एक घर मेरा भी

जब भंवरी की आंख खुली ,उसे अपने शरीर में एक अजीब सी घुटन महसूस हुई। सारा बदन मानो आग की भट्टी बना हुआ था। सुबह होने में वक्त था ,बाहर अंधेरा छाया हुआ था । उसने उठ कर पानी पिया।शरीर में बुखार की वजह से काफी कमजोरी महसूस कर रही थी वह ,फिर से चारपाई पर आ कर लेट गई ।आंखों के आगे उसे घेरे से घूमते  महसूस हुए ।उसने आंखें बंद करके फिर से सोने का यतन किया, परंतु शरीर में उठती दर्द भरी ऐंठन ने उसे बेचैन सा कर दिया।
" सुबह होने में काफी वक्त है ...भंवरी !चुपचाप सो जा!" दूसरी चारपाई से रसिया की आवाज आई।
सोऊं कैसे ?मेरा सारा शरीर भट्टी की तरह ठप रहा है ,ऊपर से यह बेचैनी जैसे मुझे मार डालेगी ।"कहते कहते वह उठ कर बैठ गई।
रसिया के मुंह से निकला '"लगता है यह' बालतोड़' तुझे नानी याद करवा कर ही जाएगा भंवरी !कई दिनों से तुझे परेशान किए हुए है" रसिया के स्वर में मजाक का भी पुट था।
"हां !पर अब तो फूटने पर आए गया है !कल जो पट्टी बांधी थी इस पर ;उसने उसे पका दिया पर साथ ही जानलेवा जकड़न की दे गया; ऊपर से यह बुखार अलग।"
उसके स्वर इस बीच कई बार - बार कापें भी थे।
"यह भी कोई जिंदगी है ;रसिया !ना दिन में आराम ना रात में; सारा दिन लोगों के सामने नाचते गाते फिरो ;तब इस पेट कोआहुति मिलती है --ना करो तो उस दिन फाके!"उसके स्वर में शिकायत के साथ दर्द भी था।
रसिया हंस पड़ा।
"अरे भंवरी! बावली पेट दिया है न  राम ने, तो इस में डालने के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा ।अगर पेट ना होता तो फिर यह मारामारी क्या करनी थी जिंदगी के साथ?"
दार्शनिक विचार के रसिया के।
"बातों से पेट नहीं भरता रसिया! इस पेट के लिए मारामारी करनी ही पड़ती है !देख ---दूध है तो चाय बना कर दे !--मुझसे बोला भी नहीं जा रहा है सिर फटा जा रहा है दर्द से।"
रसिया ने उठकर तंबू में मौजूद थोड़े से सामान में से चाय का सामान खोजा और चूल्हे पर पानी रखकर आग जलाने लगा।
जब तक वह चाय बना कर लाया पूर्व की दिशा की लालिमा  पक्षियों को आमंत्रण साथ देने लगी थी। और कुछ ही देर बाद आसमान पक्षियों के कलरव से भर गया। भंवरी ने चाय पीकर संतोष की सांस ली ,उसका शरीर कुछ सभला था साथ में पसीना थी उसने महसूस किया था।
"मैं आधा घंटा और सोना चाहती हूं; मुझे जगाना, मत, बुखार का असर शायद कुछ कम हो जाए।"
"ठीक है !तब तक मैं डॉक्टर से दवाई लेकर आता हूं!"
"ठीक है ।"कहते हुए भंवरी ने एक चादर अपने चारों ओढ़ ली, ताकि पसीना आ सके और वह आज के काम के लिए अपने आप को तैयार कर सके।
भंवरी नट समाज की एक कुशल नृत्यांगना और गायिका थी, खानाबदोश जीवन ,--आज यहां कल जाने कहां ;अन्य नट समाज वाले विभिन्न कार्य अपनी रोजी-रोटी के लिए करते थे। कुछ कलाबाजी या रस्सी पर चलना सरियों के घेरे के बीच में से निकलना ,!पर भंवरी को यह सब बिल्कुल भी नहीं पसंद था ।उसका रुझान हमेशा नृत्य की तरफ था। जब पांव में घुंघरू बांधकर वह नाचती थी तो जैसे सारी कायनात उसके घुंघरूओ की दीवानी हो जाती ,और गायन में तो शास्त्रीय संगीत के पंडित भी उस के स्वरों के आरोहऔर अवरोंह में खो कर रह जाते।
"भंवरी !---औ भंवरी! उठ खड़ी हो ;देखो सूरज कितना ऊपर आ गया!" रसिया ने उसे झिझोड़ते हुए उठाया ।उसके हाथ में दवाई थी।
" लो दवाई ले लो !खाली पेट मत लेना। कुछ खाकर" रसिया के बोल उसके गले में ही घुट गए।
"मुझे कुछ नहीं होगा खाली पेट दवाई लेने से! बहुत सख्त जान होती है हम जैसों की। इतनी जल्दी नहीं निकलेगी" कहते हैं उसने हाथ फैलाया।
"तुम ठहरे ;मैं अभी एक रोटी झुमरू से लेकर आता हूं! आ कर दे देंगे।"
रसिया भारता चला गया !जब आया तो एक आध ही जली हुई रोटी उसके हाथ में थी !भंवरी ने पानी के साथ उसे निगला। उसके बाद उसनेदवाई खा ली।
रसिया अपनी ढोलकी पर ताल बिठाने लगा, उसकी डोरियों को कसने लगा ।जब उसने ठोक बजाकर देख लिया और ताल भी ठीक पड़ने लगी। उसने भंवरी की तरफ देखा।
भंवरी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
"भंवरी !सरदार रणविजय सिंह के घर 20 साल बाद बेटा पैदा हुआ है !-------तुम देखना सरदार तुम्हारा नाच गाना देखकर कितना खुश होगा !हम तो निहाल हो जाएंगे भंवरी; देखना सरदार हमें खुश कर देगा।"
भंवरी मानो स्वप्नलोक में गुम हो गई।
फिर बोली "तुम्हारा दिमाग खराब है क्या? चलना मुझसे मुश्किल हो रहा है ।सारा शरीर रात के बुखार ने तोड़ कर रख दिया ।तुझे सरदार के बेटे की पड़ी है ।तुझे तो बस रुपए चाहिए भंवरी चाहे मर जाऐ।"
"ऐसा क्यों बोलती हो भंवरी! मेरा मतलब यह नहीं था।" रसिया हकला गया।
"और क्या मतलब था तुम्हारा? मैं मरने को पड़ी हूं और तुझे सरदार के लड़के के लिए बधाई गाने वाली चाहिए ताकि ढेर सारा इनाम मिल सके।"
"इसमें गलत भी क्या है भंवरी ?अगर ढेर सारा इनाम सरदार दे दे तो हम अपनी पारो के लिए भी कुछ कर सकते हैं।"
भंवरी कुछ और कहने वाली थी---- गुस्सा बुखार की वजह से और भी भयानक होने वाला था-- पारो का नाम सुनकर एकाएक ठंडा पड़ गया ।उसकी आंखों के सामने पारो का सुंदर चेहरा घूम गया ,जो शहर के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही थी। इस बात को रसिया से ज्यादा भंवरी जानती थी कि किस प्रकार उसने अपने सब गहने गिरवी रखकर अपनी बेटी को पढ़ाया और इस योग्य बना दिया था कि वह कुछ ही महीनों में अपने पैरों पर खड़ी हो सकती थी। ।
भंवरी अनपढ़ थी पर अपने अधूरे सपनों को पारो में पूरा होता देख रही थी।
क्या सोचने लगी भंवरी क्या मैंने कुछ गलत कहा
भंवरी का चेहरा कुछ गंभीर हो गया।
गोरे मुखड़े पर बुखार की पीलिमा स्वर्णिम हो
गई।
"रसिया! मैं थोड़ा आराम करना चाहती हूं ;अभी दवाई ली है तब तक आस पास का चक्कर लगाओ।"
भंवरी लेट गई ।रसिया ने अपना टूटा हुआ साइकल उठाया। और आसपास के इलाके में पता करने निकल गया कि कहां शादी हुई,-- लड़का हुआ जन्मदिन किसका है ?__और कब है ?यह चीजें उनके लिए बहुत अहमियत रखती थी!
जब रसिया वापस आया उसका चेहरा चमक रहा था शायद आज के लिए उसे अच्छा इनाम मिलने वाला था।।
"!!भंवरी! भंवरी !उसने पुकारा ;चादर से लिपटी भंवरी के शरीर में हरकत के साथ उसकी कमजोर सी आवाज भी आई।
"अब कैसी तबीयत है तुम्हारी?"
भंवरी का सारा बदन पसीने से भीगा हुआ था कपड़े तक गीले थे।
"बुखार तो उतर गया और शरीर में कमजोरी महसूस हो रही है !तुम किधर गए थे?"
रसिया खिले चेहरे से उसके पास होकर बोला ''भंवरी! ऊपर वाला बहुत मेहरबान है हम पर।"
"क्यों ऐसा क्या कर दिया ऊपर वाले ने जो तुम्हारे चेहरे का जलाल दुगना हो गया है ?एक वक्त की रोटी मुश्किल से मिलती है ;कई बार पानी पीकर पेट पर पत्थर रखकर सोना पड़ता है ;कर दिया कमाल ऊपर वाले ने। "पता नहीं भंवरी बुखार के प्रभाव से बड़बड़ा रही थी या फिर कोई विरोध का स्वर सिर उठा रहा था।
"तुम नहीं समझोगे भंवरी !वह पता नहीं क्या से क्या कर देता है? आज ही देखो धर्मपुर में चार जगहों पर हमें जो मिलेगा वह तुम देखना हजार रुपये  से ज्यादा ही होंगे और जफरपुर वाला सरदार रणविजय सिंह उसकी तो बात ही निराली है, वह जो ना कर दे वह कम है।"
रसिया किसी और ही भाव में भावित था! उसे भंवरी के रूप में नोटों की बरसात होती दिख रही थी ।भंवरी के चेहरे पर मुस्कान तैर गई।
"चाय पानी तो पिला दे ;इतनी मेहरबानी हो रही है तुझपर मैं रात की भूखी हूं और ऊपर से यह 'बालतोड़' इस ने मेरी जान निकाल कर रख दी ;शरीर में दर्द की लहर सी उठती है ऊपर से 'नाश गया' यह बुखार ;भवंरी तो गई काम से !--चल कुछ खिला दे।"
रसिया बेचारा । एक सुनहरी अवसर मिला था और दूसरी तरफ भंवरी बीमार ।करे तो क्या करें ।सोचते-सोचते विचार  विचारते रसिया ने भंवरी के लिए खिचड़ी बनाई ।बस यही कुछ था ,पिछले 10 दिनों से कुछ भी काम नहीं था जो कुछ था। वह खर्च हो गया था ।बड़ा भाग पारो को भेज दिया गया था ,खाना खाकर भंवरी कुछ संभली।
। पहले से बेहतर महसूस कर रही थी ।अब कमजोरी भी उसने नहीं थी ,जब तक पूरी तैयार हुई उसने अपने बाल संवारे चेहरा धोया।और नैन और घुंघरू संवारे, तब तक रसिया चाय लेकर आ गया।
"चाय कहां से लेकर आए ?"भंवरी ने पूछा ।
"झुमरू चाचा से ----और साले ये डेरे वाले हमें देखकर कहां खुश हुए ,और यह झुमरू चाचा थे , जो उसे पढ़ने और बाहर भेजने के लिए सारे डेरे वालों से लड़ गए थे।"
"हां"। चाय था मते भंवरी ने कहा।
"झुमरू चाचा ने हमारा बहुत साथिया रसिया। चाचा के बहुत अहसान है ।बताओ पर पारो के पढ़ने पर इन डेरे वालों ने कितना विरोध किया था? यहां तक कि हमें जाति से बाहर निकालने का हुकुम सुन लिया था ।हमारे घर को जलाने का जलाने का भी यतन किया इन डेरे वालों ने ।पर चाचा झुमरू ने सबका मुंह मोड़ दिया और पारो को तुम्हारे साथ जाकर दाखिल करवा कर आया और तब से लेकर आज तक हमारी सहायता भी करता है।"
विचार पारो की तरफ चला गया तो वातावरण चाय की चुस्की ओं के साथ गंभीर हो गया! रसिया एकटक भंवरी की तरफ देख रहा था --उसके चेहरे के उतार चढ़ाव।
"भंवरी! झुमरू चाचा बोल रहे थे कि तुम्हें आराम करने दूं। बुखार ने तुम्हें कमजोर बना दिया है क्यों ना आज कजरी को ले जाऊ।"
"कौन कजरी ?.......कौनकजरी...?. अरे वह ..बंदरिया ! न सूरत न सीरत ।नाचना आता है ,ना गाना। बस आंख मटक्का करने में सबसे आगे।"
"फिर क्या करें?"
"करें क्या ? मैं तैयार हूं चलो , वह जाएगी तो उसको आधा बांट कर देना पड़ेगा और मैं गई तो सारा अपना।"
"यह बात तो मैं भी सोच रहा था कि -----पर तुम्हारी बीमारी के कारण मुझको अपनी सोच बदलकर कजरी के लिए हामी भर नहीं पड़ी थी।"
"कोई जरूरत नहीं है किसी को ले जाने की ?....भंवरी ने ऐलान किया । चाय खत्म हुई।
"मैं चाचा को क्या कहूं कजरी के बारे में ?"रसिया पूछ रहा था या मिमिया रहा था, कहना मुश्किल था ,भंवरी ने उसे घूर कर देखा।
"क्या बात आज बड़ा ख्याल आ रहा है केजरी का?--.... मेरे पास क्या लेने आया है ?...जा..जाकर उसके साथ जोड़ी बना ले।"
"तुम बात को किसी और तरफ ले जा रही हो भंवरी---- मैं तो केवल।"
"मैं तुम्हें बता रही हूं कजरी के चाटे हुए पेड़ हरे नहीं हुए आज तक, तुम मेरे रसिया .....पानी भी नहीं मांगोगे।"
"कमाल कर रही हो भंवरी!.... मैं कहीं जोड़ी नहीं बना रहा हूं? मेरी जोड़ी तो तुमसे है?...रसिया एक तरह से भंवरी के सामने निमिया रहा था।
"चलो रसिया मैं तैयार हू।"
दोनों की नजरों के सामने कजरी खड़ी थी ;28 साल की 6 फुट लंबी ...गोरा मुखड़ा किसी तेज से दीप्त था और श्रृंगार की महक का एक छोटा सा झोंका दोनों को बहा ले गया। उसकी होटो की मोहक मुस्कान भंवरी को चिढ़ा रही थी।
"तुम कजरी !....इतनी जल्दी ....? ‌रसिया के मुंह से यही निकला।
"झुमरू चाचा ने बताया भंवरी बीमार है, रसिया का साथ देने वाला कोई नहीं ,मैंने सोचा क्यों न मैं रसिका साथ दूं..... आ खिर मेरा भी तो आप पर कोई हक बनता है।" कजरी की आंखें कुछ और बोल रही थी भंवरी ने महसूस किया यह औरत हद से ज्यादा चालाक है।
इन दोनों के बीच में फंसा रसिया कभी भंवरी की तरफ दयनीय दृष्टि से देखता और कभी चोर नजरों से कजरी की तरफ देखता।
" यह बात तो ठीक है कजरी !"भंवरी का स्वर गूंजा "मेरी तबीयत रात से बहुत खराब है !बुखार ने शरीर तोड़ कर रख दिया, रसिया मुझे लेकर डॉक्टर के पास जा रहा है ,हम तो आज किसी बधाइयां पर नहीं जाएंगे, तुम ऐसा करो कजरी किसी और को साथ ले जाओ ।हम तो दवाई लेने शहर जा रहे हैं।"नहीं तो मैं और रसिया जाने वाले थे पर क्या करूं इस 'बालतोड़' के कारण पांच बधाइयां खराब हो गई।"
पांच बधाइयां ।कजरी सुनकर झूंम सी गई।
।"हां कजरी! बहुत रुपए मिलेंगे कल्वे को साथ ले जा।"
रसिया चुप चुप खड़े देखता रहा आखिर हो क्या रहा था?
"चल रसिया दवाई लेकर आते हैं।"
कजरी लौट गई ! नागिन सी फुफकार छोड़ती हुई ।भंवरी और रसिया सड़क पर आ गए थे ।वहीं टूटी हुई सी साइकिल और जिस पर भंवरी को बिठाकर साइकिल चलाना..... रसिया के लिए एवरेस्ट जैसा काम था।
"तुम्हें तो दुख हो रहा होगा।"
"कैसे दुख?"
"कजरी को छोड़ने का .....?कजरी को छोड़ने का ...?देख कैसे सोलह सिंगार करके अप्सरा बनकर तुम्हारे सामने खड़ी हो गई थी।... तुम तो तैयार थे उसके साथ ही जाने के लिए ...वह तो मैं थी जो तुम्हें उसके चंगुल से छुड़ा लाई!... वरना मेरा रसिया के तरीके मन 'बसिया 'हो जाता।"
भंवरी देवी का हंसी का ठहाका सुनसान सड़क पर दूर तक भी बिखरता चला गया ।रसिया की सांसें फूली हुई थी ,वह क्या जवाब देता मुस्कुराता हुआ भंवरी को देखता रहा।
"तुमने कलवे का नाम क्यों लिया था ?"रसिया ने पूछा।
"उसकी औकात याद दिलाने के लिए !......यही कजरी थी जिसके लिए कलवा चोरी करने लगा था।... बाहर चोरियों में उसका हाथ पाया गया। अभी तो पिछले महीने-दो साल की कैद काट कर आया है ।सारा पैसा उसने जो कमाया था कजरी हजम कर गई।..... कलवा यह समझ रहा था कि उसने कजरी के लिए 2 साल की कैद भी काट ली......यह वह अपने प्यार की जीत समझता था।"
"यह बात तो सही है भंवरी !...कलवा इस हद जा सकता था इसके लिए कुछ भी कर गुजरता था ।....तभी वह 2 साल की कैद काटकर आया है इसी कजरी के लिए .....? कजरी उससे अब भी  से प्यार करती है।"
दोनों सड़क पर धीरे धीरे चल रहे थे......" तुम एकदम झल्ले हो ।"भंवरी ने उसे दिया।
"झल्ला क्यों?"
"यह कजरी बड़ी कमजात है ।....कलवे को जब इसकी करतूत पता लगी कि उसके पीछे यह छोटे ठाकुर के साथ पता नहीं कौन सी बधाइयां लेती रही। रंगरलियां मनाती रही ... तो इसे दुत्कार चुका है,। इसकी शक्ल तक नहीं देखना चाहता । तभी तो मैं कहती हूं इसके इसके गुण इसी में है ।बस दूर ही रहो ......ऐसी औरतों को अच्छी तरह से जानती हूं मैं।"
भंवरी शुरू हुई तो कजरी के चक्कर में अपना बुखार  ... दुख सब भूल गई।....डा,. उसे चेक किया .....दवाई दी चार दिन की!...... बालतोड़ में चीरा नहीं आ सकता था।... उसे अभी 2 दिन तक इंतजार करने को बोला।
"इसकी पीड़ा खत्म हो जाती तो आज की बधाइयां पर जाकर कुछ कमा सकते थे !और और काम आसान हो जाता।बांके खत्म हो जाते...!"
पर बालतोड़ का फोड़ा तो अब भी वैसा ही था, जैसा दो दिन पहले। जरूरी सामान खरीदकर वह घर आ गए। भंवरी ने रसिया से पूछा "चल सरदार जी की तरफ चलते हैं !मैं ठीक हूं .... दवाइयां तो ले ली है ।काम कर सकती हूं।"
नहीं...भंवरी में आने जाने में थक गया हूं!
" मैं जाऊं तो तुम्हें थकान होने लगती है .....और कजरी जाए तो?"
"ऐसी कुछ बात नहीं ......चल पानी पी के चलते हैं, मुझसे ज्यादा तो तुझे फिक्र हो गई है कजरी की।"
"उसकी फिकर करे मेरी जूती .....ज्यादा बातें ना बना जल्दी पानी पी और चल।"
रसिया अब तो विवश था जैसे तैसे करके अपने कार्यस्थल पर पहुंचा..... चारों तरफ कोलाहल ...चहल-पहल रंगीनियों ही रंगीनियों ...मेहमानों का जमावड़ा देखकर रसिया जहां मन ही मन खुश था, वहां भंवरी के मन में एक पीड़ा से उठ खड़ी हुई थी-- एक शारीरिक और दूसरी मानसिक !क्या मेरी पारो को भी इसी अंदाज में लोगों के सामने पेट के लिए नाचना पड़ेगा।...उसने सिर को झटका दिया !साईकल को दूर लगाकर ,....रसिया ढोलकी गले में डाले उसके पास पहुंच गया था।
"आओ भंवरी"!
वे दोनों अंदर आ कर आने जाने वालों से हटकर एक कोने में खड़े हो गए। रसिया ने दूब हाथ में लिए अपने ही अंदाज में बधाइयां देनी शुरू कर दी। उसने पास से गुजरते एक व्यक्ति से पूछा सरदार साहब कहां मिलेंगे ।गुजरने वाले ने उसे हिकारत  से देखा....." जा कर उधर बैठ जा कोने में;... तेरे को बधाइयां देने की पड़ी है !"...कहता हुआ वह आगे निकल गया।
यह तो उनका हर रोज का काम था ;सभी तरफ से उन्हें 'दुर-दुर-;... फिटेमुहं तेरे  .... मेरे साले के  .. दुत्कारें चारों ओर से पड़ती थी ,..पर इन सब की उन्हें आदत हो गई थी !रसिया भंवरी के साथ अलग खड़ा हो गया ;उनकी नजरें आने जाने वालों पर पड़ी थी। दोनों समय की नजाकत को समझते थे तभी उनके कानों में ढोलकी की थाप पड़ी! भंवरी और रसिया ने आवाज की दिशा में देखा। भंवरीरी के मुंह से एकाएक स्वर निकला'"..... लगता है रांड हमसे पहले पहुंच गई है?"
"कौन?" रसिया ने पूछा।
"तुम्हारी कजरी ,और कौन ?पता नहीं कमजात ने किस पर जादू किया होगा साथ लाने के लिए।"
"कलवा साथ आया होगा।"
भंवरी कुछ नहीं बोली .....चुप चाप आने जाने वालों को देखती रही........ लड़खड़ा ते हुए झूमते हुए लोग, उसे आंखों से पी जाने की लालसा लिए निकल जाते।
अब क्या करें रसिया का चिंतित स्वरूप। उसके कान ढोलकी की थाप पर थे।
"करना क्या है?... अपने "लाग"(शगुन लेकर निकलते हैं ;..पर इससेेपहले थोड़ा खाने को मिल जाता ...तो मजा आ जाता !सुबह की जली हुई रोटी खाई हुई है ;अब तो भूख से  कलेजा निकाला जा रहा है। ऊपर से बुखार ने दिल तोड़ कर रख दी।"
रसिया ने भंवरी की तरफ से देखा..... भूख उसे भी लग रही थी!... क्या यह बड़े लोग इस बात को समझेंगे????? रसिया उस तरफ बढ़ा जिधर लोग खाना खा रहे थे ।अपनी अपनी बातों में व्यस्त लोग ....बदमस्त और बेहोश वातावरण !... रसिया ने हिम्मत करके पास से गुजरते व्यक्ति से याचना की "...नंबरदार कुछ खाने को मिल जाता दाता आपको बहुत देगा ।
उसने उसे घूरा ,पलट कर बोला ,"सब्र कर ;...कुछ मर नहीं जाएगा तू। बदनीता साला, चल वही मिलेगा तुझे इधर मेहमानों में घुसा तो हड्डी तोड़ दूंगा तेरी कमीनी साले।,"
नशे से चूर वह गालियां बकता हुआ निकल गया। खाली हाथ रसिया को आते देख भंवरी का कलेजा बैठ गया।भूख से बुरा हाल था। रसिया मायूस होकर बैठ गया ,"क्या हुआ खाने की जगह झिड़कियां मिली।"
रसिया ने भंवरी को देखा और बोला अरे यह तो रोज का काम है झिड़कियां मिलना।.... पिछले महीने तो सरपंच ने लाठी उठाकर पीट भी दिया था ।...यह तो कुछ भी नहीं भंवरी हमें तो लाठी खाते ही पेट भरने को मिलता है ।...इसे चाहे नसीब को या कुछ और।"
"यह कैसा नसीब रसिया हर बार हमारा ही गला काटता है; हम ही पिसते हैं .....हमारी दिल की दिल में रह जाती है! कभी नसीब के नाम पर....... कभी जात धर्म के पैदा हुई इज्जत के नाम पर।"
रसिया ज्यादा वक्त और दार्शनिक बातों में सिर नहीं खा पाता था पर भंवरी कई बार बहुत गहरे तक गंभीरता से सोचती थी! पर बातों से पेट नहीं भरता... हकीकत कड़वी और कठोर हो तभी है।
तभी जोर जोर से भागते चिल्लाते हुए बच्चे आए और पास से गुजरते व्यक्ति ,जो मिठाइयां लिए हुए था,से इतनी जोर से टकराए कि चीखते हुए से उस व्यक्ति के हाथों से मिठाइयां दूर बिखरती चली गई।
बच्चे  जा चुके थे ।वह व्यक्ति ---जितनी गालियां उसके पास थी ;.----उन्हें दे चुका था ---वह चीख रहा था ...करे तो क्या करें ???बुडबडाते उसने मिठाइयां इकट्ठे की,..... उसकी नजर रसिया और भंवरी पर पड़ी।
"तुम भी कंजरो यहीं पर हो .......!...मर जाओ एक तरफ.....! रास्ता रोक कर बैठे हो !" वे उठे ,..डर से एक तरफ कोने में  बैठ गए  ।
"और सुनो यह भी ले जाओ !......यह मिठाइयां वहां जाकर खाओ ..! हमारे किसी काम की नहीं रही। -------पता नहीं सालों की शक्ल कैसी है।सारा काम खराब कर दिया।"
रसिया ने आगे बढ़कर मिठाइयां अंगौछे में डलवा ली।...... मुंह मांगी मुराद मिल गई थी ....पर भंवरी के मन में कड़वापन भर गया था।... रसिया बैठा हुआ चुपचाप खा रहा था !..भंवरी ने कई बार सोचा कि वह कुछ भी खाया ना जाए। जो हमें जानवर समझ कर दे दिया गया ।पर खाली आदर्शों से पेट की आग नहीं बुझती।
"मुझे भी देना रसिया"
रसिया ने अंगोछे में रखी मिठाई उसके सामने रख दी।
ना चाहते हुए भी भंवरी चुपचाप खाने लगी,,.. पेट भर खाने के बाद उसमें जैसे नई शक्ति आ गई थी!.. ढोलक की थाप पर घुंघरू की आवाज अब भंवरी को सुनाई देने लगी थी! दो चार व्यक्ति झूमते हुए से निकले ....शायद शराब पी हुई थी।
"चलो हमारे साथ ....बहुत सारा इनाम दिलवा देंगे तुम्हें सरदार साहब से।"
"कहां नंबरदार जी "...रसिया बोला
"उधर रंग महल में ;..जहां नाच रहा है!.... घुंघरू की आवाज नहीं सुनाईपड़ती ....सुनाई पड़ रही है चलिए।"
दोनों उनके पीछे पीछे उस स्थान पर आ गए जहां पर नृत्य हो रहा था!.. बहुत सारे लोगों के मध्य कजरी और कलवा नृत्य में मगन थे और समा बांधा हुआ था ।
सरदार साहब  देखो तो हम किन लोगों को लेकर आए हैं ?" क्या नाम है तेरा।?"
उसने भंवरी की तरफ से कर कहा।
"सरदार साहब !भंवरी ।"
"ठीक है !आज इस मुबारक घड़ी में हम तुम्हारा और इस कजरी का मुकाबला करवाते हैं !इसमें जो भी जीतेगा ;वह 10,000 इनाम का हकदार होगा हकदार होगा।"



भंवरी और रसिया क्या यह जीत पाए???? इसके बारे में आप अगले भाग में पढ़ेंगे। धन्यवाद।
                 सतपाल सिंह जटान
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