बंजारन की आत्मा का राज़ (भाग 2)

अगले दिन पंडित जी और दो मजदूरों को बुलाया गया ताकि उस कोठरी को गिरवाया जा सके।

पंडित जी ने सबके माथे पर केसर का तिलक लगाया और हाथों में अभिमंत्रित की हुई मौली(कलावा) बांधा ताकि किसी को नुकसान न पहुँचा पाए।

उसके बाद पंडित जी, मामा और नानी और दोंनो मजदूर अंदर गए।

अंदर इतना घूप्प अंधेरा था कि लालटेन की रोशनी किसी काम नही आ रही है, उस कोठरी का सन्नाटा ऐसा था जैसे वो कोठरी घर में न होकर किसी जंगल मे स्थित हो।

थोड़ा आगे जाने और कहीं दूर से आ रही झींगुरों की आवाजें सुनाई देने लगी, ऐसा लग रहा था जैसे झींगुर भी डर रहे हो शोर मचाने से।

बंजारन से मिले सिक्के वहीँ रखे हुए थे, सबसे पहले उन्हें ही वहाँ से बाहर लाना था, मजदूरों ने जैसे ही बक्से को छुआ, वो बक्से तुरंत ऐसे हिलने लगे जैसे उनके अंदर किसी ने तूफ़ान भर दिया हो।

मजदूर डर कर तुंरत पीछे हट गए और गिड़गिड़ाने लगे "पंडित हमका जाए दियो, हमार छोट2 लरिका हैं, हम आपन जान जोखिम मा डाल के यहु काम ना करब"

पंडित जी बोले कुछ नही होगा तुम लोगो को जाओ उसे अच्छी तरह कस के पकड़ो और बाहर ले जाओ।

मजदूरों ने जैसे ही उस बक्से को फिर हाथ लगाना चाहा वो पलक झपकते ही घिसटता हुआ पीछे की दीवार से जा चिपका।

अब मजदूरों की हिम्मत जवाब दे गई लेकिन पंडित जी के बहुत समझाने से और ज्यादा पैसों के लालच में वो फिर तैयार हो गए।

इस बार वो जैसे ही बक्से की तरफ बढ़े पल भर में ही किसी अदृश्य ताक़त ने उठा कर उन्हें फेंक दिया, ये देख कर बाकी सब बहुत डर गए।

दोनों गिर कर बेहोश हो गए।

मामा और पंडित जी उन्हें लेकर जैसे ही देहरी के बाहर छोड़ने गए कोठरी का दरवाज़ा अंदर से बंद हो चुका था।

तभी वहां पायल और गहनों की वही मधुर झंकार सुनाई देने लगी जो नानी और मुझे सुनाई दी थी।

वो साया जब अंधेरे से चलता हुआ लालटेन की रोशनी में आया तो नानी उसे देख बुरी तरह डर गई।

देह के नाम पर सिर्फ उसका अस्थि पंजर ही था जिस पर उसने सारे गहने पहने हुए थे, जो बुरी तरह जल कर काले पड़ चुके थे, और जिनका अधिकांश भाग गायब था।

और हां सारे शरीर मे सिर्फ उसकी आंखें ही थीं जो सही सलामत अपने कोटरों में थी लेकिन इस वक़्त उनमे जैसे खून भरा था।

"श्यामा (नानी का नाम) तू मुझे मेरे ही घर से भगाएगी, तेरी ये हिम्मत! मेरे ही दिए धन से तेरे परिवार की आज ये शानो-शौकत है और तेरी ये मज़ाल की तू मेरा घर गिराए।"

ये बोलते हुए उसकी आँखों की पूतलियों का रंग सफेद पड़ चुका था, और अब उसकी आंखें उनकी रीढ़ की हड्डी में सिहरन पैदा कर रही थीं।

"तूने मेरी बच्ची को परेशान किया है, उस बच्ची ने तेरा क्या बिगाड़ा था जो तू उसे इतना परेशान कर रही है?"

"मैंने परेशान किया तेरी बच्ची को या उसने ख़लल डाली मेरे सुकून में , क्या ज़रूरत थी उसे मुझे टोकने की?"

"अरे वो तो उससे गलती हो गयी पर बदले में तूने भी तो उसका जीना हराम कर दिया,  मैंने तुझे यहाँ रहने दिया, मेरे खानदान ने कभी तुझे परेशान नही किया और तू आज मेरी पीहू को परेशान कर रही है"।

"तूने और तेरे खानदान ने मुझे यहाँ रहने दिया हा हा हा हा हा हा, अरी मूर्ख तुम लोगो ने मुझे नही बल्कि मैंने तुम लोगो को यहाँ रहने दिया"।

"अब जो भी बोल तू मैं आज तेरी कोठरी गिरा के रहूंगी"।

ये कह कर नानी ने जैसे ही फावड़ा उठाया वो वही हवा में ऊपर टंग गया और नानी की चींख बाहर तक सुनाई दी।

हम सब वैसे ही दरवाज़ा पीट रहे थे नानी की आवाज़ सुनकर हम बहुत डर गए कि क्या हुआ उनके साथ।

सबने कोशिश कर ली थी लेकिन दरवाज़ा नही खुला, सब थक चुके थे थोड़ी देर बाद मैंने दरवाज़े पर धक्का लगाना शुरू किया और एक धक्के के साथ ही  वो खुल कर वापस फिर बंद हो गया लेकिन मैं तब तक अंदर आ चुकी थी।



क्रमशः


कुछ टिप्पणियो के जवाब में मैंने पाठकों कल ही कहानी का अगला भाग उपलब्ध कराने का वादा किया था और रात तक मैंने कहानी पूरी भी कर ली थी लेकिन पता नही कैसे upload करते समय उसमे  बताने लगा कि blank कहानी upload नहीं हो सकती।

उसके बाद मैं फिर से अब तक जितना भी लिख पायी हूँ post कर रही हूँ।

कोशिश रहेगी कि कहानी जल्दी से जल्दी पूरी कर के आपतक पहुँचा सकूँ।

धन्यवाद🙏

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