Gकब, क्यों और कहाँ ??? भाग:23

            #पूर्व कथा प्रतिलिपि में प्रकाशित भाग01 से भाग22 तक फैली हुई है।

......   उसकी कार चौराहे पर खड़ी थी। ट्रैफिक सिग्नल ग्रीन हो चुका था और पीछे से हार्न बजा उसे कार आगे बढ़ाने के लिए शोर मचाया जा रहा था। पुरानी स्मृतियों को नेपथ्य में भेज वह तेजी से कार निकाल सपना गांगुली के निवास जा पहुंचा। वह एक आलीशान फ्लैट में रहा करती है जहाँ पहले भी वह एक दो बार आ चुका है। उनका मिलना -जुलना अधिकतर सार्वजनिक स्थलों पर ही होता रहा है जैसे कि रेस्त्रां, सेमिनार, मल्टीप्लेक्स या किसी रेसार्ट में। मेन गेट पर सिक्योरिटी द्वारा इंटरकॉम पर सपना के साथ उसके आगमन की सूचना और अनुमति का आदान -प्रदान किया गया और फिर विजिटर रजिस्टर पर इंट्री करवा उसे भीतर जाने दिया गया। विजिटर्स पार्किंग से निकल कर चौदहवें माले तक जाने में कुछ वक्त तो लगना स्वाभाविक ही था ,उतनी देर में सपना और पार्वती ड्राइंग रूम में आ कर बैठ गए और कर्नल का इंतजार होने लगा।
                                   लिफ्ट डोर बंद कर कर्नल ने बस लाबी में कदम रखे ही थे कि उसका मोबाईल बज उठा । इंस्पेक्टर यादव की कॉल थी ।उसने  फ्लैट की बेल बजाने के बजाय कॉल ले लेने का सही निर्णय लिया।फ्लैट के भीतर  कमजोर सिग्नल्स की वजह से कॉल रिसीव करने में कठिनाई आ जाती। यह कॉल यादव ने कर्नल के साथ के पारिवारिक संबंधों और आरती के मामले में उसकी दिलचस्पी देखते हुए स्वयँ की थी। पी.के. अभी तक उससे मिलने नहीं पहुंचा था। आरती के घर से मिली वह डायरी वारड्रोब के एक ट्रैप डोर से बरामद हुई थी। यादव ने बताया कि यह कोई नियमित लिखी जाने वाली डायरी नहीं थी। किसी पृष्ठ पर कोई ग़जल तो कहीं कोई फिल्मी गीत के बोल तो कहीं शेरो शायरी  तो कहीं अंग्रेजी पोइट्री की लाइनें इधर -उधर से उतार कर लिखी हुई थीं। लेकिन अंतिम कुछ पृष्ठों में ढेर से फोन नं, कुछ ऐड एजेंसियों और उनके एजेंटो के नाम,पते व फोन नं एवम् एक महत्वपूर्ण किन्तु अधूरी इबारत वहाँ लिखी है :-"शाबाश म०कु० तुमने आखिर ढूँढ़ निकाला , मिलते हैं ' सिलवर लाइनिंग ' में और लूट .." इतनी सी बात को भी लिखने में कई बार काटा -पीटा , सुधारा गया है । इन बातों को सुन कर कर्नल के कान खड़े हो गये और उसने वह पहेलियाँ जो उसे गौरव गुलाटी ने सौंपी थीं इंस्पेक्टर से शेयर करते हुए कहा कि वह फिर से उस डायरी को देखे कि यह पहेलियाँ इसी या किसी अन्य रूप में वहाँ भी दर्ज हैं क्या?
                            जैसे ही इस कॉल को अटेंड कर कर्नल फ्लैट के भीतर प्रविष्ट हुआ ही था कि पुन: उसका मोबाइल बजने लगा। वह एक्सयूज़मी कह पुन: बाहर आ गया। दूसरी तरफ इंदर गुलाटी था । वह कह रहा था कि वह आज शाम को वापस घर जा रहा है। इसलिये जाने से पहले मिल कर कुछ बताना चाहता है।वह भी उससे कुछ पूछना चाहें तो पूछ लें ,लेकिन केस अवश्य हल कर दें। उसे पुलिस पर कोई भरोसा नहीं है। कर्नल ने उसे दो घंटे बाद ऑफिस आ जाने को कह दोबारा फ्लैट में प्रवेश किया तो पाया कि दोनों महिलाएं उसका इंतजार करते -करते सोफों से उठ कर नाश्ते की मेज पर जा बैठी हैं।
                        अगले दो घंटे ऐसे बीते जैसे इस बीच सदियाँ गुजर गई हों, जैसे कोई बालक अचानक बाल सुलभ चंचलता भूल क्षण भर में धीर -गंभीर युवा पुरुष बन गया हो या फिर जैसे किसी यात्री को रेल सेअपने गंतव्य स्टेशन पर पहुँच कर यह याद ही न आये  कि यह ट्रेन कभी बीच के स्टेशनों पर भी रुकी थी। उसने सपना को धन्यवाद कहा और स्वीकार किया कि उसने फ्रैंड, फिलास्फर, गाईड होने का कर्त्तव्य बाखूबी निभाया है।उसने पार्वती गुलाटी को विश्वास दिलाया कि वह डॉली के कातिल को ढूँढ़ निकालने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखेगा।
                               ग्यारह बजते -बजते कर्नल  आफिस पहुंच गया । मारिया आफिस खुलवा कर वापस अपने घर जा चुकी थी ।अब वह लंच के बाद ही वापस आ सकेगी। पी.के.और नेहा कर्नल की प्रतीक्षा कर रहे थे। फिर तीनों के बीच आगे की योजनाएं बनाने के लिए विचार विमर्श शुरू हो गया। इसी बीच जैसा निर्धारित हुआ था इंदर गुलाटी भी अपने घर वापसी से पहले वहाँ आ गया।उसे कर्नल सीधे अपने  चैम्बर में ले गया और दोनों के बीच सीधी बातचीत का सिलसिला शुरू होने में देर नहीं लगी। कर्नल को याद था कि जब वह उस दिन श्मशान घाट में फिरोज से बातचीत कर रहा था तो यह शख्स दूर बैठा उनकी बातचीत सुनने का असफल प्रयत्न कर रहा था। फिर उस दिन यहीं पर जब कर्नल ने सबके सामने आरती के मोबाइल को सर्विलांस में लगाने की बात करी थी तो इसका चेहरा कैसे सफेद पड़ गया था? आज इन सब बातों के परिपेक्ष्य में इंदर की परीक्षा लेने का मौका था। लेकिन पहले इंदर को ढील मिली हुई थी कि जो कुछ उसे कहना है कह ले।
----"मुझे मुख्यतः तीन बातें आपको बतानी हैं , मालूम नहीं कि इन्वेस्टीगेशन में आपकी कितनी सहायता कर पायेंगी।" इतना कह कर उसने एक बंद लिफाफा कर्नल की टेबल पर रख दिया। यह लिफाफा ठीक वैसा ही था जैसा कि कर्नल को स्वयँ कुछ दिन पहले अपनी कार की विंड स्क्रीन के वाइपर्स में फँसा हुआ मिला था। खोले जाने पर इस में अंदर भी उसी तरह का एक पर्चा रखा था जिसकी इबारत कुछ यूँ थी :-
ओम प्रकाश + पार्वती + गौरव = डॉली +इंदर+(?)
---"इसका मतलब ?"
-----"क्या पता ?"
-----"कहाँ और कैसे मिला?"
-----"मुझे तो मेरे ड्राइवर ने ला कर दिया है। उसे ही मिला था। मैं उसे बुला देता हूँ , पूरी कहानी वही सुनायेगा।"
इंदर का ड्राइवर अशोक नीचे बेसमेंट पार्किंग में कार के भीतर बैठा इंतजार कर रहा था । उनका इरादा यहीं से सीधे ड्राइव करते हुए घर के लिए निकल जाने का था। इंदर के बुलावे पर वह कर्नल के आफिस आ गया। गठीले बदन , सख्त हाथों वाले  इस शख्स को कर्नल ने कुछ भाव नहीं दिया । बस उसके सपाट चेहरे पर नजर जमाये उसकी पूरी कहानी धैर्य से सुन ली। कहानी कमोबेश वही थी जो कर्नल को मिले इसी तरह के लिफाफे और संदेश की थी। कहानी पूरी होते ही कर्नल ने उसे वहाँ से चलता किया।  अशोक भी एक लम्बा सा सलाम ठोक ,यहाँ से छुटकारा पा वापस पार्किंग लाट लौट गया।
----"दूसरी बात क्या है ? "
----" दूसरी बात यह है कि मेरे भाई गौरव गुलाटी की मौत के पीछे कुछ ऐसा है जिसे अभी सामने आना बाकी है। मेरे अंकल ओमप्रकाश गुलाटी जरूर कुछ छुपा रहे हैं। एजेंसी की रेड में जो अनएकाउन्टेड गोल्ड का जखीरा पकड़ा गया था,  कहाँ से आया था ? ज्वैलरी के साथ -साथ इन लोगों ने कहीं ड्रग्स या इसी तरह के किसी गलत धंधे में तो अपने को नहीं फँसा लिया था ? "
-----"और तीसरी बात ? "
------" हो सकता है डॉली भी इनके धंधे में शामिल हो गई हो । जिस तरह से गौरव और डॉली को मौत के घाट उतारा गया है, यह किसी दुश्मन गैंग की कार्यवाही भी हो सकती है।"
                    इंदर की ऐसी बातें सुन कर्नल को डॉली की पहेली वाली सेल्स प्रमोशन की स्कीम और विशेष सोविनियर वाली माचिसों की याद ताजा हो आई। उसे शुरू से ही इस स्कीम में झोल नजर आ रहे थे। फिर वैसी ही माचिस गौरव ने भी उसे सौंपी थी। कोई कनेक्शन तो दोनों में जरूर रहा है ?
---" यह बताओ कि तुम नेटफ्लिक्स के मर्डर मिस्ट्री वाले शोज़ तो नहीं देख रहे हो?"
---"हाँ, देखता तो हूँ ! क्यों।?"
----" कुछ नहीं , बस उनके असर से लोग अपने साये पर भी शक कर बैठते हैं।" इतना कह कर कर्नल अपनी कुर्सी से उठा और वहीं चैम्बर के भीतर टहल कर इंदर की कही गई बातों पर गौर करने लगा।
----" कुछ और भी बाकी है या मैं शुरू करूँ ?"
----" हाँ, हाँ कहिए ?"
-----" इसे  एक नजर देखो  ।" यह कह कर्नल ने पहली बार वह पहेली वाला कागज़ जिसे गौरव गुलाटी उस विशेष माचिस में बंद कर उसे सौंप गया था ,इंदर के हाथ में रख दिया। इंदर भी उसे ऊपर से नीचे तक कई बार पढ़ गया। फिर मुस्कुराया ,
----"यह आपको कहाँ मिल गया ?"
----  "तुम इसे पहचानते हो ? " , कर्नल के स्वर में आश्चर्य था।
----"मेरा ही लिखा हुआ है , क्यों नहीं पहचानूँगा ? "
कर्नल को यह उम्मीद कतई नहीं थी। इंदर गुलाटी वह पहला शख्स था जो इस पहेली को न केवल पहचानने का दावा कर रहा था बल्कि उसे अपना लिखा हुआ बता रहा था।
----"तुमने इसे क्यों लिखा ? लिखा तो फिर अल्ट्रावायलेट रोशनी में ही पढ़ सकने लायक क्यों बनाया ? और यह किस खजाने का क्लू है ?"
   कर्नल ने उस पर इतने सारे प्रश्नों की बारिश कर दी कि वह घबरा गया । घबराहट में उसके हाथ काँप उठे और चेहरा फक्क पड़ गया। उसकी यह दशा देख कर्नल ने पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया।  जिसे उसने एक ही साँस में खाली कर दिया। फिर धीरे -धीरे उसकी अवस्था  सामान्य होने लगी।
----"माफ कीजिएगा मैं कमजोर नर्वस सिस्टम का मरीज हूँ और आज नियमित लेने वाली दवा नहीं ले सका हूँ।"
---"कब से बीमार हैं?"
एक फीकी हँसी हँसते हुए इंदर ने कहा ,
"पुराना मर्ज है ,बस दवाएं खाता रहता हूँ। अब तो लगता है यह मेरे साथ ही जायेगा।"
   कर्नल उसे ध्यान से गंभीरता पूर्वक देख रहा था। उसने अनुमान लगाया कि यदि वह कोई उच्चकोटि का अभिनेता नहीं है तो इस समय झूठ नहीं बोल रहा है।
-----" बातचीत जारी रखें या यहीं समाप्त करें ।"
-----" नहीं -नहीं ,अब मैं नार्मल हूँ। बस एक बार में एक सवाल ,प्लीज़! "
----"-ठीक है तो बोलिये कि आप क्या बताने जा रहे थे।"
-----" वो अल्ट्रावायलेट वाली बात से मेरा कोई नाता नहीं है। मैं तो उस पहेली की बात कर रहा था। मेरे फादर आर्मी में थे और  कई साल यू.एन.ओ.की पीस कीपिंग फोर्स के साथ विदेशों में तैनात रहे। उन्हें वेस्टर्न म्यूजिक का शौक रहा और वह अक्सर इस गीत को सुना करते थे। इसका एल.पी. रिकॉर्ड शायद अब भी हमारे बंगले में कहीँ पड़ा होगा। मैं और गौरव बचपन से साथ रहे। हम उन दिनों ट्रेजर हंट खेल खेला करते थे जो मेरे फादर ने ही हमें सिखाया था। तभी किसी खेल में मैंने इस गीत को क्लू के तौर पर इस्तेमाल किया था।"
------"..और वह हिन्दी वाला भाग ?"
------" वह सेंकड क्लू था ।जब हम पहले क्लू से ट्रेजर तक नहीं पहुंच पाते थे तो सेकंड क्लू मांग लेते थे।"
----"ओह ,आई सी !" और कर्नल ने होंठों को गोल कर बहुत दिनों बाद सीटी बजाई।
-----" तो तुम्हारा कहना यह है कि यह सब बचपन का खेल था और तुमने हाल के दिनों में इसे नहीं देखा। "
---"जी, हाँ !"
---" सिर्फ़अल्ट्रावायलेट रोशनी में पढ़ सकने लायक  बनाने वाली बात से भी तुम्हारा कोई लेना -देना नहीं है।"
--"जी,हाँ ! बेशक नहीं है।"
-----" अच्छा , यह बताओ कि किसी खजाने के बारे में या उसकी खोज के बारे में कभी कुछ सुना है ?
      यह तुम्हारे खेल वाला नहीं ,असली ।"
____" ऐसी बातें तो हम अर्से से सुनते आ रहे हैं। हमारे इलाके में तो अक्सर अफवाहें फैला करती हैं । कुछ सिरफिरे उन अफवाहों का पीछा करते -करते  यहाँ-वहाँ भटकते रहते हैं। अब हमारे बंगले को ही लीजिए , यह कभी एक ब्रिटिश शिकारी की मिल्कियत हुआ करता था ।मेरे फादर ने इसे जब बीस साल पहले खरीदा तब भी स्थानीय लोगों में यहाँ खजाना छुपा होने की अफवाह तेज थी। यह अफवाह जान बूझ कर फैलाई गई थी जिससे प्रापर्टी की कीमत बढ़ सके। "
               कर्नल के फोन पर आई कॉल ने बातचीत का क्रम भंग कर दिया। दूसरी तरफ इंस्पेक्टर रामलखन यादव था। आज का दिन कर्नल दीपक जोशी के लिए नई- नई खबरें, नये -नये रहस्योद्घाटन की सौगातें ले कर आया हुआ था। उसने कर्नल को बताया कि सार्विलेंस पर लगाये गए आरती के नये नंबर से महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। नंबर तो फिलहाल अवश्य मृत पड़ा है किन्तु अंतिम सक्रियता  अमरकोट नेशनल पार्क के नजदीक के गाँव डामचुक के मोबाइल टावर की दिखा रहा है। पूरी जानकारी ले और इंस्पेक्टर को कोटि -कोटि धन्यवाद देते हुए कर्नल ने जब कॉल डिसकनेक्ट की तो पाया कि इंदर गुलाटी की निगाहें उसके चेहरे पर जमी हुई हैं । फोन पर हुई बातचीत संक्षिप्त ही थी और सावधानी बरतते हुए  कर्नल ने अपनी ओर से कम से कम शब्दों का प्रयोग किया था । इसलिए बातचीत का विषय भाँपना कठिन था किन्तु कर्नल की भावभंगिमा से इतना तो पता चल ही रहा था कि वह महत्त्वपूर्ण है।
-----" क्या डॉली के मामले में कुछ सुराग मिला है ?"
-----" नहीं ,अभी मुझे पता नहीं। कल पुलिस सफाई कर्मचारी को पकड़ ले गई थी फिर उसे छोड़ भी दिया । अच्छा, यह बताओ कि कभी अमरकोट नेशनल पार्क गये हो ? "
----" क्यों ? मैं तो रहता वहीं हूँ।  'सिल्वर लाइनिंग '  इस्टेट जिसमें पुरानी हवेली , एक एकड़ का तालाब और ग्यारह एकड़ का जंगल जो आगे जा कर अमरकोट नेशनल पार्क से जा मिलता है हमारी ही है। "
(क्रमशः)

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