सरज़मीने हिन्द

ऐ सर जमीने हिन्द
मुझे तुझसे प्यार है
दिल क्या चीज़ है
जान भी तुझ पर
निसार है ।
हर कतरा लहू का मेरे
काम आए तेरे लिए
मौका मुझे तो बस
एक दरकार है।
ऐ................
क्यों न हो दिल तुझपे फिदा
ऐ   सरज़मीने   हिन्द
पहाड़, मैदान, जंगल, सहरा
और तेरा गंगो जमन,
ज़र्रे-जर्रे में  तेरे
एक अनोखी रंगों बू
एक निराला बाँकपन
हर नज़ारा ही तेरा
बेमिसाल है।
ऐ............
जन्म भूमि भी मेरी तू
कर्म भूमि भी तू ही
तेरे दामन में जियूँ मैं
तेरे दामन में मरूँ
मिल भी जाए मुझको  जन्नत
तो खुदा से ये कहूँ
मुझको लौटा दे
तू मेरी फिरदौसे
हिन्दुस्ताने ज़मी
लम्हा-लम्हा हर जन्म का
फिर जियूँ मैं तेरे लिए
मौका मुझे तो बस
एक दरकार है
ऐ............
रोज़े अज़ल से अपनी
ख़ातून हसरत है ये ही
मिट जाऊँ तेरी खातिर
लब पे शिकवा न हो कोई
जो भी खोया है तेरा
वापस दिलाऊँ मैं
सोने की तुझको चिड़िया
फिर बनाऊँ मैं
देखा मेरी आँखों ने बस
ये ही ख्वाब  है
ऐ.................
         ****************
सय्यदा ख़ातून(स्व रचित)
एम.ए.हिंदी एम.ए.समाज शास्त्र व बीएड

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