हाँ - हाँ है ,.... टिकिट । साहब जी  मेरा टिकिट देखो , मैं नीचे आता हूँ ।
टीईटी :- बैठे रहो , अच्छा तुम्हारा तो देखा था , मीरपुर तक  का था न ?....ठीक है ,  सो जाओ आराम से  ।
मुनीर :- साहब ठीक से देखलो ।
टीईटी :- अरे ! अजीब आदमी हो ? देख तो लिया ,
सो जाओ । मीरपुर सुबह साढ़े  चार बजे पहुंचोगे ।

टीईटी  ने उसका  टिकिट चैक किया तो टीईटी की पीठ मुनीर  की तरफ  हो गई , जिससे उस पतली युवती का चेहरा छुप गया । और मुनीर  झुंझला गया , अब भी उसे मौका नहीं मिला चेहरा  देखने का ।
मुनीर करवट  बदलता रहा । सुबह आँख खुली तो .. लोग  मीरपुर  उतरने के लिए  लाइन में खड़े थे । मुनीर  ने सीट पर नज़र  डाली तो युवती नहीं थी ।
पीछे से गर्दन  उठाई  तो देखा ,  वो लंबे बाल वाली पतली युवती सबसे आगे थी । मुनीर खुश  हुआ ... होहो चलो  बढिय़ा  है , ये भी यहीं उतरेगी ।
सब मीरपुर उतरने वाले  लोग उतर रहे थे, मुनीर भी हड़बड़ी करते हुए  उतरा । स्टेशन  से सभी लोग इधर-उधर  हो गए ।छोटा सा  स्टेशन  था , इसलिए  लोगों के इधर-उधर  निकलते ही मौन छा गया । गाड़ी जाने के बाद  स्टेशन  पर और भी गहरा मौन  छा गया । मुनीर उसे देखने के लिए बेताब  हो उठा , लेकिन वो कहीं दिखाई  न दी । मुनीर एक साइड में बैठ  गया , जहाँ पर रोड लैंप  मामूली  सी धुंधली  रोशनी  दे रहा था । कभी जलता  तो , कभी बुझ  जाता ।
और  पुराने  छपरे के बगल में  बेंच पर बैठा  ..... मुनीर ने  इधर-उधर  गर्दन  घुमाई , थोड़ी देर  तक युवती को याद करता जा रहा था । उसे विश्वास था कि, अब कौन आने वाला है  ? पूरी सुनसान जगह है ।
अचानक उसे अपनी रोजमर्रा की  पुरानी  हरकत के मुताबिक उत्तेजना आई और  उत्तेजना में उसी युवती का चित्र  दिमाग में बिठाते हुए ,  पैंट  की चेन खोलकर  हस्तमैथुन  करने लगा ..... अब  उसने अपना झोला हाथ से एक साइड  फेंक दिया ।
और दुनिया को भूलकर , लगातार  युवती  को याद करता.... उत्तेजना में आँख बंद किए सिसससकता जा रहा था । उसे युवती के मुलायम  लंबे बाल याद आए....अब पीठ ...अब गर्दन... अब पैर.... अब उंगलियाँ... अब उसकी पतली कमर ..... इससे  पहले उत्तेजित  होकर  आनंद में छूटता कि , " मुँह के ठीक आगे एक आकृति  आ खड़ी हुई और वो बोला :-  हे मैन , व्हट आर यू  डूइंग हियर ???
....... हे - यू  नाॅनसेंस बुड्ढा  ठरकी मैंन  । "

अचानक आवाज़ कान में पड़ते ही ,   ... उसका लिंग हड़बड़ी में  पैंट  की ज़िप पर फंस गया दर्द  से करहा उठा । आँखें  खुली देखा तो भौचक्का रह गया ,
वो लंबे बाल - पतली  कमर - गोरी उंगली  वाली कोई युवती नहीं बल्कि  एक गोरा-चिट्टा अंग्रेज़  फाॅर्नर था ,  जिसकी  ढोड़ी  पर मुल्ला  जैसी बहुत छोटी सी दाढ़ी  थी , बाकी चेहरे पर कहीं भी बाल न थे । बीच की मांग  थी , कंधे तक बाल और बिल्कुल  पतला  सा शरीर  था । उसने युवतियों  वाले प्रचलन  के मुताबिक कपड़े पहने  हुए थे ।
फाॅरिनर  उसकी हरकत  देखकर फोटो खींचने के लिए   कैमरा निकालने ही वाला था कि ,
मुनीर झोला  छोड़कर  पैंट संभालते हुए स्टेशन  के उस पार दौड़  गया ।

पीछे से गोरा हंसते हुए  चिल्लाया :-  हहाहहह हे यू !  ठरकी ! मैन , थुम छोला इडर ही भूल गया  ।
टुम साला  किसी डिन मरेगा ....   गुड बाय ठरकी बुड्ढे  ।
और मुनीर  चचा को भागते देख.... लगातार  हंसता जा रहा था ।

( मुनीर की किस्मत  अच्छी रही कि , इसे पता नहीं चला  जिसे याद कर रहा था  , वो  लड़की नहीं बल्की गोरा अंग्रेज़ है । तो मुनीर  जूते  से पिट जाता ज़रूर ।   )

☆☆- समाप्त -☆☆
●{ लेखन :- ६ जनवरी-  सन् २०१० }●

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✍By:- Surya Rawat surya.blogpost.com

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