आरुषि की शादी

आरुषि : क्या फर्क पड़ता है, यह सब बड़े शहरों में आम बात है, लिव इन मे रहना कोई अपराध नही, फिजिकली-मेंटली जब तक, एक दूसरे को नही जान जाएं, तब तक साथ जीवन बिताने का फैसला कैसे करें। वैसे भी अब हम शादी कर ही रहे हैं।

आरुषि पिछले तीन साल से लिव इन मे रह रही थी जिसकी भनक तक घर वालो को नही लगी, आज आरुषि ने ही घर के सभी सदस्यों के सामने खुलासा किया। एक तरफ पलंग पर पिता गगन मुँह लटकाए बैठे हैं, दूसरी तरफ कुर्सी पर दादा-दादी, आधुनिक जीवन की झलक देख रहे हैं, वह तो आज भी अपने पुराने समय को याद करते खुश होते हैं, जीवन इतना आधुनिक हो चुका है, इसका आभास, पेंट-शर्ट पहनी आरुषि का अपने माता-पिता के सामने खुल कर बात करने से, हो रहा है। माँ राधिका ने आरुषि के गाल पर तमाचा जड़ दिया।

राधिका : तीन साल! और अब हमें बता रही है, तुझे शर्म नही आयी।

आरुषि : आप लोग यूँही बात का बतंगड़ बना रहे हो, आज बता तो रही हूँ। बहुत अच्छा परिवार है, एक बार मिल तो लो। वो लोग राजी हैं, और मुझे अपनी बेटी की तरह मानते हैं। मैं बालिग हूँ, अपना अच्छा बुरा समझती हूँ। शादी से पहले साथ रहने से एक दूसरे को समझ लें तो जीवन अच्छा बीतता है, अन्यथा किसी अनजान से विवाह उपरांत, मन मुटाव से जीवन नरक बन जाता है। आप लोग राज़ी हों न हों, हमारा फैसला अटल है। जियेंगे तो साथ, मरेंगे तो साथ।

गगन पलंग से खड़ा होता हुआ बोला : बस बहुत हुआ .... हमारी मर्जी और नामर्जी का तो सवाल ही नही उठता। अब तो सिर्फ नाक बचानी है। उनसे मिलने का दिन तय करो।

समय के साथ बहुत से बदलाव समाज मे आये, उनमे से प्रेमी युगल का एक होने का प्रतिशत का बढ़ जाना भी है। किंतु मां बाप आज भी चाहते हैं, बेटी या बेटे के लिए वर या वधु वही तलाश करें।  माँ बाप के लिए बच्चे, हमेशा बच्चे ही रहते हैं, उनका मानना है कि बच्चे परिपक्व फैसले नही कर सकते। विवाह दो दिलो का ही नही अपितु दो परिवारों का एक हो जाना भी होता है। ऐसे में, सामने वाला परिवार किस धर्म-जाती या किन विचारो वाला है, इसका मतभेद प्रेम विवाह का विरोधक बन जाता है।

रात को कमरे में राधिका और गगन, चिंता मग्न शादी के विषय पर वार्तालाप कर रहे हैं।

राधिका : आपने हामी कैसे भर ली, लड़का देखा न भाला, कौन जात, कौन परिवार, कुछ भी तो नही पता।

गगन : और क्या करता? सुना नही तूने, कैसे बोल बोल रही थी। जब लड़की की जुबान कैंची समान चलने लगे तो विवशता हाथ बांध देती है। अब जो भी है, जैसा भी है, कन्यादान कर गंगा नहाएंगे। सोच तो भाग गई तो लोगो को क्या जवाब देते फिरेंगे, और कुछ उल्टा सीधा कर बैठी तो ...... आजकल लड़के लड़कियों का दिमाग खराब है, घर वालो ने मना किया नही के उठा बैठे गलत कदम।

राधिका : मैं पहले ही कहती थी, मत भेजो बड़े शहर, यहीं नजरो के सामने रहती तो आज ये दिन न देखना पड़ता। तीन साल से साथ रह रही थी, कुछ बचा भी होगा, विवाह के लिए।

गगन : अब जो है सो है, कर भी क्या सकते हैं।

छोटे शहरों में रहने वाला परिवार, बड़े शहर की चकचौन्ध में आज लड़के के घर वालो से मिलने आ पहुंचा। मिलने का स्थान एक बड़ा रेस्टोरेंट, जिसमे दोनो परिवार आमने-सामने बैठे हुए हैं।

एक बहुत बड़ा रेस्टोरेंट, सूरज की रोशनी से भी अधिक उजला दिखता है। दीवारों पर कला कृतियां देखते ही बन रही हैं। व्यवस्तिथ परिधान में बैरे इधर-उधर दौड़-दौड़ कर बड़े अदब के साथ टेबल पर जा कर आर्डर ले रहे हैं। यही सब पर राधिका की नजर जमी हुई है। छोटे परिवार, किराए का मकान और छोटे शहर के छोटे रेस्टोरेंट तक ही सीमित राधिका के लिए यह नजारा रोमांच से भर देने वाला था, उस पर मद्धम ध्वनि में चलता संगीत, मन को प्रसन्ता दे रहा है।

दोनो परिवार आमने सामने बैठे हैं, आरुषि ने परिचय करवाया। पापा ये हैं, राकेश अंकल, इनका यहां बेंगलोर में बहुत बड़ा बिज़नेस है। ये हैं सुनीता आंटी, अंकल के साथ बिज़नेस संभालने में मदद करती हैं। ये है मयूरी ......

गगन हाथ जोड़ते हुए : राकेश जी, हम तो नॉकरी पेशे वाले, छोटी आय वाले लोग हैं, बेटी की ज़िद को नमस्कार करने आये हैं, विवाह में बहुत अधिक .....

राकेश ने गगन की बात बीच मे काटते हुए हाथ पकड़ कर कहा : गगन जी हाथ मत जोड़िए, जितने लाचार आप हैं, उतने ही हम भी हैं। बच्चों की जिद के आगे आजकल माँ बाप लाचार हो ही जाते हैं। लेन-देन की बात तो इस विवाह में बची ही नही है, बस बला टले।

'बला टले' शब्द गगन की समझ नही आये, बात न बढ़े इसीलिए बात बदली : राकेश जी लड़के को साथ नही लाये ?

राकेश और उनकी धर्मपत्नी एक दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे गगन ने कोई अनचाही मांग कर डाली हो।

राकेश ने माथा मलते हुए कहा : बस अब तो जिसको चाहो लड़का समझ लो।

गगन : मतलब ?

राकेश : शादी मयूरी और आरुषि कर रहे हैं। आपको बताया नही, आरुषि ने ?

राधिका और गगन कभी एक दूसरे को देखते कभी आरुषि को तो कभी चश्मा लगाए पेंट शर्ट में बैठी मयूरी को। आरुषि के पैदा होते ही उसके विवाह के लिए सपने संजोते हुए तिल-तिल पैसा जोड़ा, आंखों में ख्वाब थे कि ऐसी शादी करेंगे कि दुनिया देखे। आज प्रेम की स्वीकृति न होते हुए भी मन मे प्रसन्ता का भाव लिए आये थे कि शादी हमारी मर्जी से न सही, उसकी मर्जी से ही, हो तो शादी ही रही है। आंखों के सामने विवाह के दृश्य नाचने लगे।

विवाह मंडप सजा हुआ है, घोड़ी पर बारात लिए मयूरी गाजे बाजे के साथ आई है, आरुषि और मयूरी अग्नि के सामने बैठी, मंत्रोउच्चरण के बीच परिणायसूत्र मे बंध रही हैं। दूसरी तरफ पूरा समाज, परिवार दांत निकाले हँसी उड़ा रहे हैं। पंडत ने कहा अब वर वधु को माला पहनाए ...... वधु के पिता कन्यादान के लिए आगे आएं ........ कौन किसको विदा करेगा कौन बहु बनेगी, कौन दामाद, क्या विवाह दो परिवारों का होगा या सिर्फ दो समलैंगिक शरीरों का? क्या हमारे धर्म मे ऐसे भी मंत्र हैं जो समलैंगिक को फेरे पढ़ा सकें? क्या अब हमें अपने धर्म पुस्तक को बदल देना चाहिए? ऐसे मंत्र, ऐसे प्रचलन के लिए नई व्यवस्था करनी होगी ? समाज मे इनको जगह मिल सकेगी?

टेबल पर हाथ मारते हुए, गगन उठ खड़ा हुआ : क्या बदतमीजी है, राकेश जी आप मान कैसे गए? समलैंगिक विवाह, विवाह नही श्राप है। दो लड़कियां जीवन साथ गुज़ारेंगी ..... और समाज उनको अपना लेगा, यह सोच भी कैसे लिया आपने ?

आरुषि : पापा, समलैंगिकता का कानून बन चुका है, आप या आपका समाज, हमारे बंधन को ठुकरा नही सकता, हम अब आजाद हैं, आप समाज की फिक्र मत कीजिये। आप बताइए आप हमारे विवाह कराएंगे या नही ?

गगन : यह आज़ादी नही, आज़ादी के नाम पर अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता के साथ खिलवाड़ है। मानता हूं साथ रहने से प्रेम की उत्पत्ति हो ही जाती है किंतु एक जानवर, जिसको घर मे पालते हैं उससे भी हम जी-जान से प्रेम करते हैं तो क्या हम उसके साथ भी विवाह कर सकते हैं ? शायद नही, क्योंकि वो तो जानवर है...... और तुम इंसान। यदि साथ रहने मात्र से ही इस प्रेम की उत्पत्ति नही हुई है तो यह शारीरिक है, यह शारीरिक प्रेम कैसे पूर्ण हो सकता है। स्त्री पुरुष का संगम ही जीवन है। समलैंगिकता सिर्फ कुछ पलों को खास बना सकती है जीवन को नही।

मयूरी जो अभी तक खामोश बैठी थी बोल पड़ी : यदि आप लोग इसी तरह अड़चन पैदा करते रहेंगे तो मजबूरन हमे कानून का सहारा लेना पड़ेगा, और हो सकता है आपको कानून का अपमान करने पर सज़ा भी हो जाये।

राधिका और गगन चेहरे पर विवशता के भाव लिए राकेश और उनकी पत्नी सुनीता के चेहरे के वही विवशता भरे भाव को समझ कर चुप खड़े, आने वाली विपदा के विषय मे सोच रहे हैं। क्या जवाब दें क्या नही समझ से परे हैं, पाठको से हाथ जोड़े विनम्र विनती कर रहे हैं, सुझाव देने के लिए।

आज गगन, राधिका व राकेश, सुनीता के सामने यह समस्या मुँह फाड़े खड़ी है,  कल हमारे बच्चों ने भी यही किया तो क्या फैंसला लेंगे ?

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