वीचि ६

गतांक से आगे••••••••

निर्वेद की आंखों ने जब सामने देखा तो उसे सहसा यकीन न हुआ ।
     उसने आंखों को भींचकर फिर से देखा यह सच था।उनके सम्मुख एक यौवना सफेद कपडों में खड़ी थी।

       उसके भारी भरकम वस्त्र हवा के झोंके के साथ लहरा रहे थे,,लम्बे अलक उसके चेहरे को बार बार उड़ कर ढ़क रहे थे,,,रूप ऐसा कि रति को भी मलिन कर दे।वह साक्षात् सौंदर्य की देवी प्रतीत हो रही थी।अपनी बड़ी- बड़ी आंखों और भारी पलकों से वह उन्हें ही देख रही थी।

निर्वेद ने उसकी आंखों में देखा।ये वही है,,,,चिर-परिचित,,,,,आंखें जिससे टपकते दर्द ने निर्वेद को यहां खींच लाया था।

अब तक महीधर भी उसके पास आ चुका था।उसने धीरे से निर्वेद के कान में कहा।

अब,,  ये ,,,कौन है????

निर्वेद-- स्वप्न और संकेत कोई और नहीं यही भेज रही,,थी।

महीधर- किन्तु तुमने स्वप्न में उसका चेहरा नहीं देखा था,,,फिर कैसे कह सकते हो।

निर्वेद- मैं सब कुछ भूल सकता हूँ लेकिन उन आंखों के दर्द को कैसे भूल सकता हूँ,,,,जैसे किसी अपने को खोने का दर्द,,,,।

महीधर '- वाह,,,,हाँ,,,ये भी सही है,,,,लेकिन ये कोई हरकत नहीं कर रही,,,क्या ये जीवित भी है,,,या हमारा कोई भ्रम ।

महीधर अपनी बात समाप्त ही किया था कि वह बोल पड़ी ।
आप लोगों को सफर में कोई तकलीफ तो नहीं हुई ।

बोलती है,,,,यानी जिंदा है,,,,महीधर ने धीरे से निर्वेद से कहा।
चुप हो जा,,,,नहीं तो वह,,,,,
नहीं,,,,बस ठीक है,,,हम आ गये,,,,,लेकिन,,,निर्वेद चुप हो गया।
जी नहीं हमें कोई तकलीफ नहीं हुई,,,हमें यहा तक पैलेस आन व्हील लेकर आयी है,,,रास्ते भर फुल मस्ती में,,,,महीधर ने कहा।

वह निर्वेद के ही उत्तर की प्रतीक्षा कर रही थी।

वो सब तो ठीक है किन्तु आप कौन हैं महाशया,,,,उन संकेतों का क्या अर्थ है,,,,फिर वो सपने मुझे ही क्यो,,,,,हम इस समय कहां है,,,,,निर्वेद ने एक सांस में ही प्रश्नों की झडी लगा दी।

ये कुछ ऐसे रहस्य थे जिसने उन्हें परेशान कर रखा था।जिनका संबंध उसके जीवन से था।वो जो यात्रा करके उस स्थान पर पहुंचे हैं,,,आखिर उसका रहस्य क्या है।निर्वेद यह जानने को आतुर हो रहा था।

मेरा नाम ऊर्मि है,,,,आपके सारे प्रश्नों का उत्तर आपको मिल जायेगा,,बस आप हमारे साथ चलिये,,,,उसने निर्वेद से कहा।

ऐसे कैसे चल दें,,,पता नहीं ये कैसी जगह है,,,हम तुम पर भरोसा कैसे कर लें,,,,महीधर ने झट से कहा।

उसने घूरकर महीधर की ओर देखा।उसकी आंखे देख महीधर डर गया।

आप हमारे बारे में ऐसा ही सोचते हैं,, हमने आपके प्राणों की रक्षा की,,,यहां तक पहुचने में पग पग पर आपकी सहायता की,,,मुझे ही आप लोगों की सहायता की आवश्यकता है,,मैं भला आपके साथ विश्वासघात क्यों करूंगी??

ऐसा कुछ नहीं है,,,बस मेरे मित्र को मेरी बहुत चिंता है इसी कारण वो ऐसा बोल दिये,,,,हमें आप पर भरोसा है,,,फिर यहां आपके सिवा कोई दूसरा भी तो नहीं है,,,निर्वेद ने बात संम्हालते हुये कहा।

इस बार वह धीरे से मुस्कुरा उठी।निर्वेद और महीधर ने राहत की सांस ली।

ऊर्मि- अब आप हमारे साथ आयें,,,आपको यहां आने का प्रयोजन पता चल जायेगा।

निर्वेद- जी जरूर,,,,चलें ।

निर्वेद और महीधर ऊर्मि के पीछे हो लिये ।वो जिस जगह से जा रहे थे वह बहुत अजीब थी।रास्ते में चट्टानों पर ,,,खेतों में लोग बैठे और खड़े थे,,,लेकिन वो कोई हरकत नहीं कर रहे थे।उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि वो मूर्ति हो।

     पेड़ और वनस्पतियां विद्यमान थी,,,किन्तु उनका रंग माटमैला था।ऐसा लग रहा था कि अचानक ही जीवनदायी स्रोत सूख जाने से जड़ हो गये हों ।
     सड़क के चारों ओर जड़ लाशे पड़ी हुई थी।आस पास की चट्टानों और दीवारों पर टूट ,,और खरोंचो के निशान यह बता रहे थे कि इस जगह पर निश्चित ही भीषण संघर्ष हुआ है।संघर्ष के निशान हर जगह मौजूद था।ऊर्मि बिना कुछ बोले आगे आगे बढती जा रही थी,,,और उनके पीछे निर्वेद और महीधर सतर्कता से चारों ओर नजर रखकर चल रहे थे।

तीनों अंततः एक महल के द्रार पर पंहुचे।

       वहां पहुंच कर ऊर्मि ने दीवार के एक भाग को हांथ लगाया।धीरे-धीरे दीवार में एक छोटा सा मार्ग बन गया।वह बस इतना ही बड़ा था कि रेंगकर ही आदमी अंदर जा सकता था।

हमें इसी रास्ते से अंदर जाना होगा,,,,,ऊर्मि ने कहा।

फिर एक एक कर तीनों ही उस रास्ते से अंदर पहुंचे।महल विशाल था किन्तु पूर्णतया बदरंग था।उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि सदियों से यहां कोई नहीं आया हो ।वो तंग रास्ते से होकर खंभों वाले विशाल प्रांगण में पहुंचे ।

ऊर्मि- अब आप सुरक्षित हैं ।

महीधर- हे,,,,,ह,,य,,यं,,,,सुरक्षित,,,मतलब अब तक हमारे ऊपर कोई संकट था।

ऊर्मि- हां,,,,क्योंकि का कालदंश के दूत हर जगह फैले रहते हैं,,,,वह हरदम इस महल की निगरानी करते है,,,,निश्चय ही तुम लोगों के आगमन की खबर उसे लग गयी होगी।

महीधर-  अब ये,,,,,का कालदंश कौन,,,,,,है,,,,नाम से तो मुझे ये विलेन लग रहा है।

निर्वेद- ये का कालदंश कौन है,,,

ऊर्मि- सारे फसाद की जड़,  ,,,,,,क्रूर और अत्याचारी,,,,,जिसे दूसरों को गुलाम बनाने का नशा है,,,,
यह कहते कहते,,,,ऊर्मि की आंखें क्रोध से लाल हो गयी।

निर्वेद- गुलाम बनाना,,,,,मैं कुछ समझा नहीं ।
आप लोग लंबे सफर से आये हैं पहले विश्राम कर लें,,,हमारा मुकाबला कालदंश से है ।वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं ।

कल सुबह आपको सब पता चल जायेगा ।

यह कहकर ऊर्मि ने हांथो का इशारा किया।पर्दे में बुत बन खड़ी दो मूर्तियों में हलचल हुई ।देखते ही देखते वो सुंदर स्त्रियों में परिवर्तित हो गयी।
ये ,,,,अकिंचा और परिखा,,,हैं,,,आप दोनों इनके साथ जायें,,,,ये आपके ठहरने का प्रबंध कर देंगी ।

महीधर- ये तो ठीक है महोदया,,लेकिन हम यहां किसी से कुश्ती करने नहीं आये,,,,फिर ये कालदंश से हमें क्या।

निर्वेद  - आप पहलें इस सबका कारण हमें बताये,,,विश्राम हम बाद में कर लेंगे,,,,कालदंश ने आप सब के जीवन में ऐसा क्या अनिष्ट किया है ।

निर्वेद और महीधर राज जानने को उत्सुक थे।निर्वेद के कहने पर ऊर्मि ने सारा वृतांत कहना शुरू किया ।

हम मधवा राज्य की जुड़वा राजकुमारियां है।मैं ऊर्मि और मुझसे बड़ी वीचि ।हमारा राज्य समुद्र के भीतर गहराई पर स्थित था।यह प्रेम और सौंदर्य के लिये जाना जाता था।एक दिन मेरे मन में पानी के बाहर की दुनिया को देखने की उत्कंठा हुई।यह बात मैने अपनी बड़ी बहन वीचि से कही।उन्होंने मुझे समझाया लेकिन मेरे सर पर धुन सवार थी।मेरी जिद के आगे उन्होंने हारकर हां कर दी।हमने अपना आकार ऊपर की ओर विस्तृत करना आरम्भ कर दिया।

महीधर- आकार ,,,,,,विस्तृत करना,,,, इसका मतलब,,,,

जहाँ आप खड़े हैं वो मेरा ही स्थूल शरीर है,,,,

आं,, यययययय,,यहां नीचे,,,महीधर ने चौक कर कहा।

हाँ हम दोनों दो जुड़वा टापू हैं,,,,बेहद खूबसूरत जो कि कालदंश के आंखों में चुभ गयी।ऊर्मि ने आगे बताना शुरू किया।

पानी से उत्थान के बाद हम बहुत खुश थे।दोनों ही टापू के निवासी आनंद पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे।हम दोनों बहने बहुत खुश थीं ।लेकिन यह ज्यादा दिनों तक न रह सका।।ब्रम्हाण्ड में विचरने वाली दुष्ट शक्ति के स्वामी कालदंश की नजर हम पर पड गयी।
वह हमें कैद करने आ पहुंचा।दोनों टापुओं के रक्षकों ने भीषण प्रतिरोध किया ।और इस प्रेम और सौन्दर्य के प्रतीक राज्यों पर युद्ध के काले बादल छा गये।हमारी संयुक्त शक्ति भी कालदंश का मुकाबला न कर सकी,,, भीषण रक्तपात के बाद वह बड़ी बहन वीचि को कैद करने में सफल रहा।वह उन्हें समय के सात पर्तो में ले जाकर छुपा दिया।
       
        वीचि के कैद होने से दोनों राज्य की जीवन शक्ति कालदंश के हाथ में चली गयी जिसे सुखा कर उसने यहां के सभी निवासियों के सूक्ष्म रूप में एक दीवार के पीछे कैद कर लिया।समय के अलग-अलग भाग में होने के कारण हम वीचि को बचाने में असफल रहे।
     
      इस कारण मैंने पैतृक राज्य मधवा से मदद मांगी ।किन्तु कालदंश जैसे शक्तिशाली दानव से बैर लेना किसी ने स्वीकार नहीं किया और हमें निराशा ही हांथ लगी।थक हारकर मैं मधवा राज्य के आदि गुरू से इस समस्या के बारे पूंछा ।उन्होंने ने ही हमें बताया कि समय के किसी आयाम से सर्वसत्ता द्रारा नियुक्त कोई रक्षक के आने पर ही कालदंश को पराजित किया जा सकता है।तब से मैं यह संदेश ब्रम्हाण्ड में प्रेषित करती रही हूं और हजारों वर्षों की प्रतीक्षा के बाद शायद वह रक्षक आ पंहुचा है।

निर्वेद- लेकिन हमें यह कैसे पता चलेगा कि सात आयाम कौन से है।

ऊर्मि- यह हमें बाकुला पहाड़ी पर स्थित वह शिला ही बतायेगी।जो सिर्फ रक्षक के हाथों के स्पर्श से ही खुलेगी।
महीधर- बाकुला,,,,पहाड़ी,,,,धत्,,,,तेरी,,,,नाम से ही डरावना,,,,
महीधर के इस कथन से वहां मौजूद सभी हंस पड़े ।

आज रात आप विश्राम करें,,,,कल सुबह ही हम बाकुला पहाड़ी पर चलेंगे।ऊर्मि ने अपनी सहचरी को इशारा किया।निर्वेद और महीधर उनके पीछे पीछे चल पड़े ।

क्रमशः ।
 

     प्रिय पाठक गण यह अंक कैसा लगा हमें कमेंट्स के माध्यम से जरूर बतायें ।नये अंक के साथ शीघ्र ही फिर मिलेंगे ।सहयोग के लिए आपका सबका आभार ।



अचलेश सिंह यथार्थ ।

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.