दर्जा

दर्जा
जब तक नौकरी थी उसकी पूरे  मोहल्ले में ठसक थी, लेकिन रिटायर्मेंट के बाद लोगों की नजरों में भी फर्क आ गया था | बहू की रोज की खटर पटर से बचने के रोज शाम होते ही  नियत समय पर पार्क के उस बेंच पर बैठ जाया करता और  सामने लगे  पेड़ से बतियाता रहता, अपने  खाली समय के कुछ घंटे वहां बिता घर लौट आता ।
  कुछ दिन पहले उस पेड़ के नीचे कोई भगवान की तस्वीर रख गया था  जिसका कांच एक तरफ से टूटा  था ।  उसने वो तस्वीर पेड़ पर कील  के सहारे से  ठोक दी | उसे कांच की दरार कुछ  भरी हुई सी लगी ।
कुछ  दिन बाद देखा कोई उस तस्वीर पर लाल चुनरी ओढा गया है । चेहरे की मुस्कान कुछ बढ़ी और कांच की दरार कुछ और  कम दिखने  लगी ।
अब वह  बेंच पर बैठा बैठा देखता रहता लोग आते जाते माथा नवाते , हाथ जोड़ते,
उसकी मुस्कुराहट और बढ़ जाती और दरार धीरे धीरे हलकी होती जाती |
अब उसे समझ आने लगा था की ये एक इशारा है कि खंडित होने के बाद  भगवान् को तो  उनका दर्जा मिल गया था लेकिन  उसे अपना दर्जा खुद हासिल करना होगा
रेनुका

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