टूटता तारा

तुम एक बार बात कर लो ना उससे, सुबह से फोन करके परेशान किये हुए है। उसकी बातों से लग रहा है कि सुसाइड वगैरह कर लेगा!' सायमा ने शुमायला से अपनी शंका जाहिर की।

"अब फोन करे तो कह देना , मैं रात को उसे कॉल कर लूँगी।"शुमायला ने फोन रख दिया।

शुमायला ज़ैदी नाम था उसका,दिखती मासूम थी पर मासूम थी नहीं। वो सादा दिल थी,जिसका दिल आ गया था एक दूसरे सादे दिल पे! एक क्लास जूनियर था वो लड़का उससे,और उम्र में भी छोटा, शायद एक-दो बरस। पिछले साल ही उसकी शुमायला के घर से नज़दीकिया बढ़ी थी। पर शुमायला के नोटिस में तब आया जब घर की महफ़िलों में होने वाले क्विज़ में उसने अपने आंसर्स से शुमायला को दिल हारने पे मजबूर कर दिया ।

उसके आने से पहले शुमायला ही उन महफ़िलों की शान होती थी पर अब खेल की तरह रनर अप होने लगी और वही महफ़िल लूटने लगा वो लड़का।अब तो बाकयदा एक दूसरे के घरों पर उन दोनों के बीच क्विज़ कम्पटीशन चलने का दस्तूर हो गया था, बचपन में एक कल्चर था कि विनर, रनर की हूटिंग करते थे पर वो ऐसा कुछ नहीं करता। जीतने के बाद चुपचाप पीछे खड़ा अपनी तारीफ़ें सुनता और बस मुस्कराते रहता। उसकी ये मुस्कान शुमायला को खुद पे मज़ाक लगती। एक दफ़ा जब वो जीती तो उसके सामने जाकर हूटिंग करने लगी , सोच रही थी कि पलट के कुछ बोलेगा......मग़र वो ख़ामोशी से वैसे ही मुस्कराता रहा। निराश होकर वो लौट आई।

इस वाकये के बाद वो उसके सोच का मरकज़ बन गया। फ़ुरसत मिलते ही वो उसके बारे में सोचने लगती, एक क़शिश थी उसके पर्सनैलिटी में; जो जादू की तरह उसे अपनी तऱफ खींचती । करीने से सजे उसके बाल जो सूखने के बाद बिखर के उसे और अधिक खूबसूरत बनाते , उसपर से व्हाइट शर्ट के खुले कॉलर पे शालीनता से चिपकी ग्रीन टाई, शुमायला को फ्लैट करने को काफी होते।

अगले एकाध क्विज के बाद कम्पीटीशन , क्विज कंपीटिशन न रहकर,स्माइल स्विच करने का सेशन बन गया था। दोनों एक दूसरे की तरफ़ देखकर ,एक दूसरे के चेहरे पे स्माइल स्विच करते रहते।

एक सैटरडे जब वो कोचिंग, होमवर्क से लदी फदी ,घर लौटकर ड्रेस चेंज कर रही थी, तभी माँ का फोन बजा! उसने रिसीव किया तो उधर से आवाज़ नही आई।

वो हेल्लो हेल्लो बोलती रही!

"ड्रेस चेंज हो गया?" कुछ देर बाद सामने वाले ने पूछा।

"तुम कौन?" शुमायला ने आवाज़ पहचान लिया था फिर भी अनजान बनी।

"वही जिसे हराकर तुम्हें बहुत मजा आता है।"

"अच्छा आप.......?" उस ने चौंकने का नाटक किया।

फिर दोनों ओर से हँसी गूँज उठी। उस दिन की बातें तब तक ख़त्म नही हुई जब तक दोनों तरफ़ का बैलेंस ख़त्म नही हो गया।
माँ ने बैलेंस चेक किया, बीएसएनएल वालों को गालियाँ दीं और शुमायला ने धन्यवाद, क्योंकि
अग़र उनलोगों ने रेगुलर पैसा नही काटा होता तो आज वो पक्का फंस जाती।

शहर छोटा हो और इश्क़ नौवीं-दसवीं में हो जाये, तो प्रेमी जोड़े पास कुछ करने का स्कोप होता नही है। लड़के का काम होता है , प्रोटेक्शन देना और लड़की का काम होता है प्रोटेक्शन लेना ।

वो प्रोटेक्शन दे रहा था, वो ले रही थी। कोई लड़का अब उसका पीछा नही करता था, कोचिंग जाती तो जूनियर उसे साइड दे देते ।
स्कूल से लौटते वक्त जो लड़के उसके पीछे पड़ा करते थे ,जाने कहाँ गायब हो चुके थे।

अब वो स्पेशल फ़ील करने लगी थी। ख़ुश होती तो बात- बेबात कार्ड्स बना के उसे दे देती।

दोनो के मिलने के ठीक सत्तासी दिनों बाद वैलेंटाइन आया , तो उस ने सत्तासी हर्ट्स का कार्ड बना कर उसे दिया था। उस दिन वो बेहद ख़ुश था और उसे खुश देखकर वो भी खुश थी। पहली बार हिम्मत करके उसके साथ रेस्त्रां गई , ख़ूब मज़े किये । जिंदगी में मस्ती का पुट आ गया था।

मार्च में शुमायला का फ़ाइनल एग्ज़ाम हो गया! स्कूल से निकल कर वो दूसरे कॉलेज में चली गयी। लड़का भी एक छोटी-मोटी नौकरी के चक्कर में शुमायला से थोड़ा दूर होने लगा, क्योंकि वो शुमायला को अब नौकरी की वजह से पहले जैसा समय नहीं दे पा रहा था।
रिलेशनशिप स्टेटस चेंज होकर डिस्टेंस रिलेशनशिप में बदल गया।

अब शुमायला के ऊपर पढ़ाई का बोझ बढ़ गया और कोचिंग के बाद रात तक थककर पस्त होने लगती थी, मग़र वो नही मानता......दोनों अब लाख लड़ाई के बाद रात रात भर जगाकर एक दूसरे से बातें करते थे। वो अपनी दिनचर्या बताती , उसका मन होता तो किसी बात पर डाँटता या किसी बात पर प्यार जताता। वो प्यार को भी प्यार समझती और डांट को भी। शुमायला को बस उसका साथ चाहिए था इससे ज्यादा उसने कभी उससे उम्मीद की नहीं थी।

रात को बात क्या शुरू हुईं तो उसने धीरे-धीरे शुमायला को दिन में कॉल करना कम कर दिया। रात को रस्मी तौर पर फोन करता और जल्दी फ़ोन रखने की जिद करता, वजह पूछने पर कहता, कम बातें कर रहा हूँ ताकि तुम अपने पढ़ाई पे फ़ोकस कर सको। वो चुप हो जाती,लगता की वो सही तो बोल रहा है...फिर लगता कहीं किसी और के साथ तो नही? मग़र ऐसे ख्याल आते ही अपना सर झटक देती। कभी कुछ पूछती तो कहता.....देखो मैं तुमसे जितना प्यार करता हूँ, तुम उससे ज्यादा मुझे प्यार करती हो। मैं तुम्हें छोड़ने का सोच भी नही सकता।

एकाध महीनों तक ऐसा चलता रहा, अब कॉल भी इसीलिए आते ताकि पता चल सके कि दोनों रिलेशनशिप में हैं! एक दिन शुमायला की तबियत ख़राब थी , उसे बात करने का बहुत मन कर रहा था तो उसे कॉल लगाया। कॉल रिसीव करते ही वो बोला, "अभी बिज़ी हूँ रात को बात करता हूँ।" शुमायला का मूड ख़राब हो गया, चिढ़कर बोली "या तो अभी बात करो या फ़िर कभी मत करना।"

"ठीक है कभी नहीं करूँगा ,," कहकर उसने फोन काट दिया ।

शुमायला की तबियत अच्छी नहीं थी, अफ़सोस करते हुए उसने दुबारा फ़ोन मिलाया। एक रिंग में कॉल कट गया! शायद उसने फिर से उसका नम्बर "ब्लैकलिस्ट" में डाल दिया था।
एक बार पहले भी वो ये कर चुका था।

उस ने सोचा कि अब वो फोन नहीं करेगी मगर उसकी तरफ़ से अगले तीन दिनों तक कोई फोन न आने पर अंततः उसे फोन करना पड़ा वो मन के हाथों मजबूर तो थी ही और रिश्ते को बचाना भी ज़रूरी था।

नम्बर अभी भी ब्लैकलिस्टेड ही था तो वो डायल करती गयी कॉल कटता गया। 511 बार डायल करने के बाद कम्पनी कॉल करना ब्लॉक कर देती है....वो ब्लॉक होने के बाद भी डायल करती रहती। खाना पीना छूट गया , बस शून्य में तकती रहती । उसकी बैचेनी बढ़ने लगी , कभी कभी तो जैसे मष्तिक ही सुन्न पड़ जाता। आसपास सब स्थिर लगता....सुन्न।

वो छोटे शहर की लड़की थी, लड़कों की तरह या बड़े शहरों की लड़कियों की तरह दर्द कम करने के लिए सिगरेट और शराब भी नहीं पी सकती थी। कुछ कर सकती थी तो बस रोना, वो रोती रहती... चेहरा, छाती, घुटना एक करके बस रोती रहती। तब तक रोती रहती जब तक थकन चेहरे पे एक उदास मुस्कान न ला दे।

वीमेंस डे को उसने , उसे हज़रत निज़ामउद्दीन दरगाह की एक फ़ोटो गिफ्ट दी थी। वो उसे सीने से लगाए रहती और दिन रात हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया से दुआ कर उसे वापस माँगती। जब घर में अकेले होती तो हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया की वो तस्वीर जानमाज़ पर रखकर सजदे में लेट जाती और अपने औलिया के सामने भी वही फ़रियाद करती। जिस भी दरगाह, मस्जिद के आगे से गुजरती, सर झुका लेती!

दिनभर मन ही मन अल्लाह को याद करती, कहती कि कम से कम एक बार .....क्यों छोड़ कर गया है? यही बताने को भेज दो। दुआएं करती..पर जब समय ख़राब हो तो निश्छल दुआएं भी नहीं सुनी जातीं।

महीना गुजरा तो ज़रा उदासीनता कम हुई। वो थोड़ा स्वस्थ तो हुई मगर अब लोगों से बातें कम करने लगीं और मुस्कराने ज्यादा, इस मुस्कराहट में मुस्कान नही बेबसी होती पर वो सम्भल गयी ; टीस अब भी थी मन में , पर उसे भुला दिया! अपना नम्बर भी बदल दिया ताकि दुबारा सम्पर्क का कोई ज़रिया न रहे।

उसने जाने के तीसरे महीने के बाद सायमा के पास कॉल करना शुरू किया कि "कुछ भी कर के 'उससे' बात करवा दो"; पर वो मना कर देती बात करने से।
एक दिन उसने नस काटने की धमकी दी तो सायमा से रहा नही गया। उसने शुमायला को एक बार बात करने को मना लिया।
......…................................

रात के ग्यारह बजे थे ,शुमायला ने हेलो कहा
उधर से खामोशी छाई रही, फिर वो सिसकने लगा...माफ़ी मांगने लगा। कहता रहा कि उसे छोड़कर तो गया, पर किसी दुसरे के पास नही गया, कई लड़कियाँ उससे मिलना चाहती थी लेकिन उसने सबको ना कर दिया! वो हर जगह उसे याद आती रही। मिलने के एक एक पल को याद करने लगा।

शुमायला हुँ ...हाँ करती रही। अब उसे उसकी हर बात फरेब लगती।

उसने कहा कि एक बार पहले की तरह I LOVE YOU कह दो न!
शुमायला चुप रही...वो बोला, "तुम तो मुझे, मुझसे ज़्यादा प्यार करती थी न?....तो एक बार कह दो न प्लीज़ .......या इतना ही कह दो की तुम मुझसे प्यार नही करती, फिर मैं दोबारा कॉल नही करूँगा"

शुमायला का गुस्सा सातवें आसमान पर चला गया पर किसी तरह से खुद को जब्त करते हुए बोली,"

"खालिद हसन फारूक़ी! ठंडी जनवरी की रात में अपनी हथेलियों पर पानी की एक बूँद रखकर देखना एक सिहरन उठेगी.....मेरी मुहब्बत की तड़प उससे कहीं ज़्यादा थी।"

वो चुप हो गया फिर लगभग रोने को आया ,"तुम सबकुछ हो, मनौती में तुम सें तुम्हे से माँग रहा हूँ, प्लीज वापस आ जाओ।"

शुमायला ने चुपचाप से फ़ोन रख दिया। वो सादा दिल थी मासूम नही। सही गलत जानने लगी थी।
उधर वो रोता रह गया इधर शुमायला भी सिसकने लगी तभी सायमा ने दोबारा कॉल कर शुमायला से पूछा "बात हुई"?
शुमायला ने जवाब दिया *हां*
सायमा - तो क्या हुआ तुम लोगों के रिलेशनशिप का?

शुमायला - "जो तारा ख़ुद को सलामत नही रख सका, वो टूट के दूसरों की मन्नत क्या पूरा करता"
और उसने इतना कहकर फ़फ़कते हुए फ़ोन काट दिया.

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