एक आधुनिक अद्भुत प्रेम कहानी

कहानी

जा घट प्रेम न संचरै...
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राजेश झरपुरे 

(बस में सफ़र करते एक प्रेमी युगल को देखते हुए)

आज वह बहुत सुन्दर लग रही थी.
सुन्दर नहीं...
सुन्दर कहना ठीक नहीं होगा.
वह सुन्दर तो थी ही. गेहुंआ रंग, गोल मुख, तोते की तरह ढली हुई नाक, सुराही की तरह मढ़ी हुई गर्दन और सदैव आंखों से बात करती. होंठ सिले हुए पर मुसकुराने पर खिल उठते और छोटे-छोटे दांतों की दो पंक्ति चमक उठती. सुन्दर होने के लिए इतना पर्याप्त था. पर वह पर्याप्त से अधिक लग रही थी. इस तरह अधिक होना, अचानक उसके पहनावे में आये परिवर्तन के कारण हुआ था.

आज वह साड़ी पहनकर आई थीं.
रोज वह सलवार-कुरता पहना करतीं.
सिर तक दुपट्टा ओढे. उसके पास तरह-तरह के रंगों में सूट थे. वह उस तरह भी और सब महिलाओं से सुन्दर लगती पर साड़ी में उसकी सुन्दरता और अधिक खिल उठी. उसका खिल जाना मुझे रोमांचित कर गया. मैं अपने आपको रोक न पाया. और बिना किसी संकोच या भय के बोल पड़ा
‘‘...आज आप बहुत सुन्दर लग रही है.‘‘
मैंने बोला ज़रूर पर शब्द होठों से बाहर नहीं आ पाये.
हवा में शब्द घुल नहीं पाये पर उसने सुन लिया.
उसने पलके उठाई और मुसकुराते हुए झपक दी. मुझे जव़ाब मिल गया.

इस तरह पूरी बस में कहने वाला मैं अकेला था और इस तरह सुनने वाली वह, अकेली. उसके साथ उसकी सबसे नज़दीकी सह-यात्री सहेली बैठी थीं. उसकी आंखों में अपनी सहेली की अतिरिक्त सुन्दरता को लेकर ईर्ष्या जैसा कोई भाव था जो वह पढ़ नहीं पाई. यह भाव स्वभाविक भी था. दरअसल जिन्हें हम अपना सबसे प्रिय और अभिन्न समझते फिर चाहे वह दोस्त हो या रिश्तेदार, के बारे में हम जान सके कि वह हमारे पीठ पीछे क्या
बोलता है और बाजू में बैठकर क्या सोचता है तो हम दुनियां में बिल्कुल अकेले पड़ जायेंगे. न कोई हमारा होगा और न हम किसी के हो पायेंगे. पर हम अकेले नहीं होते. हमारा अकेले नहीं होना यह बताता हैं कि हम भ्रम में हैं... रिश्तों के, मित्रता के होने के... और जो जितना अधिक भ्रमित होता हैं, वह उतना ही अधिक घनिष्ठ होता हैं.
उसके साथ, उसके बाजू में बैठी, उसकी सहेली की तरह दिखने वाली वह उम्रदराज लड़की, उसकी घनिष्ठ होगी या नहीं, मैं दावे के साथ नहीं कह सकता. वह भी नहीं. बस! सदैव उसे उसके बाजू में बैठे देखा था. उनकी निकटता का कारण, दोनों का एक ही स्कूल में पदस्थ होना हो सकता था. एक ही मुहल्ले में आस-पड़ौस में रहना हो. एक-दूसरे के विचारों में समानता होना जैसा कुछ हो. पर मुझे इसमें से एक भी तर्क उचित नहीं लगता.
मैं उसे व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता और जान सकूं, इस तरह सोचा भी नहीं था. वह मुझे अच्छी लगती थी बस!

बस में और अन्य सहयात्री महिला-पुरूष भी अच्छे थे पर वह मुझे सब अच्छे लोगों से ज़्यादा अच्छी लगती. यही कारण था कि छीनवाड़ा से लेकर पलटवाड़ा तक के सफ़र में वह मेरी नज़रों के घेरे में होती. वह जानती थीं, वह उन्तीस किलोमीटर तक अदृश्य बंधन में रहती हैं. यह बंधन उसे पराधीन नहीं करता, उन्मुक्त करता था. वह खुले आसमान में उड़ा करती. सुन्दर चिड़िया की तरह पेड़ों की फुगनियों में चढ़ जाया करती और मन को तरंगित कर दे, ऐसे गीत गाया करती. वह जब खुले आसमान में उड़ती, उसके पंख नहीं फहराते. वह जब गाती, उसके होंठ नहीं हिलते पर मैं उसका उड़ना पूरी निष्ठा से महसूस कर लेता. उसके गीतों के स्वर मेरे कानों में बिना किसी अवरोध के शहद घोल देते.
उसका नाम..?
- मुझे नहीं मालूम.
उसका निवास..?
- मैं नहीं जानता.
वह कहां से आती और कहां चली जाती..?
- मुझे इससे कभी कोई मतलब नहीं रहा.
क्या वह विवाहित हैं..?
हां! यह सबकी तरह मैं भी जानता था.
और इस पूरी जानकारी के अतिरिक्त मेरे पास अन्य कोई जानकारी नहीं थीं. और मैंने भी इस तरह अन्य के बारे में न कभी सोचा, न चिंतित हुआ या जानने के लिए व्यग्र रहा. किसी के अच्छे लगने के लिए जानकारी महत्वपूर्ण नहीं होती. अतिरिक्त जानकारियां सदैव दुःख पहुंचाती हैं. दुःखी होना मेरा स्वभाव नहीं इसीलिए अपनी उन्तीस किलोमीटर की यात्रा में मैं सदैव प्यार और अपनत्व से भरा होता. हालांकि पलटवाड़ा उतर कर, वहां से और छब्बीस किलोमीटर दूर, दूसरी दिशा में, दूसरी बस, टैक्सी से  मुझे जाना होता और उसे सीधे, उसी बस में कहीं ओर. मैं आगे के छब्बीस किलोमीटर में भी उन्तीस किलोमीटर उसके साथ सहयात्री रहे पलों को ही जीता. वह भी कुछ किलोमीटर तक इसी तरह जीती होगी. मुझे शक या जब़रदस्ती किसी पर अविश्वास करने की बीमारी नहीं हैं इसीलिए इस तरह पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं...वह अपनी सहेली के बाजू में बैठी इसी तरह आगे का सफ़र करती होगी.

उसका यह एक सत्य मेरे साथ भी जुड़ा था. मैं भी विवाहित था और तीन बच्चों का पिता. वह भी विवाहित थी पर उसकी सहेली का विवाह नहीं हुआ था. सुन्दरता से विवाह का गहरा सम्बन्ध होता हैं. आपेक्षित उम्र के बाद यदि विवाह नहीं हो पाये तो समाजिक ताने और स्वयं का अन्तव्दन्द्व उसे कीड़े की तरह डसने लगता. उसकी सहेली के साथ भी कुछ इसी तरह हुआ हो. उसे ढलती हुई उम्र बोझ लगने लगी हो और ढलता हुआ सौन्दर्य कचोटता हो.

वह सुन्दर तो थी ही,समझदार भी थी. वह उससे दयाभाव रखती हो. उसे धैर्य और ध्यान में बंधने की सलाह देती हो. बंधन की जीत और पराजय की खु़शी से अभिभूत, वह उसे गृहस्थ जीवन की सूक्ष्म से सूक्ष्म बातें बताती हो, जिसे सुनना उसे अच्छा लगता हो. बस! इस एक अकेले कारण के अतिरिक्त, उनमें घनिष्ठता का और कोई कारण, मेरी समझ से परे था.

वह जानती थी, मैं उसे सहयात्रियों की आंखों से बचकर निहारता रहता हूं. मैं भी जानता था, जब मैं उसे नहीं देख रहा होता, वह मुझे निहार रही होती. और कभी-कभार जब हमारी दृष्टि टकरा जाती, हम चोरों की तरह नज़रें झुका लिया करते. चोरी पकड़े जाना,चोर साबित हो जाना हमारे मन को सुकून देता.

कई बार मैंने चाहा, कई बार उसने भी चाहा और यदि सही कहा जाये तो  रोज़ ही हमने चाहा कि कम से कम एक दिन हमारे जीवन में ऐसा आये कि हम दोनों एक ही सीट पर साथ-साथ, पास-पास बैठे. पर वह दिन हमसे रोज-रोज, दूर से दूर ही रहा. जब कभी हम कम फासले में रहे बिल्कुल अगल-बगल या आगे-पीछे वाली सीट पर तो हमारे बीच दूरी बढ़ी हुई रही. हमारे बीच के कम अन्तर को किसी अन्य पर जाहिर न होने देने की सतर्कता बरतते हुए हम पूर्णरूप से सावधान होते. पर हमारे बीच एक अन्तहीन वार्ता चलती रहती. बातों-बातों में वह कभी मुसकुरा देती. कभी गंभीरता का चोला ओढ़ लेती. दोनों ही स्थिति में उसका मुझसे और मेरा उससे गहन जुड़ाव होता. मैं अपने गालों पर उसके हाथों की नरम-नरम उंगलियों के स्पर्श को पूरी गम्भीरता से महसूस कर लेता. वह अपने बालों में घूमती हुई मेरी उंगलियों के स्पर्श को महसूसते हुए उत्तेजना में बारबार अपने सिर पर हाथ फेरती और क्षणांश के लिए तीक्ष्ण दृष्टि मेरी तरफ़ डालकर मुझे इस तरह शरारत करने से रोकती. मैं मुसकुरा देता, वह भी. वह जब मुसकुराती तो मुसकुराती ही रह जाती. उसकी देह का पौर-पौर मुसकुराता. साथ बैठी सहेली को उसका मुसकुराना तीर की तरह चुभता. वह बस में चारों दिशाओं में नज़र घुमाकर देखती. यह मुसकुराहट कहां से आई...? उस वक़्त में उससे सम्पर्क तोड़ लेता और अन्य सह-यात्रियों से जुड़ा हुआ प्रदर्शित करता पर वह पास बैठी तितली का मुख सूंघकर पता लगा लेती कि वह कहां थीं. फिर उसकी दृष्टि मेरी ओर होती. मैं उसकी दृष्टि में उठे सारे प्रश्नों को सिरे से नकार देता. वह खुश होती. उसका अहंकार तृप्त होता. उसकी ईर्ष्या खुशी में बदल जाती.

इस तरह मैं उसे किसी भी तरह की उलाहना के तीर से बचा ले जाता.
वह भी मुझे सदैव बचाये रखती. जब वह मुझे निहारती, मेरी आँखें उच्छृंखल हो उठती

. वह आँखें बंदकर ध्यान की मुद्रा में चली जातीं. मैं निराश हो उठता. मेरी उच्छृंखलता  मुझे कचोटने लगती. मैं अपने किए पर पछताता रह जाता और प्रायश्चित की स्थिति में उसी के सदृश्य विचारों के मौन में उतरने का प्रयास करता. पर  मौन कहीं नहीं होता. न ध्यान में, न विचार में. मौन की भी एक भाषा होती हैं. मौन के भी स्वर होते हैं और मौन में भी आवाज़ होती हैं. मौन की भी एक चीख होती हैं और मौन में भी घना शोर होता हैं. हम इस तरह से बेचैन और व्यग्र कर देने वाले वातावरण से दूसरे अधीर कर देने वाले परिवेश में समा जाते पर साथ-साथ... वह अपने ध्यान में, मैं अपने मौन में.

एक छोटे से सफ़र में प्रतिदिन कुछ किलोमीटर यात्रा में इस तरह भी प्रेम हो सकता हैं, यह हमने नहीं जाना पर इतना सघन, सात्विक, अबोला और देहहीन प्रेम इस पृथ्वी पर कहीं हो सकता था तो वह उन्तीस किलोमीटर में फैला ही हो सकता था, जिस पर, जिसके के लिए, हम सफ़र करते और सफ़र में प्रेम, प्रेम और प्रेम करते.

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सम्पर्क:सुन्दर देवरे नगर,
वार्ड नं 40, छिंदवाड़ा ।
म. प्र । 480001 । 
9425837377
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राजेश झरपुरे
शिक्षा-   एम.ए.(समाजशास्त्र)
प्रसारण- दूरदर्शन और आकाशवाणी से कविताओं और कहानियों का नियमित प्रसारण
प्रकाशन- प्रायः सभी पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं/कहानियां प्रकाशित
(हंस,कथादेश,पहल,समकालीन भारतीय साहित्य, वसुधा, नया ज्ञानोदय एवम्
कादम्बिनी आदि) कुछेक कविताएँ और कहानी का पंजाबी (गुरूमुखीं),उड़ीया व
अन्य प्रान्तीय भाषा में अनुवाद।
कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित
   

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