सोमा ठाकुर की बीवी सराय रोड पर बने अपने मकान में रहना नहीं चाहती थी। बात बात पर ताना देती, घर की दीवार ललनी हवेली की दीवार से सटी थी। इतने पास होने के कारण लाख न चाहते हुए भी, हवेली के भीतर की आवाज़ें मुंडेर फांद कर कानों में घुल ही जातीं!

शराबी, आवारा तमाम तरह के मर्द जमघट लगाए रहते थे। फिर "हा हा ही ही" का शोर और शाम ढलते ही ऐसी ऐसी आवाजें की, छिः बोलने में भी शर्म आये। मगर बेशर्मी तो देखो, रोज सुबह हवेली की वो अकेली औरत सज-धज के ऐसे बाजार में निकलती, जैसे बरात में जा रही हो, लाज नाम तो जैसे सुना ही नहीं हो उसने। छत पर भी चढ़ कर नज़र में नज़र डाल के टोक लगाती, जाने कहाँ से इतनी हिम्मत और बेबाकी बटोरती है।

सोमा ठकुराइन बात करना तो दूर देखना भी पसन्द न करे, लेकिन ठाकुर ने सस्ती जमीन के चक्कर में यहीं नींव डाल दी। कहकर की तुम उधर न जाना-न देखना, पर आवाज़ों का क्या?

सुना है, कभी बहुत रईसी थी हवेली वाली मलकाइन की, पर पति मरने के बाद कुछ न छोड़ गया तो मजबूरी में ये सब....पर ऐसी भी क्या मजबूरी, घर-घर झाड़ू पोंछा करती, इज़्ज़त तो रहती, ये क्या दूसरे मर्दों पर डोरे डालने वाला काम छिः, ठकुराइन ने तो ग्वाला मोहल्ला से भोलथा और तिरलोचन को भी देखा है जाते, उनकी बीवियों के कान भरने को जी भी मचलता है पर क्या करे...आठ महीने का पेट है चला भी न जा रहा।

सांस लेना दूभर है, हवेली की दिशा में तो पाँव भी न धरे वो...नवरात्रि की मिट्टी लाने भी नौकर राजू जाता है, इतनी घिन है उनको हवेली से।

ठाकुर साब से कह दिया है बच्चा यहाँ नही जनेगी, घर बदलने का आश्वासन भी मिला है साथ ही मायके जाने की नसीहत; पर ठाकुर को ऐसे माहौल में अकेला छोड़ कैसे जाए! है तो वो भी आखिर मर्द ही।

लेकिन कई महीने से कोई आवाज़ उधर से इधर नहीं आई है।

और आज रात तो चीत्कार ज्यादा ही छन कर आ रही है ललनी हवेली से। लेकिन ये चीखें आम दिनों जैसी नहीं, ये तो दर्द से त्रस्त स्त्री की चीख है। मन में गड़ सा रहा है वो वेदना का स्वर, दयाभाव का अंकुर भी फूटने लगा है। ठकुराइन ने सोचा की ठाकुर साब से कहे की जाकर देख आएं पर कुछ सोचकर उस अंकुर को कुचल दिया।

अचानक शिशु की रुलाई में सनी हुई किलकारी सी आवाज़ गूँजने लगी है, स्त्री की चीख उसमे दब गयी या फिर...!ठकुराइन का "मातृ तत्व" में डूबा हृदय अधीर हो उठा। ठाकुर साहब भी जग गए, कोई बिल्ली का बच्चा तो नहीं रो रहा? उन्होंने कहा, नहीं ठकुराइन जानती है कौन रो रहा है...ऐसी ही किलकारी की अभिलाषा में तो आठ महीने काटे हैं उसने।

ठाकुर साहब की तरफ़ एक बार देख वो उठ खड़ी हुई, राजू नौकर भी कल तक छुट्टी में है। ठाकुर से गाड़ी निकालने को कह कर वो स्वयं बाहर जाने को हुई तो,

"हवेली मे पाँव धरोगी?" ठाकुर ने अचंभित होकर पूछा।

"कमल लाने कीचड़ में पाँव सानना पड़ता है।" खोयी हुई ध्वनि निकली गले से।

ठाकुर, बीवी को बाहर जाते हुए देखते रहे।

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