जिन्न की मित्रता (8)

विकास एक मूर्ति में तबदील हो चुका था, और जिन्न उसके घर पहुँच चुका था। मोहिनी घर मे विकास का इंतजार कर ही रही थी कि जिन्न मोहिनी के पास आकर बोला । तुम्हारा पति विकास अब कभी नहीं आयेगा। क्योंकि उसने मुझे आज़ाद होने का आदेश दिया। तो मैं अब आज़ाद हो चुका हूं और अपने लोक जा रहा हूं। अब पूरे 2 दिन बाद ही मेरी शक्तियां खत्म हो जाएंगी। फिर सब बैसे का वैसा ही हो जाएगा। तुम उसी रूप को प्राप्त हो जाओगी। जिस में तुम पहले थी। विकास के माँ बाप भी उसी तरह हो जाएंगे, जैसे पहले थे।
ये कहकर जिन्न वहां से चला गया।
मोहिनी ये सब सुनकर जैसे सुन्न सी रह गई। इससे पहले कि वो जिन्न के पैरों में गिरती उससे मन्नते करती वो वहाँ से लुप्त हो चुका था।
फिर क्या था, उसके सोचने समझने की शक्ति ही खत्म हो गई।
क्या मैं उसी कुरूप भैंस का रूप ले लुंगी, कोई बात नहीं जो गया सो हो जाएगा। मुझे कोई दुख नहीं। पर मैं विकास के प्रेम को कैसे भूल पाऊंगी। मोहिनी के आंसुओं ने जैसे रुकना भुला ही दिया। और उसने अपने दिल को समझाने से जैसे मना कर दिया। रह रह कर विकास के प्रेम को याद कर रही थी मोहिनी।
तभी विकास के पिताजी की आबाज बाहर से आई, क्या विकास आ गया। मैंने देखा नहीं उसे।
नहीं बाबूजी अभी नहीं आये। आंसू पोक्ष कर मोहिनी बोली।
और मोहिनी ने विकास से मिलने का निश्चय किया। जो भी हो  जिन्न पर भरोसा न करके उसने विकास से मिलने की सोची। अचानक विकास की दी हुई अंगूठी उसे याद आई।
और उसने विकास की दी हुई । अंगूठी को देखा और उसे विकास पत्थर की मूर्ति में दिखा , और उसने रोते हुए अंगूठी से कहा मुझे इनके पास ले चलो। और जब वो विकास के पास पहुँच गई, तो उसे देखा। अपने पति के गले लग कर रोने लगी।
क्यों कि मुझसे शादी , जब मुझे छोड़ कर जाना ही था आपको।
क्यों मेरे जीवन में आये, मेरा स्वरूप बदला आपकी बजह से।
अब में कहां जाऊँ।
और विकास बस खड़ा ही था , और खड़ा ही रहा।
क्या करता पत्थर की मूर्ति भी क्या कर सकती है।
बस देख रहा था, मोहिनी को और महसूस कर रहा था उसका प्यार ।
वो प्यार जो उसे कभी किसी ने दिया ही नहीं।
दो दीन निकल गए थे उसे पड़े हुए और ये क्या मोहिनी का सिर का सारा हिस्सा भैंस के मुंह मे बदल गया।
वो अपने इस रूप को देख कर और रोने लगी और विकास की आखों में आँखें डालना बन्द कर दिया। शर्म से ज्यादा उसे अपने पति को वो पुराना चेहरा दिखाने में अब उसके पति की बेज़्ज़ती ही दिख रही थी।
उसका ये स्वरूप देखकर विकास की उस पत्थर की आखों में आँसू की धार खूट बैठी।
उसकी आँखें, वो पत्थर दिल भी धधक उठा।
मोहिनी उसे देख कर उसके गले लग गई और उसे तसल्ली दे ही रही थी कि, वो अपने कोमल हाथों से उसके चेहरे को जैसे संवार रही थी।
उसके हाथ काले पड़ गए वो भैंस की टांगों में बदल गए।
उसका सारा शरीर ही भैंस के रूप में बदल गया।
और फिर वो सर पटकने लगी।
सर पटकते पटकते लहू लुहान हो चुकी थी।
अब क्या होगा ?
हमारे थोड़े से सूखी जीवन मे ये कैसा मोड़ आ गया।
इस थोड़े से सुख से तो मैं पहले ही सही थी।
बहुत दुख होता है , अथाह दुख के बाद तनिक सुख मिल कर फिर दुःख मिल जाये तो।
और यही अनुभव हो रहा था।
आज मोहिनी को ,,
और फिर जैसे ही आखिरी चोट मोहिनी के सिर की लगी।
उस इत्र की सीसी पर, वो सीसी खुल गई। सीसी के खुलते ही विकास ने अपनी इक्षा प्रकट कर दी ।
मुझे आज़ाद करो इस पत्थर की मूरत से।
और मेरी पत्नी की वो प्यारी सी सूरत फिर से दे दो।
क्रमशः

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