आईना

आईना झूठ नही बोलता, जो देखता है वही दिखाता है। अंतर सिर्फ इतना है कि हम किस भाव से देखते हैं।

आईने के सामने खड़ी कादंबरी की आंखे, झरझर बह रही थी। दबा हुआ रंग, उस पर चेहरे पर मुँहासे, अपने को हीन समझने को काफी थे। स्कूल से कॉलेज में आ पहुंची कादंबरी के मन मे भी चाहते फूटने लगी थी। वह भी चाहती थी, उसकी सभी सहेलियों की तरह उसकी कद्र करने वाला, उसको प्रेम करने वाला, एक सुंदर सा लड़का उसका बॉयफ्रेंड हो। स्कूल के समय मे जब उसकी सभी सहेलियों को नित नए लड़के आ कर प्रपोज करते तब उसका मन भी मचल उठता, वह भी चाहती थी कोई उसको प्रपोज करे। उसके नखरे उठाये। उसकी बातों पर अपनी जान छिड़के, इसी चाहत में कॉलेज के एक लड़के को मन ही मन पसंद कर बैठी। आज हिम्मत जुटा कर कह ही बैठी

" रवि, आई लाइक यू, क्या हम दोस्त बन सकते हैं?"

रवि खिलखिला कर हंसा और बोला

"जा, पहले आईना देख, ये मुँह और मसूर की दाल"

उसका इस तरह हँस कर, चले जाना, और सभी सहेलियों का हँसी ठिठोली कर मजाक बनाना कादंबरी को जगत में सबसे बदसूरत होने का एहसास करा बैठा। वापस आ कर अपने चेहरे को आईने में देख बिलख पड़ी। चेहरे पर बड़े बड़े मुँहासे, आंखों के नीर से धुलने लगे।

कुछ दिन शर्म के मारे कॉलेज जाना कम कर दिया। अब जब भी आईने के सामने खड़ी होती तो अपने को सबसे हीन और बदसूरत के रूप में पाती। ट्यूशन लगा लिया। ट्यूशन में, कॉलेज का कोई भी साथी नही था, सभी दूसरे कॉलेज के थे। हम तीन लड़की और सिर्फ एक लड़का पीयूष, यही चार बच्चों का बेच था। पीयूष पढ़ने में तेज, सुंदर, मधुरभाषी था। मेरी दोनो साथी उसको पसंद करती थी। हम सभी मे बहुत बाते हुआ करती, कभी टॉपिक पर बहस होती तो, कभी किसी प्रोजेक्ट को ले कर एक दूसरे की मदद। एक दिन सुजाता बोली -

"पढ़-पढ़ कर दिमाग पक गया है, ट्रेड फेयर लगा हुआ है बोलो चलें, कुछ माइंड फ्रेश हो जाएगा"

पीयूष : मैं तो नही जा सकूंगा, तुम लोग देख लो।

सुजाता : क्यो, क्या हुआ ?

पीयूष : वहां पूरा दिन लग जायेगा, पूरे एक दिन की पढ़ाई खराब होगी।

ज्योति : तू तो मर जायेगा, पढ़-पढ़ कर। कादंबरी, तू चलेगी या तुझे भी पढ़ना है।

कादंबरी : हाँ-हाँ, मैं चल रही हूँ। मुझे किताबी कीड़ा नही बनना।

सभी खिलखिला कर विदा हुई, संडे का जाना तय हुआ। टिकट काउंटर पर पीयूष को देख सुजाता-

"तुझे तो आना नही था, तेरा पूरा दिन खराब हो रहा था फिर कैसे ?"

पीयूष : बस सोचा, कभी कभी तो चिल मारना ही चाहिए।

हम सभी खुश थे पीयूष के आ जाने से। हम तीनों को एक हैंडसम लड़के का साथ जो मिल गया था। भीड़ में पीयूष ने कादंबरी का हाथ पकड़ लिया। कादंबरी सिहर उठी, पूरे शरीर मे तरंगे मचल उठी।।

"यह क्या कर रहे हो ?"

कादंबरी की नजर ज्योति, सुजाता पर पड़ी, वो दोनो भीड़ में आगे निकल चुकी थी।

पीयूष : मैं तुझे पसंद करता हूँ, मेरी गर्लफ्रेंड बनेगी?

कादंबरी के बोल हलक में ही अटक गए

पीयूष ने कादंबरी की आंखों में झांकते हुए कहा : कुछ बोल क्यों नही रही, बुरा लगा तो ..... (कहते हुए हाथ छोड़ दिया)

कादंबरी : इस तरह अचानक ! मैं .... मैं क्या कहूँ ...
अचानक । अप्रत्याशित घटना से वो हक्कीबक्की थी, हकलाते हुए बोली

"ऐसा क्या देखा मुझ में ?"

पीयूष : किसी को लाइक करने के लिए, कुछ देखना जरूरी होता है ?

कादंबरी : फिर भी, कुछ तो। मैं इतनी तो बदसूरत हूँ फिर भी, सभी इसको टाइम पास ही समझेंगे।

पीयूष : किसने कहा तू बदसूरत है ? बात रही समझने की, कुछ भी समझ सकते है, किसी के समझने पर किसी का बस थोड़े ही है।

कादंबरी : सभी बोलते हैं, मैं खुद को भी आईने में देखती हूँ और आईने झूठ नही दिखलाते। इतने बड़े बड़े मुँहासे और मेरा रंग .....

पीयूष : रंग देख कर यदि कोई किसी को चाहे तो रंग फीका पड़ते ही चाहत भी फीकी पड़ जाएगी। मुँहासे ...... यह तो उम्र की देन हैं, फिर कहते हैं ना चांद में भी मुँहासे के दाग हैं तो क्या हम चांद को निहारना बंद कर देते हैं।

कादंबरी : चांद में चमक न होती, अंधकार होता तो शायद कोई भी नही देखता। दूरी उसके दाग छुपा देते हैं, पास होता तो उसके मुँहासे को कोई हाथ तक लगाना पसंद नही करता।

पीयूष ने आगे बढ़ कर हल्के से कादंबरी के मुँहासे भरे गाल को चूमते हुए कहा : चाहतों में सूरत नही सीरत दिखती है।
हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा .... क्या अभी भी इंकार है ?

कादंबरी ने ज्योति, सुजाता को पास आते देखा तो झट से बोली : कल अपनी बाइक पर कॉलेज छोड़ोगे तब बताऊंगी।

सुजाता : अबे, तुम दोनों यहां भीड़ में गप्पे मार रहे हो, और हमे लगा तुम गुम हो गए, जरूर ये पीयूष यहां भी चेप्टर खोल कर पढ़ाने लगा होगा।

कादंबरी के होठो पर मुस्कान तैर गयी।

घर आते ही, अपने उसी आईने के सामने जा खड़ी हुई। अपने को निहारते हुए आंखे चमक उठी, होठो पर ताज़गी भारी मुस्कान, गालों पर मुंहासे कम डिंपल अधिक दिख रहे हैं। लंबे बालों को हाथ से सहलाते हुए, आईने में अपने अक्स को चूमते हुए चेहरे पर लाली छा गयी।

यह वही आईना है, जिसने उसे कुछ ही दिन पहले हीन भावना से भर डाला था, दुनिया की सबसे बदसूरत लड़की का खिताब दे डाला था, आज वही आईना चेहरे पर शर्माने पर मजबूर व खूबसूरत बना रहा है।

सुबह जाने को तैयार, आईने के सामने आंखों में काजल माथे पर चमकती हुई छोटी सी बिंदी, बालो को खुला रखते हुए कूदती - उछलती पीयूष के आते ही बाइक पर सवार हो गयी।  कॉलेज पहुंची तो सभी की नजर उन दोनों पर ही थी।

पीयूष : तूने जवाब नही दिया।

कादंबरी आगे बढ़ते हुए, पीयूष के गले मे बाहें डालते हुए बोली : लड़की ...... सब कुछ अपने मुँह से नही बोलती। कुछ नजरो को भी समझ करो। चल बाय, ट्यूशन में मिलते हैं।

कादंबरी का चेहरा चमक रहा था, आज उसके चमकते चेहरे पर वह दबा हुआ रंग भी जच रहा था, उसके तीखे नयन नक्स उभर कर अपनी प्रतिभा से सभी का ध्यान आकर्षित कर रहे थे। उसके चेहरे के मुँहासे आज फीके पड़ चुके थे। क्योंकि उसके आईने ने उसको उसके असली रूप के दर्शन जो करा दिए थे।

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