बीते हुए वो दिन

  
चतुर्थ भाग
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    वीर के पापा जब चले गए तो मैं स्कूल की ओर भागा था। प्रांगण और आस पास के वो सभी स्थान जहाँ बैठकर अवकाश के क्षणों में हम सब खेलते , गप्पे लड़ाते, टिफिन उदरस्थ करते सन्नाटा पसरा था। सब अपने अपने कक्षाओं में पहुंच चुके थे।
    मैं दोबारा डाँट खाने के लिए तैयार नहीं था। ऊपर से गाल पर उभर आये निशान के बारे में भी सोच कर हलकान था कि क्या जवाब दूंगा। कोई भी देख के अनुमान लगा सकता था कहीं से मार खा कर आया हूं।फजीहत के डर से कक्षा से गायब रहना उचित जान पड़ रहा था।
    दिमाग सोच भी रहा था ,अभी तो खालिद सर का पीरियड है। अपने आप में ही मशगूल रहने वाले। बच्चों की उपस्थिति अनुपस्थिति से कोई लेना देना नहीं। समय में पाठ पढ़ाकर निकल जाने वाले। शोर-शराबे से भी उनको कोई फर्क नहीं पड़ता था।
    इस सोच से राहत मिली थी।
    मैं  स्कूल के निकट बने पार्क की ओर बढ़ गया था। इंतजार था तो बस , छुट्टी की घण्टी बजने की।जो पार्क से भी सुनाई देती थी।
    बच्चों के निकलते देख मैं अपने बैग को हासिल करने अपने कक्षा की ओर लपका था। सुरक्षा की दृष्टि से चेहरे को रुमाल से ढंक लिया था। हालांकि कोई ध्यान नहीं दे रहा था।
    दो बैग लटकाए वीर को आते देखा। मैंने राहत की सांस ली थी।
    हम दोनों साथ साथ बाहर निकले। गेट के बाहर वीर ने मुझे गले से लगा लिया। मैं अपना दर्द भूल सा गया था।
    "भाई बचा लिया रे!!!"गले लगाए हुए वीर अपने खुशी का इजहार करते हुए बोला ।
    मैं चुप रहा।
    "पापा को गलत मत समझना!!" वीर ने कहा था।
    मैंने गले से बांह को छुड़ाते हुए कहा,"छोड़ क्यों नहीं देते!!!"
    "क्या???बिस्कुट खाना??"और वीर ठठ्ठा कर हंसने लगा।उसकी हंसी मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी।फिर भी मैंने मुस्कुराकर साथ दिया ।
     उस दिन स्कूल से , पैदल के जगह वीर की साइकिल में बैठकर, घर पहुंचा था। दरवाजे के पास छोड़कर वीर अपने घर के लिए मुड़ा।
    फर्राटे से साइकिल चलाते हुए जोर से चिल्लाया था, "भाई!!! छोड़ दिया!!!तेरी कसम!!!"
    और .......!!!!!
    उस दिन से हम दोनों लँगोटिया यार बन चुके थे।
    धरम-वीर की जोड़ी!!!एक दूसरे के लिए समर्पित!!!
    चुहलबाजी करते साथ साथ स्कूल जाते,वापस आते और घूमते। उसकी सायकिल अब हम दोनों का बोझ उठाने लगी थी।

                 ©.......✍️शैलेन्द्र दुबे


    

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