चीख-2

            विवेक को लगा मानो वो कोई भयानक सपना देख रहा हो। मयंक किसी यंत्रचलित गुड्डे सा बार बार अपना सर लिफ्ट की दीवार पे पटक रहा था। फर्श पे खून ही खून फैला हुआ था।
     "मयंक!!!" वो भाग कर गया और मयंक को रोका। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि उसे दर्द तकलीफ या दूसरा कोई अहसास हो या वो विवेक को पहचाना भी हो।
  
"आप लोग तमाशा क्या देख रहे हैं..जाईये एम्बुलेंस को फोन करीये..कोई मुझे एक साफ कपड़ा देगा!!" विवेक बाहर खड़े लोगों से बोला।
मयंक को हास्पीटल पहुंचा दिया गया था। विवेक अब तक सदमें में था कि किसी का दिमाग इतना कैसे हिल सकता है! क्या हुआ था उसे!!
आफिस से फ्री होते ही विवेक और कोमल हाॅस्पीटल गये मयंक से मिलने। उसकी हालत चिंताजनक थी।

"उस पर किसी ने काला जादू किया है.." उनका एक कलीग पूरब बोला।
"क्या बकवास है ये..मुझे इन सब पे भरोसा नहीं.." विवेक बोला।
"ये चीजें होती हैं..और करने वाले को कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुझे भरोसा है या नहीं.." पूरब थोड़ी गुस्से से बोला।
विवेक का चेहरा रंग बदलने लगा।
"सुन.." उसने बोलना शुरू किया..
"नहीं तू सुन..उसकी बात काटता पूरब बोलने लगा..
अब तु बोलेगा ये सब अंधविश्वास है.. हम पढ़े लिखे लोग हैं यही न?" विवेक चुप रहा।
"किसी बात पर आंख बंद करके विश्वास करना जितना बड़ा अंधविश्वास है उतना ही बड़ा अंधविश्वास है हर बात को आंख बंद करके नकार देना। हम पढे़ंलिखे लोग भी कम अंधविशवासी नहीं होते" पूरब बोला।
"ये लेक्चर बंद करो..उसे क्या हुआ है?" कोमल बोली।
"उसका दिमाग हिल गया है" विवेक ज़िदभरे स्वर में बोला।
पूरब वहां से उठने लगा "अगर दुबारा कोई ऐसा हिले दिमाग वाला मिले तो मुझे जरूर बताना.." वो व्यंग से बोला।

शाम का वक्त था। कोमल और पूरब एक काॅफी शाप में बैठे थे। दोनो के सामने काॅफी के मग थे।
"तुम उस से बहस करने का कोई मौका नहीं छोड़ते" कोमल बोली।
"मुझे क्या पड़ी है बहस करने की पर वो ही जबरजस्ती मेरी बात काट रहा था" पूरब बोला।
"वैसे क्या सचमुच वो होता है? काला जादू?" कोमल थोड़ा डरते हुए पूछी।
"मुझे थोड़ा बहुत पता है..उस दिन जिस तरह मयंक का व्यवहार था साफ दिख रहा था उसे कुछ बुरे विज़न्स आ रहे थे ऐसा तो किसी तंत्र मंत्र से ही संभव है..मतलब कोई अचानक पागल तो नहीं हो सकता...
         पूरब बोल रहा था और उन दोनों को ही अंदाजा नहीं था कि उसने दो टेबल दूर एक अंजान लड़की कान खडे़ किये सावधानी से उनकी सारी बातें सुन रही थी।

"बहुत देर हो गई...चलो मुझे दूर जाना है" कोमल बोली। वो दोनों उठ खड़े हुए और गेट से बाहर निकल गए। उनसे दो टेबल दूर वो लड़की उठी..उनकी टेबल के पास आई और सावधानी से दाएं बाएं देखने लगी। फिर उसने एक रूमाल निकाला और उससे पूरब के काफी पी कर छोड़े कप को लपेट कर अपने बैग में रख लिया।
            वो अनामिका थी।

अगले दिन आॅफिस का महौल बहुत भारी था। पिछली रात हास्पीटल में मयंक की मौत हो गई। उसके खाली केबिन को देखता विवेक सोच रहा था कि क्या पूरब सच बोलता हो सकता है?? क्या वाकई काले जादू जैसी चीज होती है??!!
पूरब....अरे! पूरब भी आज आॅफिस नहीं आया!! क्यों!
इस बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी।

"भईया कब तक आ रहे हो?" वरूण फोन में बोला।
"बस आधे घंटे " विवेक बोला।
"ओके! मैं आज डिनर आर्डर कर देता हूं बनाने का मूड नहीं" वरूण बोला।
"ठीक है" विवेक बोला।
वरूण, विवेक का छोटा भाई था जो कि मेडिकल का फाईनल ईयर का स्टूडेंट था। दोनों भाई साथ ही रहते थे। विवेक के पिता एक छोटे से शहर में सरकारी नौकरी से रिटायर्ड हुए थे वो और उसकी मां वहीं रहते थे।

विवेक घर जाने के लिये निकला पर न जाने क्या सोच कर उसने रास्ता बदल दिया। उसने एक बड़े अपार्टमेंट के सामने ला कर बाईक रोकी। यहीं पूरब रहता है। वो उपर पहुंचा कालबेल बजाई।
कोई जवाब नहीं।
उसका दिल धक्क से रह गया
तभी उसका ध्यान गया...दरवाजा तो खुला हुआ है!!
"पूरब!!!,... वो आवाज लगाता घर के भीतर घुसा।
उसे लगा कहीं कांच तड़क रहा हो उसने हड़बड़ा के नीचे देखा कहीं उसने कांच पे पैर तो नहीं रख दिया।
नीचे कुछ नहीं था। वो आगे बढ़ा घर में अजीब सी डरावनी सी शांती थी।
दुबारा कांच तड़कने की आवाज!
उसने गर्दन घुमा कर सब तरफ देखा। वो इस वक्त लीविंग रूम में था जहां हल्का अंधेरा था। उसने स्विच की तरफ हाथ बढ़ाया तभी...फिर कहीं कांच तड़का!
वो पलट कर देखने लगा सामने एक छोटा सा डाईनिंग टेबल था जिस पर कोई बैठा था। हल्का अंधेरा था।विवेक की तरफ उसकी पीठ थी। फिर कांच तड़कने की आवाज आई।
"पूरब...?":बोलता हुआ विवेक आगे बढ़ा। वो पूरब ही था।
जो ही विवेक उसके सामने पहुंचा वो हड़बड़ा कर पीछे गिर गया।
     पूरब शांती से डाईनिंग टेबल पे बैठा आराम से कांच के टुकड़े चबा रहा था!!!

उसके सामने टेबल पे कांच ही कांच बिखरा हुआ था...
उसके मुंह से...कटे हुए गाल से खून रीस रहा था पर चेहरे पर दर्द का कोई भाव न था!
"पूरब..." विवेक चीखता हुआ उसे झंकझोरने लगा पर पूरब को कोई फर्क नहीं पड़ा। तभी विवेक की नज़र कोने की एक छोटी टेबल पे रखे फोन पर पड़ी जो कि शायद अपार्टमेंट के अंदर ही इस्तेमाल होने वाली फोनलाईन थी। उसने फोन उठाकर केयरटेकर से मदद मांगी। वो पूरब की तरफ पलटा और...बस...खड़ा देखता रह गया।
    
  पूरब के पीछे वही भयानक डरावनी सी लड़की खड़ी थी। पूरा शरीर जैसे राख का बना था। शरीर पर कई जगह चोट के निशान थे जिसमें से काला खून रीस रहा था। उसका आधा चेहरा बालों से ढंका था और बाकि का गुस्से से विवेक को घूर रहा था जैसे विवेक उसके काम में अड़चन डाल रहा हो। अचानक उसने अपने दोनो हाथों से सामने बैठे पूरब के दोनों कंधे जकड़ लिये..उसका मुंह असमान्य रूप से लम्बा खुलता गया और वो बुरी तरह चीखने लगी... वो चीख किसी जानवर के गुर्राने से भी भयानक थी...एक गुस्से भरी चीख...

कोई उसका चेहरा थपथपा रहा था। वो हड़बड़ा के उठा...
   पूरब..."
"उसे हास्पीटल भेज दिया गया" एक रौबीली आवाज आई। वो एक पुलिस वाला था।
"क्या हुआ था?" उसने आगे पूछा। विवेक ने सब बता दिया उस लड़की के भूत के अलावा। उसने देखा कि थोड़ी दूर पर राहुल और सुयश खड़े उसे भयभीत नज़रों से देख रहे थे। वो दोनों ही पूरब के फ्लैटमेट थे।
किसी के कुछ भी समझ नहीं आया। मान लिया गया कि मयंक की ही तरह पूरब का भी दिमाग चल गया था।

"नमस्ते अंकल! मैं विवेक हूं मयंक के आफिस का दोस्त" विवेक ने मयंक के पिता से कहा। उसने अब मयंक को टटोलने की ठान ली थी जिस से ये सब शुरू हुआ था।
मयंक के पिता ने उदासी से सर हिलाया और उसे अंदर आने का इशार किया। मयंक के माता पिता ने बताया कि संडे को मयंक से उनकी फोन पर बात हुई थी और वो बहुत खुश था।
विवेक को याद आया उसी दिन तो वो अनामिका से मिला था।
"क्या मैं एक बार उसका फोन देख सकता हूं?" विवेक बोला।

मयंक के काल रजिस्टर में जो आखरी नम्बर थे उनमें एक खुद उसका खुद का था, एक आफिस का, एक उसके पिता का और एक किसी टैक्सी ड्राईवर का। दर्द भरी टीस के साथ उसने वो मिस्ड काल भी देखे जो उसने और कोमल ने उसकी मौत से एक दिन पहले उसे किये थे।
वो मायूस हुआ। उसे उम्मीद थी कि उसमें शायद अनामिका का नम्बर हो...पर एक मिनट! उसने टैक्सी ड्राईवर का नम्बर अपने फोन पर ले लिया।

टैक्सी एक पुराने घिसे पिटे एकमंजीला मकान के पास आ कर रूकी।
"वो साहब उस दिन यहीं आए थे" टैक्सी ड्राईवर बोला।
"तुम्हें पक्का याद है?" उस मैले कुचैले घर को संदेह से देखता हुआ विवेक बोला।
"हां साब! मैं उन्हें वापस भी तो ले गया था यहीं से" टैक्सी ड्राईवर बोला। विवेक उस घर को संदेह से देख ही रहा था तब तक दरवाजा खुला और जगमग जगमग अनामिका ने बाहर कदम रखा।

विवेक उसे देखता ही रह गया। जरूर वो अनामिका ही थी। उसकी खूबसूरती के बारे में मयंक ने जादा नहीं बोला था वो थी ही बेहद खूबसूरत। क्या उससे बात करनी चाहीये! वो सोचने लगा..
वो बस में बैठी थी और उस से दो सीट दूर विवेक बैठा था। उसने फिलहाल चुपचाप पीछा करने का सोचा था।

वो एक माल के मल्टीफ्लैक्स में बैठी ऊंघ रही थी। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि उसे फिल्म से कोई मतलब था। उसके पीछे वाली रो में बैठा विवेक उसे गौर से देख रहा था।
इंटरवल हुआ तो वो बाहर चली गई। फिर वापस न आई।
कहीं उसे शक तो नहीं हो गया...विवेक सोचने लगा। अब तक तो वो कहीं दूर  चली गई होगी पीछा करना बेकार था।
घर का पता तो मैं जानता ही हूं उसने राहत से सोचा।

उसे पता ही नहीं चला फिल्म कब खत्म हो गई। लोग उठ कर जाने लगे। वो भी उठा। जब वो अनामिका की खाली सीट के पास पहुंचा तो ठिठक गया..
            वहां एक खूबसूरत सा झिलमिलाता, खुद के किसी लड़की का होने की चुगली करता पर्स पड़ा हुआ था।

रात हो चुकी थी।
वो कब्रिस्तान था। वो यहां वहां मंडराती ताजी कब्र की तलाश कर रही थी। उसे मिल गई। उसके साथ आई दोनो आकृतियां कब्र खोदने लगी।
"आदमी है..बड़ी हद कल दफन हुआ होगा" साथ आई एक आकृति नाक दबा कर बोली। वहां भयंकर बदबु थी।
"चलेगा!" बूढ़ी औरत बोली मानो खुदके लिये गहने खरीद रही हो "सिर्फ पैर अलग कर लो पूरा शरीर वापस दफना दो" उसने गहरी सांस ली...मानो उस मुर्दे का आंकलन कर रही हो। फिर वो कब्रिस्तान में टहलने लगी जैसे वो कंपनी बाग हो।

उधर विवेक अपने कमरे में बैठा उस पर्स को उलट पलट रहा था। उसके अंदर गुस्सा उबल रहा था। वो समझ चुका था कि वो लड़की जानबूझकर अपना पर्स ऐसी जगहों पर प्लांट करती है जहां मयंक या उसके जैसे दूसरे आशिक मिजाज लड़के उसे देख सकें।
पर उसके बाद क्या? क्या सचमुच मयंक और पूरब के अंजाम के लिये वो ही जिम्मेदार है?
उसका इस ढंग से पर्स छोडना क्या साबित करता है आखिर?
   
यही सोचते हुए उसने पर्स खोला।
पर्स में कुछ नाम मात्र के पैसे, एक चमकीला गुलाबी हेयर ब्रश, एक भड़कीले रंग की लिपस्टिक और एक रूमाल था जिस पर मानो पूरी बोतल इत्र की उड़ेल दी गयी हो।
    "पूरा ही चित्त करके मानेगी पठ्ठी!" विवेक सोच रहा था..

"ओके अनामिका! तुम्हें तुम्हारा खोया पर्स लौटाने मैं जरूर आऊंगा...

                              * * * * * * *
    
         पहली बार कोई इस फंदे में जानबूझ कर फंसने जा रहा था। क्या विवेक का भी अंजाम अपने दोस्तों जैसा होगा? या वो इस रहस्य से पर्दा उठा पाएगा?
जानने के लिये कहानी में मेरे साथ बने रहीये
                                                कहानी जारी रहेगी.....

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