हिमालय के उस पार -Episode:05

सूचना : -       यह एक काल्पनिक कथा है । घटनाओं , ऐतिहासिक व्यक्तियों या कथानक में आये संदर्भों का वास्तविकता से कोई लेना -देना नहीं है। देश,काल,परिस्थितियों आदि का उल्लेख मात्र कथा को आगे बढ़ाने और उसमें वास्तविकता का आभास देने के लिए हुआ है। भूल -चूक लेनी -देनी !!धन्यवाद !!!
अब तक की कहानी ...
                                'यह वो दास्तान है जो अब तक सुनाई ही नहीं गई। एक युद्ध हिमालय की पहाड़ियों में सन् 1962 में लड़ा गया था । यह दास्तान उसी युद्ध की है जो भूली -बिसरी और अनसुनी रह गई।     ऐसा क्या हुआ कि जो सेना भारतीय गौरव को रौंदती हुई ,उसका मान मर्दन करती हुई आगे बढ़ी जा रही थी ,उसको अचानक कदम पीछे हटाने को मजबूर होना पड़ गया।यह इस युद्घ का वह रहस्य है जो अब कर्नल जोशी को पता चलने वाला था ।उसकी टीम के सभी सदस्य छुट्टियां मना कर वापस आ चुके थे और नये मामलों का इंतजार हो रहा था।इसी बीच उसे गगन सिंह थापा का अर्जेंट संदेश मिला कि तुरन्त चले आइये ,देर हो जाने पर कुछ भी हो सकता है। गगन सिंह थापा उसके पैतृक घर - द्वार का केयरटेकर है जिसके भरोसे सब कुछ छोड़-छाड़ वह दुनिया भर में भटकता रहा है। थापा की तरफ से आये इस एस.ओ.एस.ने कर्नल को सब कुछ भूल पहाड़ों की ओर चल पड़ने पर मजबूर कर दिया।  "इंडियन एनालिटिकल रिसर्च एंड कंसल्टेंसी " के ऑफिस को पी.के. के हवाले कर कर्नल दीपक जोशी इस सफर पर निकल पड़ा ।
         अपने पैतृक निवास दीवान ज्यू की हवेली पहुँच कर सफर से थका हारा वह बिस्तर में घुसते ही गहरी नींद के आगोश में चला जाता है। सबेरे उठने पर रेस्ट रूम जाते हुए कर्नल की उचटती नजर पडौ़स के कमरे की खुली खिड़की पर पड़ती है।वहाँ ध्यान मुद्रा में आसन पर बैठी एक पूर्णतः नग्न विदेशी महिला को देख उसके होश उड़ जाते हैं। कर्नल और उस विदेशी महिला की बातचीत नाश्ते की टेबल पर होती है। उसका नाम माँ सोफ़ी है और कर्नल उसकी उम्र का अनुमान लगाने में असफल रहता है। कर्नल को वहाँ उसी के कहने पर थापा ने संदेश भेज कर बुलाया है।नाश्ते की टेबल पर ही एक अजनबी केशवदत्त पाँडे ढेर सारे पुराने ग्रन्थों के साथ पहुँचता है। इस माहौल से ऊब कर कर्नल पुराने बाजार वाली सड़क पर टहलने निकल जाता है जहाँ एक बैंक के भीतर प्रवेश करते ही वहाँ का मैनेजर उसको पहचान उसके स्वागत में कुर्सी छोड़ उठ खड़ा होता है। कर्नल को भी वह जाना -पहचाना सा लगता है लेकिन वह उसे याद नहीं कर पाता है।अब आगे की कहानी...
Episode :05
                   थोड़ी ही देर की औपचारिक बातचीत में यह रहस्य खुल गया कि वह मैनेजर कर्नल को  जाना-पहचाना लगने के बावजूद  पहचान में  क्यों नहीं आ रहा था। कर्नल का एकाउन्ट इसी बैंक की पार्लामेंट स्ट्रीट शाखा में था जहाँ  यह शख्स सुपरवाईजरी श्रेणी में मिली तरक्की से पहले रह चुका था। कर्नल के सारे काम वहाँ के जी.एम के चैम्बर में बैठते ही हो जाया करते हैं अतः वह वहाँ के फ्रंट ऑफिस के कार्मिकों  को पहचानते हुए भी उनसे अपरिचित ही रह गया था।
                   संयोग से यहाँ आने पर मैनेजर से कर्नल को ग्यात हुआ कि इस बैंक में उसके स्वर्गीय पिता का एक लॉकर है जिसमेँ वह स्वयँ नामिनी है। लॉकर का किराया ओवर ड्यू है और पिछले दस वर्षों से ऑपरेट नहीं हुआ है। इस नये मैनेजर ने जब यहाँ का चार्ज लिया तो इस लॉकर का मामला उसके संग्यान में आया । नामिनेशन में कर्नल का नाम देख उसने इधर-उधर पूछताछ कर इस बाबत संदेश दीवान  ज्यू की हवेली में भिजवाया था। कर्नल को यहाँ बुलवाने का एक मकसद शायद यह भी हो सकता था। लॉकर के दस्तावेजों में दर्ज पता तो अल्मोड़े का था जहाँ भेजे गये  पत्र वापस आ कर बैंक मैं जमा थे। चूँकि लॉकर में कर्नल के पक्ष में नामांकन (Nomination) मौजूद था इसलिये बैंक की औपचारिकताएं ज्यादा पेचीदा नहीं थीं। फिर भी मृत्यु प्रमाणपत्र और लॉकर की चाभी तो चाहिए ही थी जो उसके पास  मौजूद नहीं थे। मृत्युप्रमाण पत्र कहाँ रखा होगा ,इसे सोचने -विचारने में वक्त लगने वाला था । उसके पिता की मृत्यु को एक लम्बा अर्सा बीत चुका था और उनसे संबंधित सभी ग्यात मामले निबटाये जा चुके थे। दूसरी मुसीबत लॉकर की चाभी को ले कर थी जिसका मिलना नामुमकिन सा था। ऐसी स्थिति में लॉकर को ड्रिल ओपन करना ही एकमात्र विकल्प था । वह एक कठिन कार्य था क्योंकि कि उसे लॉकर निर्माताओं के अधिकृत मैकेनिक ही करते हैं। इस सुदूर पहाड़ी अंचल में उनको बुलाने में समय और कीमत दोनों ही ज्यादा खर्च होने का अनुमान था।
                         शीघ्र वापसी की कर्नल की इच्छा  पूरी न हो सकी । वह अगले इक्कीस दिनों तक वहीं फँस कर रह गया। इसका फायदा यह हुआ कि धीरे -धीरे वह माँ सोफ़ी के निकट आता गया और दोनों के बीच एक कामचलाऊ रिश्ता कायम हो गया । वह रोज सोचता था कि वह अगली मुलाकात में सोफ़ी से जरूर पूछेगा कि वह उसके बचपन का नाम कैसे जानती है और उसे यहाँ क्यों बुलवाया गया था ? लेकिन उन दोनों के बीच जब बातों का सिलसिला शुरू होता तो कोई विषय ऐसा नहीं रह जाता जिस पर बात न होती हो लेकिन यही सवाल रह जाते थे ।ठीक इक्कीसवें दिन जब आखिरकार लॉकर के ड्रिल ओपन की घड़ी सामने आ गई , कर्नल ने ये सवाल भी माँ सोफ़ी के सामने रख ही दिये। लेकिन उत्तर देने की अपेक्षा उन्होंने कर्नल को आश्वस्त करते हुए कहा ,
---"पहले जा कर लॉकर खोलो  और भी सवाल सामने आ सकते हैं। सभी के जवाब समय आने पर मिल जायेंगे "।
                        लॉकर को ड्रिल करके के खोलने पर कर्नल को वहाँ जो कुछ मिला उससे  वह बहुत निराश हुआ। सिर्फ़ एक साधारण मोटी सी डायरी वहाँ थी जिसके कुछ पन्नों को सफे़द चीटियां (White Ant) चट कर चुकी थीं। उलट -पुलट कर देखने पर कर्नल पहचान गया कि भीतर उसके पिता की ही लिखावट है ,यानी कि यह उन्हीं की डायरी है। डायरी को झाड़ -पोंछ कर ,चीटियों से मुक्त कर और उसे पिता कीअंतिम निशानी मान  कर्नल ने उसे अपने ओवरकोट की जेब के हवाले किया। लॉकर सरेंडर कर दिया गया , उसे रखने की कोई जरूरत नहीं थी। बैंक मैनेजर  का आभार प्रकट कर कर्नल जब दीवान ज्यू की हवेली वापस पहुंचा तो पाया माँ सोफ़ी वहाँ नहीं हैं । थापा से पूछने पर पता चला कि केशवदत्त पाँडे आए थे ,उन्हीं के साथ कहीं गई हैं। उसने सोचा कि यहीं कहीं आस-पास गई होंगी ,शायद उन्हीं पुराने ग्रन्थों के चक्कर में। लेकिन जब वह देर शाम तक वापस नहीं लौटीं तो कर्नल को चिन्ता होने लगी। उसने फिर थापा को पकड़ा। इस बार थापा ने जो कुछ बताया उससे कर्नल का सिर फिर गया। उसकी इच्छा हुई कि अभी थापा को गर्दन पकड़ कर उठा ले और वहीं दे पटके।बड़ा मासूम सा चेहरा बना थापा ने बताया था कि वह तो पाँडे ज्यू के साथ कहीँ बाहर के लिए निकली हुई हैं और वापसी में शायद दो -तीन दिन लग जायेंगे ।
---"यह बात तू मुझे पहले नहीं बता सकता था ?"
----"आपने पूछा कब था ?"
-----"क्यों, बैंक से वापस आ कर नहीं पूछा था ?"
____"आपने पूछा था कि माता जी किधर हैं और मैने बता तो दिया था कि वह केशवदत्त पाँडे ज्यू के साथ बाहर गई हैं।"
-----" बड़ी मेहरबानी की थी जो इतना भी बता दिया था ," पैर पटकता हुआ कर्नल अपने क्रोध को शान्त करने के लिए गिलास भर ठंडा पानी पी वहीं कमरे में चहलकदमी करने लगा।
                इसी बीच मौका पा थापा वहाँ से खिसक लिया ।  शान्त हो कर सोचने पर कर्नल को लगा कि यह तो एक सुनहरा अवसर मिल रहा है सोफ़ी की जाँचपड़ताल करने और उसकी वास्तविकता जानने के लिए। उसने रात के अंधेरे में सोफ़ी के कमरे की तलाशी लेने का पक्का इरादा कर लिया । तलाशी तो अभी तुरन्त ली जा सकती थी लेकिन इस बात की जानकारी  थापा को होने देना कर्नल को मुनासिब न लगा।
                तलाशी में कुछ खास हाथ न लगा । लेकिन बिस्तर के नीचे छुपा कर रखी गई साधारण मोटी सी डायरी ने कर्नल को चौंका दिया । वह लॉकर में मिली उसके पिता की डायरी की हूबहू प्रतिरूप थी । फर्क सिर्फ़ इतना था कि यह अपेक्षाकृत सहीसलामत थी जबकि उसकी डायरी को सफ़ेद चीटियों ने क्षतिग्रस्त किया हुआ था।
(क्रमश:)

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.