अनोखा रिस्ता-1 "डायरी"

शाम का समय था लगभग 7 बजे होंगे ,एक टेबल पर बैठा करन कॉफी पी रहा था चारो ओर लोग बैठे हुए थे हल्की हल्की नीली रोशनी हो रही थी
     करन की उम्र लगभग 30 के आसपास होगी । गोरा रंग , मासूम सा चेहरा ,चेहरे पे हल्की सी मुस्कान हमेशा रहती थी उसे देख कर ऐसा लगता था कि यह मुस्कान झूठी है ,अपने मन को हल्का रखने के लिए सिर्फ दिखावट है । जिस तरह एक बीमार ब्यक्ति को खूबसूरत कपडे पहना दिए गए हों ।
  " माफ़ करना करन यार आज फिर लेट हो गयी "
'ये तुम्हरा हर बार का काम फिर माफ़ी क्यूँ मांगती हो'
" कसम से मेरी जान ,आज बहुत ज्यादा जरूरी काम आ गया था"
'अच्छा ! जरा मुझे भी तो बता की कितना जरूरी था तेरा काम'
"अरे वो आकाश है ना , वो मुझे कॉफी के लिए पूँछ रहा था ,बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ा कर आयीं हूँ ।"
'वही आकाश ना जो तुमसे प्यार करता है , बेचारे को क्यूँ परेशान कर रही हो '
"अच्छा , बड़ी फ़िक्र हो रही है उसकी चल ठीक है तेरी बात मान ली , बस एक शर्त पर "
'बोल क्या शर्त है'
"अपनी डायरी दे मुझे पड़ने को"
'मरने दे साले को मुझे क्या पड़ी है'
         करन का जबाब सुनकर कविता जोर से हँसने लगी । करन की दोस्ती कविता से लगभग 8 सालो से थी वो कॉलेज एक साथ पड़े थे कविता करन के बारे में उसके परिवार के बारे में सबकुछ जानती सिवाय उसकी डायरी के ।
"अच्छा करन, एक बात बता ये डायरी मुझे क्यूँ नही पड़ने देता , कम से कम कारण तो बता ,जिससे मुझे तसल्ली तो रहे "
'तुझे में मना कर कर के परेशान हो गया पर तू है कि मानती ही नही , क्या करेगी इसे पढ़कर '
"करन प्लीज ,तेरे हाथ जोड़ लूँ "
'हट पागल क्या कर रही है , तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है ऐसा नही करते '
"दोस्त भी कहता है और बात भी नही मानता "
'अरे मेरी प्यारी दोस्त समझा करो ,अगर तुमने इसे पड़ा तो हमारी दोस्ती ख़तम हो जायेगी '
"वो क्यूँ"
'बस ऐसे ही '
        कविता और करन वहाँ बहुत देर तक बात करते रहे और फिर चले गए , डायरी का विषय उनका रोज़ का था ,कविता पड़ने के लिए मांगती थी और करन मना कर देता था । लेकिन कविता की समझ में ये नही आता था कि वो उसकी दोस्त वो उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार था फिर एक डायरी को क्यों नही दे रहा था  ।
क्रमशः

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