आज की युवा पीढ़ी करियर बनाने की अंधी दौड़ में विवाह व बच्चों की जिम्मेदारियों से भागना चाह रही है. लेकिन एक समय ऐसा आता है जब उनके पास पीछे देखने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचता.

”बाड़ और झाड़ी”

मुझे जब ऑफिस की तरफ से दो महीने की टेनिंग के लिये मद्रास भेजा गया तो पत्नी व बच्चे उदास हो गये। वे दो महीने तक अकेले मुबंई में कैसे रहेगें, मुझे भी उनकी चिन्ता सता रही थी। मेरे माता-पिता देहरादून में रहते थे और शीना के दिल्ली में....पर दोनों बच्चों के स्कूल होने के कारण शीना इन दोनों जगहों पर भी नहीं जा सकती थी। बेटी का इस साल बोर्ड था सो जाना और भी मुश्किल था। शीना व बच्चों ने मेरे साथ एयर-पोर्ट तक आने की जिद्द की, और मुझे छोड़ने एयर-पोर्ट आ गये।
बच्चों को प्यार और शीना को दिलासा देकर मैं एक हाथ हवा में लहराता हुवा और दूसरे हाथ से सामान की टेली धकेलता हुवा एयर-पोर्ट के अन्दर आ गया। एक्सरे-मशीन पर सामान स्क्रीन करवा कर, चैक-इन कांउटर पर सामान सीधे मद्रास के लिये बुक हो गया और मेरे हाथ में बोर्डिगं कार्ड आ गया।
फिर सिक्यूरिटी को पार कर मैं एयर-पोर्ट के डिपार्चर लाॅज में आ गया। फ्लाइट में अभी 30 मिनट की देरी थी, इसलिये मैं वहीं कुर्सी पर पसर गया। तभी बगल की कुर्सी पर 48-50 साल की एक महिला आ कर बैठ गयी।
सधा व गठा हुवा शरीर, लम्बी, उजला रगं, तीखे नैन-नक्श, सलीके से बन्धी आसमानी रगं की शिफान की साड़ी, आँखों पर काला चश्मा, कन्धे तक लहराते केश, कुल मिला कर उस स्त्री के जहीन-महीन व नफासत वाले व्यक्तित्व में गज़ब की कशिश थी। खूबसूरत पत्नी के होते हुये भी, मैं पलट कर देखे बिना रह न सका। लेकिन उसके चेहरे पर उम्र की रेखायें हल्के-हल्के स्पष्ट हो रही थीं। ठीक उसी समय उसने भी मेरी तरफ देखा। कुछ देखा हुवा चेहरा लगा, तो मंै अपनी याददाश्त पर जो़र डालने लगा।
”मुझे देख कर, भूलने की तो तुम्हारी बहुत पुरानी आदत है......है न ईश.....पर आज तो तुम मुझे ही भूल गये.......” वह अचानक बोली, तो मैं भी जैसे उसकी आवाज सुन कर यादों के दलदल से बाहर आ गया।
”ओह मृणालिनी तुम.......?”
”हाँ मैं.....शुक्र है पहचान लिया.....वरना तो मुझे अपनी पूरी जन्मपत्री बांचनी पड़ती” कह कर वह खिलखिला कर हँस पड़ी। खिलखिाने से गालों पर पड़े दो मनोहर गढे.....मुझे जैसे हाथ पकड़ कर अतीत के अन्धकार में खींच रहे थे।
”तुम यहाॅँ कैसे.....?.”मैं अभी भी आश्चर्य से उसे देख रहा था।
”जैसे तुम.....”वह फिर खिलखिलाई, ”मैं ऑफिस के काम से मद्रास जा रही हूं, और तुम......?”
”मैं भी....दो महीने की टेनिंग के लिये मद्रास जा रहा हूँ”
अरे वाह......तब तो अच्छा रहेगा......नहीं तो मैं सोच रही थी, कि मद्रास में, मैं किसी को जानती नहीं, बोर हो जाऊँगी....मुझे भी वहाँ पर एक हप्ता रहना पड़ेगा”
अभी हम बातें कर ही रहे थे कि फ्लाइट बोर्डिगं की घोषणा हो गयी। हम उठ कर डिपार्चर लाॅज से विमान की तरफ चल दिये। विमान ने उड़ान भरी और एक निश्चित ऊँचाई पर आकर अपनी यात्रा पूरी करने लगा तो हम दोनों भी बेल्ट खोल कर अपनी-अपनी सीटों पर व्यवस्थित हो गये।
मेरा मन अनायास ही पीछे की तरफ भागने लगा, लगभग 25-26 साल पहले या फिर उससे भी अधिक.....मृणालिनी ने व मैंने कानपुर आई. आई. टी. काॅलेज से इंजीनियरिगं की थी। हम दोनों ही पढ़ने में तेज व आर्कषक व्यक्तित्व के स्वामी थे, हाँॅं दोनों के विचारों में काफी फर्क था। फिर भी कुछ तो समानता थी जिससे दोनों एक दूसरे से जुड़े थे। हमारी दोस्ती पूरे काॅलेज में मशहूर थी लेकिन बदनाम नहीं.....क्योंकी हम पढ़ने के अलावा अन्य कार्यकर्मो में भी आगे रहते थे। हमारे विचारों में फर्क शायद हमारी परवरिश का था।
मैं एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार का युवक था। मेरे संस्कार धर्म, समाज, परिवार और चरित्र आदी के मामले में बहुत परिपक्व और मजबूत थे और ये संस्कार मुझे मेरे मध्यमवर्गीय परिवार से मिले थे। जबकी मृणालिनी उच्चवर्गीय समाज से ताल्लुक रखती थी। वह बेबाक थी। समाज और सामाजिक बधंन उसके पैरों की जूती थे। वह अपना समाज खुद बनाती थी। वह किसी धार्मिक भय से बधीं नहीं थी। माँ के न होने से परिवार के साथ उसके भावनात्मक संबध मजबूत नहीं थे और चरित्र को तो वह मजा़क उड़ाने की चीज़ समझती थी।
हमारे साथी विद्यार्थी हमें देख कर यही सोचते थे कि समय आने पर हम दोनों अवश्य ही विवाह बंधन में बंध जायेंगे। सच कहुॅंँ तो दिल के एक कोने में मैने भी यही सोचा था। मृणालिनी हर तरह से मुझसे बीस थी, इसीलिये मैं खुद पहल करने में हिचकता था और उसकी तरफ से ही पहल करने की इंतजा़री करता रहता। मुझे उसकी एक बात बुरी लगती, उसकी मेरे साथ तो दोस्ती थी ही, पर मेरे अलावा वह अन्य कई लड़कांे के भी बहुत करीब थी। अन्य लड़कांे के साथ उसका खुल कर हसीं मजा़क करना, बेबाक ढंग से बात करना, कंधे पर हाथ रखना या किसी लड़के का अपने कंधे पर हाथ रखने पर ऐतराज न जताना, अपने मध्यमवर्गीय संस्कारों के कारण मुझे अच्छा नहीं लगता था। कभी मैँ धीरे से यह बात कहता भी तो वह मेरे विचारों का मजा़क बनाती। लेकिन मैं यही सोचता था कि जब हम भविष्य में एक होंगे, तब मैं प्यार से उसकी कई आदतों को बदल दुंगा।
उसके और मेरे बीच अक्सर हर विषय पर चर्चा होती। लड़की होते हुये भी उसकी जानकारी किसी भी विषय पर कम नहीं थी। राजनीती, खेल, फिल्म, विज्ञान, साहित्य उसकी पकड़ कम या ज्यादा हर क्षेत्र में थी और मेरी भी.....। यही खासियत शायद हमें एक-दूसरे से इतना बांधे हुये थी। क्याेिंक किसी दूसरे से हम इस तरह से हर विषय पर बात नहीं कर पाते थे। ठीक से कहा जाय तो हम एक दूसरे की मानसिक भूख को शांत करते थे। हमारे बीच में अक्सर सबसे वर्जित विषय सेक्स पर भी चर्चा हो जाती थी। शारीरिक संबधों पर उसके विचार बहुत खुले हुये थे। वह अक्सर इस विषय पर बेबाक टिप्पणी करती तो मैं संकुचित हो जाता। वह किसी भी स्त्री-पुरूष के बीच, चाहे वह पती-पत्नी हैं या नहीं, शारीरिक संबधों को उनका नितांत निजी मसला समझती थी। वह मानती थी कि हमारे शरीर पर हमारा अधिकार है, इस पर किसी समाज या विवाह का बंधन क्यों हो। विवाह से पहले शारीरिक संबधों को बुरा नहीं मानती थी।
उसके ऐसे विचार अक्सर मुझे सिहरा देते। मैं मध्यमवर्गीय परिवार का युवक, विवाह से पहले सेक्स को वर्जित विषय मानता था। लेकिन वह कहती थी कि यह पुरानी बात है जब यौन-संबधों का मतलब बच्चे होना होता था और उसके लिये विवाह करना जरूरी होता था। लेकिन अब तो सुरक्षित यौन-संबधों के तमाम तरीके हैं तो इसके लिये वैवाहिक-बंधन में बंधने कि क्या जरूरत है। हाँ, बच्चे पैदा करने हों तो विवाह करो वरना नहीं।
ऐसे ही एक दिन हम दोनों बैठे बातें कर रहे थे। हमारी चर्चा कहीं से शुरू होकर, कहीं खत्म होती थी। उस दिन भी चर्चा किसी दूसरे विषय से शुरू होकर शारीरिक संबधों पर आकर अटक गयी।
”शारीरिक संबध बनाने के लिये, विवाह जरूरी नहीं है ईश.....जरूरी है, आपस में समर्पण, विश्वास, प्यार और आर्कषण.......”
”लेकिन जब यह सब आपस में हो तो विवाह क्यों नहीं कर लेना चाहिये.....बिना विवाह के ही शारीरिक संबध बनाओ, क्या यह जरूरी है......क्यों नहीं विवाह पहले करना चाहिये और शारीरिक संबध बाद में......” मैंने तर्क किया।
”लेकिन अगर कोई विवाह करना ही नहीं चाहे तो......क्या वह सारा जीवन यौन-सुख के बिना ही बिता देगा” उसने बेबाक टिप्पणी की, ”पुरूष के लिये यह सब वर्जित नहीं तो स्त्री के लिये क्यों...”
”लेकिन तुम विवाह को इतना बुरा क्यों समझती हो” मैनें उसके दिल की थाह लेनी चाही।
”क्योंकि एक आदमी की गुलामी है यह......अपना सब कुछ ताक पर रख कर किसी एक आदमी की गुलामी से ज्यादा, विवाह क्या अहमियत रखता है, आज की आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर किसी औरत की ज़िन्दगी में......”
”क्या तुम समझती हो कि तुम्हारी मम्मी ने भी एक आदमी की गुलामी की थी”
”बिल्कुल, मैं यही समझती हूॅं.....” वह अनायास ही उत्तेजित होते हुवे बोली, ”पापा की हाई सोसाइटी की शान थीं वे.....चमचमाती साड़ी, में सजी एक गुड़िया, जिसके लिये शानदार गाड़ी में पापा की बगल में विराजमान होना जरूरी था....समाज से जुड़ने का एक माघ्यम भर थीं वे पापा के लिये....वह भी जब पापा चाहें तब.....स्वयं अपने-आप में वे क्या थीं....उनकी अपनी क्या पहचान थीं....वे कहीं पर भी पापा की पत्नी या हमारी माॅंँ के रूप में ही जानी जाती थीं, अपना उनका वजूद क्या था”
”क्या किसी की पत्नी होना, बच्चों की माँ होना, तुम्हें औरत के लिये, गौरवान्वित होने जैसा कुछ भी नहीं लगता....”
”किसी की पत्नी या माॅंँ होने में गर्व करने जैसा क्या है.....इसमें किसी औरत की क्या खासियत है। विवाह होगा, शारीरिक संबध होंगे तो बच्चे हो जायेंगे और पालोगे तो प्यार भी होगा”
वह इतनी प्यारी भावनात्मक बातों को भौतिक रूप से तोलती हुयी बोली। मैं निराश हो गया। ऐसी लड़की से विवाह क्या संभव होगा, मैं सेाचता लेकिन उससे दूर होने की कल्पना से भी विचलित हो जाता।
”.....तो तुम विवाह नहीं करोगी.....” मैंने उसका आखिरी फैसला सुनना चाहा।
”नहीं.....” वह विश्वास से बोली। फिर खिलखिलाने लगी, ”पर तुम यह सब क्यों पूछ रहे हो मियाॅंँ मजनू, तुम तो तथाकथित सुधरे हुये लड़के हो, तुम तो अपने मम्मी-पापा का कहना मान कर एक सीधी-साधी, धर्म परायण, चरित्रवान, जिस पर किसी पर-पुरूष की छाया भी न पड़ी हो‘ ऐसी किसी देवी से विवाह कर लेना। पर मुझे बुलाना न भूलना”
”और अगर मैं तुमसे विवाह करना चाहूँ तो......”
”मुझसे......” वह पेट पकड़ कर हँसने लगी, ”क्या तुम्हारा ऐसा कोई खतरनाक इरादा है” फिर थोड़ा रूक कर पुनः बोली, ”देखो ईश, मैं तुम्हारे दिमाग, तुम्हारी जागरूकता, तुम्हारे ज्ञान, तुम्हारे आत्मविश्वास से तुम्हें पसंद करती हँूॅं.....तुम्हारे विचारों से नहीं.....हम दोनों का विवाह तो वैसे भी सफल नहीं हो सकता। हमारी इंजीनियरिगं का यह आखिरी साल है, उसके बाद हम नौकरी पर लग जायेंगे, तुम मेरे साथ सहजीवन बिताना चाहो तो मुझे कोई ऐतराज नहीं, पर विवाह का बंधन मुझसे न निभाया जायेगा”
”तो क्या हम सारा जीवन ऐसे ही बिता देंगे सहजीवन व्यतीत करते हुये.....आखिर कभी तो विवाह करेंगे....बच्चे पैदा करने के लिये ही सही, विवाह तो करेंगे ही...... तो जो तब करना है वह अभी क्यों नहीं.....” मैं उसे खोना नहीं चाहता था।
”बच्चे...? विवाह तो औरत की प्रगति में रोड़ा है ही....और बच्चे तो बेड़ियां है....मैं बच्चे पैदा करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हूँ , इसीलिये तुम्हें सलाह दे रही हूॅं कि तुम किसी अपने टाइप की लड़की से विवाह कर लो”
मैं चुप हो गया। वह शायद हमारा आखिरी वाद-विवाद था। कैंपस-इंटरव्यू में हमें अच्छी कंपनियों से ब्रेक मिल गया था। इम्तिहानों के बाद हमने अपनी-अपनी राह पकड़ ली। मैं कंप्यूटर इंजीनियर था, सुन्दर था। अच्छे से अच्छे रिश्ते मेरे लिये आये और फिर शीना से मेरा विवाह हो गया। शीना में वे सभी गुण थे जो एक अच्छी पत्नी, बहु व माँ में होने चाहिये। उसके साथ मेरा जीवन सुन्दर, सहज व सुव्यवस्थित व्यतीत हो रहा था
मृणालिनी से कई बार मुलाकात हो जाती। वह अपने एक दोस्त राहुल के साथ सहजीवन बिता रही थी। 5 साल तक राहुल के साथ रह कर वह फिर राहुल से अलग हो गयी। राहुल ने अन्यंत्र विवाह कर लिया। फिर सुना वह अपने ही बाॅस के साथ रहने लगी। इतनी अच्छी व ब्रिलियंट लड़की का ऐसा स्वछदं जीवन जीना मुझे अन्दर से दुखी कर देता था। आखिर क्या होगा इसका भविष्य....क्या मंजिल है इस जीवन की.....स्वछदं यौन-संबध आखिर उम्र के किसी मोड़ पर तो जाकर ठहरेंगे....और जब ठहरेंगे तब क्या होगा.......। सोच कर मैं अन्दर ही अन्दर काॅंँप जाता। फिर शीना का मृणालिनी को न पसंद करने के कारण, मेरी उससे मुलाकात कम होते-होते खत्म हो गयी थी। और आज हम लगभग 15 साल बाद मिल रहे थे।
”कहाॅंँ गुम हो ईश.....”मृणालिनी मेरी आँॅंखों के आगे अपनी हथेली लहरा रही थी, ”मुझे देख कर तुम्हारी खो जाने और भूल जाने की आदत अभी तक नहीं गयी” वह फिर खिलखिलायी। जवाब में मेरे चेहरे पर भी फीकी सी मुस्कुराहट आ गयी। मृणालिनी अभी भी वैसी ही खिलखिलाती थी। लेकिन उसकी खिलखिलाहट में अब वह तेज नहीं रहा। खिलखिलाहट खोखली लगती है। जैसे उस खोखल में उसके अरमानों की लाशें दबी पड़ी हों जिसे उसने जमाने से छुपा कर मार डाला।
तभी विमान-परिचारिका काॅफी लेकर आ गयी। हम अपना-अपना कप उठा कर चुस्की लेने लगे।
”और कैसी हो मुणालिनी, तुम तो न जाने कहाँ गुम हो गयी थी” पूछना चाह रहा था आजकल किसके साथ रह रही हो, लेकिन मेरे सस्ंकार इसकी इजा़जत नहीे दे रहे थे इसलिये कहा,
”तुम तो वैसी ही दिखती हो अभी भी......”झूठ बोल गया था मैं....उसके लिपे-पुते चेहरे पर अब निराशा की रेखायें थी, अकेलेपन का दर्द था और सुन्दर आँखों में अवसाद घनीभूत हो उठा था।
”क्या विवाह कर लिया तुमने.....?” मेरे मुहॅंँ से फिसल गया,”या विवाह को लेकर तुम अभी भी वही विचार रखती हो.....जिनसे हम दोनों अलग-अलग पथ के राही बन गये थे”
उसके चेहरे और आँखों के भाव और भी स्पष्ट हो उठे, उसने कुछ कहना चाहा, तभी विमान-परिचारिका की आवाज गूंज गयी, उसने मद्रास पहुँचने की सूचना दी और अपनी-अपनी सीट-बेल्ट बांधने के लिये कहा। मृणालिनी की बात उसके होंटों के अन्दर ही रह गयी। दोनों नें अपनी-अपनी सीट-बेल्ट बांध ली और विमान के उतरने का इंतजा़र करने लगे। विमान के पहियों ने हवाई-पट्टी को छुवा, और दांये-बांये रेंगते हुये एयर-पोर्ट पर आकर खड़ा हो गया। एयर-पोर्ट की सभी औपचारिकतायें पूरी करके जब तक हम दोनों बाहर नहीं आ गये, हमने एक-दूसरे से एक शब्द भी नहीं बोला,
”अब.......” मैं असमजंस में उससे पूछ बैठा, ”तुम कहाॅंँ ठहरोगी, मेरा तो रहने का प्रबंध कंपनी के गेस्ट-हाउस में है”
”मेरी एक होटल में बुकिंग है, मैं यहाँ पर एक हप्ते हूँ .....तब तक तुम भी उसी होटल में ठहर जाओ....बहुत सारी बातें करनी है तुमसे ईश.....बहुत दिनों बाद कोई अपना मिला, मेरे जाने के बाद तुम गेस्ट-हाउस में शिफ्ट हो जाना”
मैं भी उसके बारे में बहुत कुछ जानना चाहता था। जानना चाहता था कि मुझे ठुकरा कर आज वह किस हाल में है। हम दोनों ने होटल के लिये टैक्सी कर ली। होटल में मैंने भी अपने लिये एक कमरा बुक करा लिया। हमारे कमरे एक ही फ्लोर पर थे। रात को थक कर दोनों अपने-अपने कमरे में सो गये। फिर 4,5 दिन का रूटीन बहुत टाइट रहा, इतने पास होते हुये भी हमारी बातें बहुत कम हो पाती थीं। अक्सर मैं बहुत देर से लौट पाता क्योंकि मेरा आॅफिस उस होटल से बहुत दूर पड़ता था।
4,5 दिनों के टाइट रूटीन के बाद उसे थोड़ी फुरसत मिली, तो उसने मेरे मोबाइल पर ऑफिस फोन किया, ”आज फुरसत में हो क्या ईश....कल शाम की फ्लाइट से मुंबई वापस जा रही हूँ आज रात का डिनर साथ करेंगे...क्या जल्दी आ सकते हो.....?‘‘
मैंने मन ही मन अपने कार्यक्रम का हिसाब लगाया, आज का कुछ काम कल पर टाला और उससे जल्दी आने का वादा कर दिया। ऑफिस से जल्दी निकलते-निकलते भी 6 बज गये और होटल पहुॅंँचते-पहुॅंँचते रात हो गयी। वह मेरा इंतजा़र कर रही थी।
”चलो तुम्हारे कमरे में बैठते हैं......वहीं डिनर मंगवा लेंगे” आज मुझे वह कुछ थकी सी लग रही थी।
”बहुत थकी लग रही हो..”
”हाँ इस एक हप्ते में बहुत काम हो गया, मुंबई जाकर दो दिन की छुट्टी लेकर सोऊॅंँगी”
”इतनी बड़ी कंपनी में इतने बड़े ओहदे पर हो तो काम तो होगा ही....बड़ा ओहदा, बड़ी ज़िम्मेदारी....कई कर्मचारी तुम्हारे नीचे काम करते हैं। मेरे छोटे से फ्लैट की मैनेजर होती और मुझ पर व बच्चों पर शासन करती तब शायद इतना काम नहीं होता पर यह शान-बान भी कहाँ होती” मैं मुस्कुराते हुये बोला। बोलते-बोलते मेरा स्वर तिक्त हो उठा था।
”जले पर नमक छिड़कना तो तुम्हें खूब आ गया ईश....” वह बिना उत्तेजित हुये उदास स्वर में बोली। उसके ठंडे स्वर की अनापेक्षित उदासी से मैं चैंक गया। मैं तो उसकी तरफ से किसी करारी टिप्पणी की उम्मीद कर रहा था।
मेरे कमरे में जाकर वह सोफे पर पसर गयी। मैं बाथरूम में फ्रेश होने चला गया। फ्रेश होकर आया, तब तक उसने दोनों के लिये ड्रिंक्स व स्नैक्स मंगवा लिये थे।
”कभी-कभार तो तुम भी पी लेते हो न ईश....मुझे तो अब इसके बिना नींद ही नहीं आती” वह रोज़ पीने लगी है, मेरे लिये यह जानकारी नई थी। हम दोनों ने खामोशी से अपने -अपने गिलास उठा लिये। कहने को बहुत कुछ था, दोनों के ह्रदयों में जैसे तूफान भरा था पर शब्द मानो चुक गये थे।
”तुमने मेरी बात का जबाब नहीं दिया मृणालिनी....क्या तुमने विवाह कर लिया” थोड़ी देर बाद बातचीत का सूत्र थामते हुये मैं बोला।
”विवाह ही भाग्य में होता तो आज मैं तुम्हारी पत्नी और तुम्हारे बच्चों की माॅंँ होती” बिना किसी लाग-लपेट के वह रिक्त स्वर में बोली। मेरे अन्दर कुछ दबे हुये अरमान उमड़-घुमड़ गये।
”तो फिर....”
”अकेली ही रहती हूँ ....”
”लेकिन क्यों.....”
”बस ऐसे ही...” वह गिलास मुँह से लगाते हुये बोली, ”एक बार तुम्हें खोकर तुम्हारे जैसा जो नहीं मिला....जो भी मिला मेरे जैसा ही मिला” वह विदु्रप सी हँसी, हॅंँसी। प्रश्नवाचक दृष्टी से मैं उसे देखने लगा। मैं उसकी बातों का अर्थ नहीं समझ पाया था।
”पर तुम तो अपने बाॅस के साथ रह रही थी न.....”
”कब तक रहती......उस समय दुनिया मेरी मुट्ठी में थी। 4 साल तक हम साथ रहे, उसके बाद वह मुझसे उबने लगा। वह मुझे छोड़े, इससे पहले ही मैंने उसे छोड़ दिया”
”फिर....”
तब तक वेटर खाना लेकर आ गया, पल भर के लिये वह चुप हो गयी, वेटर चला गया तो उसने पुनः बोलना शुरू किया, ”तब तक मेरी उम्र 35 के आसपास हो गयी थी, ठीक उन्हीं दिनों मेरे पापा का देहान्त हो गया” बोलते-बोलते वह कुछ उदास हो गयी।
”तुम्हारा एक भाई भी तो था न....”
”था नहीं...है, वह भी अपने परिवार के साथ मुंबई में रहता है, लेकिन हमारा मिलना साल-दो-साल में ही हो पाता है”
”पापा के जाने के बाद से ही तुम अकेली रहती हो”
”नहीं ईश..उसके बाद मैने 3 अन्य पुरूषों के साथ भी सहजीवन व्यतीत किया....सच कहुॅंँ ईश...”
वह पहलु बदलते हुये बोली, ”उसके बाद हर साथी पुरूष से मैंने यही उम्मीद की, कि अब जीवन में ठहराव मिल जाय, वह मुझसे विवाह कर ले....मैं ईश....मैं...जो विवाह के सख्त खि़लाफ थी....विवाह-बंधन में बंधने को आतुर हो रही थी, माँॅं बनने की चाहत मन में अंगड़ाई ले रही थी, लेकिन कोई भी पुरूष मुझ जैसी लड़की से विवाह क्यों करता”
वह पल भर के लिये चुप हो गयी, ”5,5 पुरूषों का साथ करके भी आज मैं अकेली रह गयी....जानते हो तब तुम बहुत याद आते थे....तुम पर गुस्सा आता कि तुमने मुझे इस राह पर चलने से रोका क्यों नहीं.....या फिर मेरे लौटने का इंतजा़र क्यों नहीं किया.....इतने पुरूषों के साथ मेरे यौन-संबध रहे.....लेकिन मैंने प्यार सिर्फ तुमसे किया ईश...सिर्फ तुमसे.....”
शराब के नशे में वह भावुक होकर दिल की बात कह गयी थी। उस जैसी लड़की को मैंने पहली बार भावुक होते हुये देखा था
मैंने उसकी बात का कोई जबाब नहीं दिया। मेरे दिल का जख्म एकाएक हरा हो गया था
”हम दोनों समाज के दो अलग-अलग वर्गाें का, विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं ईश....आज की युवा पीढ़ी में मेरे जैसी विचारधारा और भी परिपक्व हो गयी है, और ऐसे विचार रखने वाली युवा पीढ़ी का भविष्य मैं हूँ .....कितनी गलत थी मैं.....कि सिर्फ यौन-संबधों की स्वतंत्रता और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता को ही जीवन समझती रही.....मैंने विवाह करने को स्त्री की उन्नती और स्वतंत्रता से क्यों जोड़ा....क्या नौकरी में बंधन नहीं......माता-पिता, भाई-बहन के साथ रहने में बंधन नहीं.....क्या दोस्त के साथ रहने में बंधन नहीं....पर ये सब अनुभव धीरे-धीरे हुये....बंधन मुझे बुरे लगते थे, पर आज उन्हीं बंधनों में बंधने को ह्रदय छटपटाता है ईश....दिल करता है कोई मुझे रोके, टोके....मेरा इंतजा़र करे....भविष्य की अब कोई कल्पना नहीं है...डर लगता है अकेलेपन से....बुढ़ापे से...”
”समाज के एक वर्ग का प्रतिनिधित्व तुम भी करते हो ईश.....जिनके संस्कार बहुत मजबूत हैं, जहाँॅं पारिवारिक व भावनात्मक बंधन बहुत सुदृढ़ है, पुरूष होते हुये भी तुम मर्यादा में बंधे रहे, आज ज़िन्दगी की शाम ढलने को है, पर तुम्हें दिन ढलने का गम नहीं....यह तुम्हारे चेहरे से झलकता है, सब कुछ है तुम्हारे पास....और मेरे पास क्या है....कुछ नहीं, उस बंद फ्लैट में किसी दिन चुपचाप मर जाऊॅंँगी और किसी को पता भी नहीं चलेगा”
रोकते-रोकते भी उसकी आँखों से आँॅंसू छलक पड़े। मैं अपने-आपको रोक नहीं सका....कभी वह मेरी बहुत अच्छी दोस्त थी और मैंने उसे तहे दिल से चाहा था। लेकिन एक नाव के दो विपरीत कोनों पर सवार दो इंसान नाव को कहाँ तक ले जा सकते हैं, एक को तो अपनी नाव बदलनी ही पड़ेगी। मैं उसके पास सोफे पर बैठ गया। सांतवना के लिये मैंने उसके कंधे पर हाथ रख दिया ।
अचानक वह मुझसे लिपट कर वह फूट-फूट कर रो पड़ी, ”पता नहीं अब तुमसे कभी मुलाकात हो या न हो ईश....”
”तुम अपने भाई के साथ क्यों नहीं रहती...” मैं उसका सिर सहलाते हुये बोला।
”अवांछित इंसान को अपनी गृहस्थी में रखना कोई क्यों पंसद करेगा, उसकी बीबी मुझे देखना भी पंसद नहीं करती”
मेरे पास न कोई जबाब था, न उसकी समस्या का कोई समाधान....”
खाना अनछुवा ही पड़ा रह गया था।
”कुछ खाओगी मृणलिनी....”
”नहीं..” वह वैेसे ही सुबकते हुये बोली।
वेटर को बुला कर मैंने खाना वापस ले जाने के लिये कह दिया, ”चलो तुम्हें तुम्हारे कमरे में छोड़ आंऊ.....रात काफी हो गयी है” मैं उसे उठाते हुये बोला। उसके कमरे में बिस्तर पर लिटा कर, मैं वापस मुड़ा तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया, मैंने मुड़ कर देखा, उसकी आँखों में कई प्रश्न थे पर मेरी आँखों में भी उसके हर प्रश्न का जबाब था। मैंने अपना हाथ छुड़ा लिया....और दरवाजा बंद करके अपने कमरे में लौट आया।
बिस्तर पर लेटा तो मृणालिनी और शीना मेरे मस्तिस्क-पटल पर एक साथ आ रहीं थी। एक जंगली झाड़ी थी और एक तरतीब से उगी हुयी बाड़....जंगली झाड़ी को कोई भी अपनी इच्छा से, अपने फायदे के लिये काटता है, नोचता है और घर में उगी हुयी बाड़ को एक ही माली पालता-पेाषता है, धूप-छाँॅंव, बरसात से बचाने की कोशिश करता है, तरतीब से काटता है, दूसरा कोई उसे छू भी नहीं सकता और न ही इस्तेमाल कर सकता है, जंगली झाड़ी को लोग सिर्फ इस्तेमाल करते हैं लेकिन देखते उपेक्षित दृष्टी से हैं, किसी के आँगन में लगी हुयी बाड़ को लोग इज्ज़त की निगाहों से देखते हैं, सराहते हैं और खुश होते हैं, उसे छूने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता। जैसे उपेक्षित पड़ी झाड़ी आखिर सूख कर ठूंठ हो जाती है, वैसी ही हो गयी है मृणालिनी.....मृणालिनी के जीवन की कहानी भी किसी जंगली झाड़ी से अलग नहीं....इसी झाड़ी को कभी उसने अपने आँगन की बाड़ बनाना चाहा था.....सोचते-सोचते उसकी आँखे मुंदने लगी....कल वह कंपनी के गेस्ट-हाउस में शिफ्ट हो जायेगा। काश युवा पीढ़ी सोचे कि उन्हें जंगली झाड़ी बनना है या किसी के आँॅंगन की खूबसूरत बाड़.....आर्थिक आत्मनिर्भरता का मतलब विवाह न करना तो नहीं हैं.....आज स्त्री के साथ-साथ पुरूष में भी बदलाव आया है, अब वह पत्नी की प्रगती को रोकता नहीं बल्की उसका साथ देता है, और देना भी चाहिये ताकि किसी लड़की की कहानी मृणालिनी जैसी न हो....कोई भी लड़की विवाह करने को और बच्चे पैदा करने को अपनी प्रगती की राह में रोड़ा न समझे। कोई भी लड़की जंगली झाड़ी न बने, ज़िदंगी में ऐसी कोई गलती न करे जो सुधर न सके। सोचता-सोचता वह नींद के आगोश में चला गया।
अपने बिस्तर पर लेटी मृणालिनी भी आँखें मूंदते-मूंदते यही सोच रही थी कि काश समय 25-30 साल पीछे लौट पाता।


लेखिका-सुधा जुगरान





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